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N. Raghuraman’s Column – Don’t leave the stage until your skills lose their sheen.


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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन मेरे पसंदीदा एक्टर हैं। मुझे उनमें जो पसंद था, वह था उनका डायलॉग डिलीवरी का बिल्कुल अलग-अलग अंदाज। दिलीप कुमार हर शब्द के बाद ठहरते थे, लेकिन प्रत्येक शब्द एक अलग जोर और भाव के साथ आता था। सीधे आपके दिमाग में उतर जाता और जिंदगी भर के लिए वहां जगह बना लेता था।

दूसरी ओर, अमिताभ बच्चन वही डायलॉग बिना रुके बोल सकते थे। सुनने वाले को भी बमुश्किल पता चलता कि उस पर क्या असर हुआ, लेकिन एक पल बाद उसे एहसास होता था कि उसका असर बहुत गहरा था। ये दोनों तब तक मेरी पसंद बने रहे, जब तक मैं छोटे शहरों में रहता था और उन्हें सिर्फ पर्दे पर देखता था।

लेकिन जब मैं मुंबई आया और बॉलीवुड बीट कवर करने लगा तो कुछ ही समय में शत्रुघ्न सिन्हा के प्रति मेरा आकर्षण इन दोनों से भी आगे निकल गया। शत्रुघ्न सिन्हा ने स्क्रीन पर महज यादगार किरदार ही नहीं निभाए, बल्कि जब टाइम मैनेजमेंट की बात आती तो वे एक अलग तरह के विलेन बन सकते थे। फिल्म सेट पर समय पर न पहुंचने के लिए वे बदनाम थे।

लेकिन एक बार पहुंचे तो इसकी पूरी तरह भरपाई कर देते थे। वे अधिकतम एक-दो टेक में ही अपना शॉट दे देते थे। बिना रुके, बिना दोबारा सोचे और एक भी शब्द भूले बिना डायलॉग डिलीवर कर देते थे। उनकी याददाश्त गजब थी। वे एक सिटिंग में स्क्रिप्ट के कई पन्ने पढ़कर उन्हें पूरी तरह याद कर लेते थे। इंडस्ट्री में हर कोई उनकी याददाश्त को लेकर हैरान था।

तभी मुझे 1933 में जन्मी 93 साल की वेल्स की बेहद मशहूर अभिनेत्री डेम सियान फिलिप्स के बारे में पता चला, जो बीबीसी और अन्य चैनलों के टीवी सीरियल्स में भूमिका निभाती थीं। वे 11 साल की उम्र से ही वेल्श भाषा के रेडियो कार्यक्रमों में परफॉर्म करने लगी थीं। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ वेल्स में पढ़ाई की और बाद में रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रमैटिक आर्ट में स्कॉलरशिप हासिल की। क्या आप यकीन करेंगे कि स्टेज, टीवी और फिल्मों में उनका कॅरिअर 80 वर्षों से ज्यादा का रहा। जिन स्टेज कलाकारों को मैं जानता हूं, उनमें वे सबसे अच्छी थीं।

सिर्फ अभिनय में ही नहीं, बल्कि डायलॉग याद करने में भी वह शत्रुघ्न सिन्हा से बेहतर थीं। एक ही रीडिंग में वे डायलॉग याद करके बिना किसी गलती के डिलीवर करती थीं, वह भी डायरेक्टर के चाहे गए अंदाज में। वे बिना किसी प्रॉम्प्ट और गलती के लगातार 15 मिनट तक डायलॉग बोल सकती थीं। यही उनकी खासियत थी। लगभग 70 वर्षों तक थिएटर करने के बाद पिछले हफ्ते एक रिहर्सल में जब वे केंद्रीय किरदार की भूमिका निभा रही थीं तो उन्हें लगा कि वे अपनी लाइनें याद नहीं कर पा रही हैं।

फिलिप्स कहती हैं कि ‘यह अचानक हुआ। मुझे लगा कि यह अजीब है और वैसे नहीं हो रहा है, जैसे आमतौर पर होता है।’ डायरेक्टर एडम पेनफोर्ड हंस पड़े, क्योंकि मिस फिलिप्स के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ। इसके बाद फिलिप्स ने कान में बड लगाने की कोशिश की, लेकिन वह किसी वजह से बाहर निकल आया। उन्होंने प्रॉम्प्ट करने वाली लड़की की तरफ देखा, लेकिन फिलिप्स उसकी आवाज नहीं सुन पा रही थीं।

तब जाकर डायरेक्टर ने कहा कि ‘अब यह काम नहीं करने वाला।’ रिहर्सल में याददाश्त संबंधी समस्या आने पर तीन दिन बाद ही फिलिप्स ने स्टेज एक्टिंग कॅरिअर से विदा लेने का फैसला किया। इसने मुझे शीर्ष पर पहुंचने वाले लोगों के बारे में एक एहसास कराया कि उनमें कई कमजोरियां हो सकती हैं, लेकिन उनके पास एक सुपर-स्किल भी होती है, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। और जब वह स्किल अपने चरम पर होती है तो उन्हें रिप्लेस कर पाना कठिन होता है।

इसीलिए मेरा मानना है कि हमें स्टेज तब तक नहीं छोड़ना चाहिए, जब तक हमारी वह सुपर-स्किल फीकी न पड़ने लगे। अगर दर्शक अभी भी यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि ऐसा क्या है, जो सिर्फ हम ही कर सकते हैं तो हमें क्यों पीछे हटना चाहिए?

फंडा यह है कि जब आपको स्टेज छोड़ना है तो जरूर छोड़िए, लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं कि आपकी एक उम्र हो गई है। तब छोड़िए, जब आपको लगे कि आपकी स्किल अब स्पॉटलाइट के योग्य नहीं रही।

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