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रीवा जिले की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी सीधे तौर पर खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। इसके बावजूद, ग्राम पंचायतों में गौशालाओं के रखरखाव और चारे-पानी पर हर साल लाखों रुपए खर्च होने के बाद भी बेसहारा गोवंश की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। गोवंश के खेतों में घुसने से किसानों की खड़ी फसलें चौपट हो रही हैं। फसलों की सुरक्षा के लिए किसान महंगे दामों पर तार-बाड़ी कराने और रात-रात भर रतजगा करने को मजबूर हैं। सरकारी कागजों में गौशालाओं के संचालन, रखरखाव और चारे-पानी की मद में हर महीने लाखों रुपए का बजट स्वीकृत कर दिया जाता है, लेकिन धरातल पर स्थितियां जस की तस हैं। जब सड़कों और खेतों में सैकड़ों बेसहारा गोवंश खुलेआम भटक रहे हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर गौशालाओं के नाम पर आने वाला सरकारी पैसा कहां और किसकी जेब में जा रहा है? किसानों का आरोप है कि बजट का सही इस्तेमाल न होने के कारण गौशालाएं या तो बंद पड़ी हैं या फिर मवेशियों को वहां रखा ही नहीं जा रहा। किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी से मुलाकात कर समस्या के समाधान की मांग की। किसानों ने रखीं 2 प्रमुख मांगें किसानों ने कहा- बाड़ तोड़कर घुस रहे मवेशी रामबहोर वर्मा, निवासी रायपुर कर्चुलियान: “खाद और बीज के साथ तार-बाड़ी में हजारों रुपए लग गए। बेसहारा गोवंश के झुंड बाड़ तोड़कर खेत में घुस जाते हैं और पूरी फसल चर जाते हैं।” शिवकुमार पटेल, निवासी गंगेव: “दिनभर खेत में काम करने के बाद रात में टॉर्च लेकर रखवाली करनी पड़ती है। गोवंश फसल तबाह कर दें तो दोबारा बोवनी की नौबत आ जाती है।” दिनेश सिंह, निवासी सिरमौर: “खाली पड़ी सरकारी जमीन पर अस्थायी बाड़े बन जाएं तो सड़कों पर हादसे भी रुकेंगे और फसलें भी बचेंगी।” कलेक्टर बोले- समीक्षा की जा रही है
कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी का कहना है कि गौशालाओं के सुचारू संचालन और गोवंश प्रबंधन को लेकर समीक्षा की जा रही है। संबंधित जनपद सीईओ को निर्देश जारी कर व्यवस्थाएं दुरुस्त कराई जाएंगी। किसानों की फसलों को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।
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गौशालाओं पर लाखों खर्च, फिर भी खेतों में बेसहारा गोवंश:फसल बचाने किसान रातभर कर रहे रखवाली, कलेक्टर से और गौशाला संचालन की मांग
