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- Pandit Vijay Shankar Mehta’s Column: Whenever Worldly Illusions Trouble You In Life, Connect With The Divine Play Of The Almighty.
28 मिनट पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
पूजा-पाठ करने वाले भी भ्रमित हो जाते हैं। शिकायत करते हैं कि हमारे साथ ऐसा क्यों होता है? क्या ईश्वर है नहीं, है तो हमारी सुनता नहीं? तुलसीदास जी क्या लिखते हैं- परबस जीव स्वबस भगवंता, जीव अनेक एक श्रीकंता। मनुष्य परतंत्र है, भगवान स्वतंत्र हैं। जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान एक हैं।
अब इसमें तुलसीदास जी ने साफ कहा है कि यह जो माया है, जादू है- यह भ्रम पैदा करता है। तो माया से बचने के लिए भजन किया जाए। और भजन करते ही या तो हम ईश्वर के निकट जाते हैं या ईश्वर हमारे पास आते हैं।
भागवत पुराण में भगवान कृष्ण ने जब रासलीला की तो लोग भ्रम में पड़ गए। कृष्ण गोपियों के साथ नाच रहे हैं। लोगों ने स्त्री और पुरुष देखना शुरू कर दिया। रास पंचाध्यायी में यही माया है, लेकिन यदि हम भजन करें तो माया कटेगी। जैसे कृष्ण भजन करने से हम कृष्ण की ओर बढ़ेंगे ही, क्योंकि कृष्ण शब्द का अर्थ है- जो आकर्षित करे, जो भक्त को अपने में लील ले। तो जब-जब माया सताए, ईश्वर की लीला से जुड़ जाएं।

