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नालंदा जिले के राजगीर स्थित बिहार पुलिस अकादमी में मंगलवार को 18वां स्थापना दिवस समारोह पूरे सैन्य हर्षोल्लास और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर बिहार पुलिस महानिदेशक विनय कुमार ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत शानदार मार्च पास्ट के साथ हुई, जहां डीजीपी विनय कुमार ने जनरल सैल्यूट स्वीकार किया और परेड का गहन निरीक्षण किया। इस दौरान अकादमी की निदेशक और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आर. मलार विझी, उप निदेशक अभय कुमार लाल, सहायक निदेशक (प्रशिक्षण) अम्बरीष राहुल और सहायक निदेशक (प्रशासन) लालबाबू यादव सहित पुलिस महकमे के तमाम आला अधिकारी मौजूद रहे। मुख्य अतिथि के तौर पर मंच से अपने संबोधन में डीजीपी विनय कुमार ने बिहार पुलिस अकादमी को केवल एक ढांचागत परिसर न बताकर, इसे पूरे राज्य और बिहार पुलिस बल का ‘मेरुदंड’ (बैकबोन) करार दिया। उन्होंने 45 मिनट से अधिक के संबोधन में 1861 के पुलिस अधिनियम से लेकर आज तक के पुलिस प्रशिक्षण के इतिहास, झारखंड बंटवारे के बाद की चुनौतियों, ढांचागत निर्माण में आई बाधाओं और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के अपने जमीनी अनुभवों का सिलसिलेवार और तथ्यात्मक ब्योरा पेश किया। 10 हजार नई नियुक्तियां डीजीपी विनय कुमार ने पुलिस बल की कार्य क्षमता पर जोर देते हुए कहा कि पुलिस कोई सामान्य नौकरी नहीं है, यह 24 घंटे की जनसेवा और लॉ एनफोर्समेंट (कानून प्रवर्तन) ड्यूटी है। इसमें किसी भी प्रकार के भय या घबराहट की कोई गुंजाइश नहीं है। राज्य सरकार पुलिसकर्मियों को हर संभव सुविधाएं, भत्ते और संसाधन मुहैया करा रही है। वर्तमान में 1295 सब-इंस्पेक्टर्स की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है, जो जल्द ही यहां प्रशिक्षण के लिए आएंगे। इसके साथ ही बीपीएससी के माध्यम से 100 से अधिक नए डीएसपी का बैच भी अकादमी में आने वाला है। आने वाले समय में 10,000 और पुलिसकर्मियों की बहाली कर उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा। क्षेत्रीय एफएसएल, मॉडल थाना से लैस हुई अकादमी डीजीपी विनय कुमार ने कहा कि अब यह संस्थान एक संपूर्ण और अत्याधुनिक प्रशिक्षण केंद्र में तब्दील हो चुका है। परिसर के अंदर ही ‘क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला’ (रीजनल एफएसएल) की विधिवत शुरुआत कर दी गई है। पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से इसकी अधिसूचना जारी की गई थी, जिसके बाद अब पुलिस पदाधिकारियों को फॉरेंसिक और वैज्ञानिक अनुसंधान का उच्च स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा, प्रशिक्षुओं को पुलिस की व्यावहारिक कार्यप्रणाली से रूबरू कराने के लिए परिसर में ही एक ‘मॉडल थाना’ स्थापित किया गया है। आपदा प्रबंधन और विशेष ऑपरेशंस की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अकादमी में घुड़सवारी और डॉग स्क्वॉड की ट्रेनिंग के साथ-साथ एक इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का स्विमिंग पूल भी शुरू किया गया है। डीजीपी ने स्पष्ट किया कि बिहार जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य में पुलिसकर्मियों का तैराकी में निपुण होना उनके जीवन रक्षा और रेस्क्यू ऑपरेशंस के लिए अनिवार्य है। परिसर में ढांचागत निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, केवल एक विशाल सभागार (ऑडिटोरियम) का कार्य अंतिम चरण में है, जिसे एक महीने के भीतर पूरा करने का सख्त निर्देश दिया गया है। 1895 से शुरू हुआ पुलिस प्रशिक्षण का ऐतिहासिक सफर पुलिस बल में प्रशिक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए डीजीपी विनय कुमार ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्ष 1861 में पुलिस अधिनियम लागू होने के बावजूद शुरुआती 35 वर्षों तक देश में कोई पुलिस प्रशिक्षण केंद्र नहीं था। 1895 में पहली बार बंगाल, मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसी कड़ी में तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेंसी (जिसमें आज का उड़ीसा, बंगाल, झारखंड और बिहार शामिल था) के आईजीपी मिस्टर हेनरी के नेतृत्व में 1895 में बिहार के नाथनगर (भागलपुर) में ‘पुलिस ट्रेनिंग स्कूल’ की स्थापना हुई। इसे मूल रूप से पटना के बांकीपुर में बनना था, लेकिन यह नाथनगर में शुरू हुआ। वर्ष 1902 में पुलिस आयोग के गठन के बाद 1907 में पहली बार पुलिस उपाधीक्षक के पद का सृजन हुआ। डीएसपी स्तर के अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए नाथनगर के केंद्र को अपग्रेड करने की जरूरत महसूस हुई। भागलपुर की जलवायु (मौसम) अनुकूल न होने के कारण वर्ष 1908 में इस ट्रेनिंग स्कूल को रांची स्थानांतरित कर दिया गया और इसे ‘पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज’ का नाम दिया गया। बाद में 1912 में जब बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग किया गया, तो इस कॉलेज को रांची से हजारीबाग शिफ्ट कर दिया गया। डीजीपी ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि आईपीएस अधिकारियों, डीएसपी और सब-इंस्पेक्टर स्तर के सभी पुलिसकर्मियों का प्रशिक्षण हजारीबाग के इसी पीटीसी में होता था। झारखंड बंटवारे के बाद बिहार में पैदा हुआ प्रशिक्षण का भारी संकट डीजीपी ने वर्ष 2000 में बिहार और झारखंड के बंटवारे के बाद पुलिस महकमे के सामने खड़ी हुई सबसे बड़ी ढांचागत चुनौती का जिक्र किया। राज्य के बंटवारे के बाद मिलिट्री पुलिस ट्रेनिंग स्कूल (पदमा), पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज (हजारीबाग) और ट्रैफिक ट्रेनिंग स्कूल (जमशेदपुर) झारखंड के हिस्से में चले गए। बिहार के पास केवल नाथनगर का सिपाही प्रशिक्षण स्कूल ही बचा रह गया था। ऐसे में बिहार सरकार के सामने हजारीबाग पीटीसी की तर्ज पर राज्य के अंदर ही सब-इंस्पेक्टर और डीएसपी स्तर के अधिकारियों के लिए एक नई और अत्याधुनिक अकादमी स्थापित करने की भारी चुनौती खड़ी हो गई थी। 2004 की सब-इंस्पेक्टर बहाली और 2008 में अकादमी की अधिसूचना इस चुनौती का सीधा असर 2004 में विज्ञापित हुई सब-इंस्पेक्टर की भारी-भरकम बहाली पर पड़ा। डीजीपी ने बताया कि 2006 में इस बैच का फिजिकल टेस्ट पूरा हो चुका था, लेकिन कई कानूनी पेचीदगियों और जटिलताओं के कारण बहाली फंसी हुई थी। वर्ष 2007 में डीआईजी (मुख्यालय) के पद पर रहते हुए विनय कुमार ने खुद 4-5 महीने तक लगातार बैठकों की श्रृंखला आयोजित कर इस बहाली प्रक्रिया की आपत्तियों का निराकरण किया था। प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए पुलिस विभाग के ही एक आईजी रैंक के अधिकारी को कर्मचारी चयन आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। जब 1500 से 2000 सब-इंस्पेक्टर बहाल हुए, तो सबसे बड़ा सवाल उनके प्रशिक्षण का था। 1994 बैच के दारोगा को ट्रेनिंग के लिए पटियाला (पंजाब), हजारीबाग और नाथनगर भेजा गया था। लेकिन राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण देने की जरूरत महसूस की गई। इसी भारी दबाव और जरूरत के बीच, हजारीबाग पीटीसी की स्थापना के ठीक 100 साल बाद, वर्ष 2008 में ‘बिहार पुलिस अकादमी’ की आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। तब तक 2009 बैच के दारोगा को नाथनगर और जमालपुर बीएमपी के अस्थायी केंद्रों पर आधारभूत संरचना विकसित कर ट्रेनिंग दी गई। राजगीर कैंपस के निर्माण में आई बाधाएं और देरी राजगीर स्थित इस वर्तमान परिसर के निर्माण के संघर्षों को उजागर करते हुए डीजीपी ने बताया कि वर्ष 2009 में राजगीर में ही कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री द्वारा इस परिसर का शिलान्यास किया गया था। उस वक्त विनय कुमार आईजी रेलवे के पद पर थे और टेंडर कमेटी के सदस्य थे। निर्माण का ठेका पब्लिक सेक्टर की कंपनी बीपीआईएल को दिया गया था, लेकिन संवेदक ने समय पर कार्य पूरा नहीं किया। कई बार दंडात्मक कार्रवाइयां करनी पड़ी। वर्ष 2021 में जब विनय कुमार ने सीएमडी के तौर पर कमान संभाली, तब भी कैंपस में स्विमिंग पूल और अन्य कई कार्य अधूरे पड़े थे, जिन्हें उनके कार्यकाल में युद्धस्तर पर पूरा कराया गया। उन्होंने बताया कि अंतिम बचे ऑडिटोरियम के लिए तीन-तीन बार टेंडर करना पड़ा है और अब जाकर वह अंतिम चरण में पहुंचा है। अब तक 8000 से अधिक अफसरों की ट्रेनिंग डीजीपी ने आंकड़ों के हवाले से बताया कि अस्थायी नाथनगर केंद्र से लेकर राजगीर अकादमी तक, अब तक लगभग 3000 अधिकारियों और 8000 से अधिक पुलिस अवर निरीक्षकों व पुलिस उपाधीक्षकों को यहां से मौलिक प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इसके अतिरिक्त, सेवा में कार्यरत 107 से अधिक डीएसपी रैंक के अधिकारियों और 400 से अधिक सब-इंस्पेक्टर्स का इन-सर्विस ट्रेनिंग प्रोग्राम और रिफ्रेशर कोर्स भी सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है। अपने अस्तित्व के मात्र एक दशक के भीतर ही बिहार पुलिस अकादमी ने वर्ष 2021-22 में लगातार दो साल ‘पूर्वी भारत का सर्वोत्कृष्ट प्रशिक्षण संस्थान’ होने का राष्ट्रीय गौरव हासिल किया है। सिर्फ ज्ञान नहीं, रणनीति, धैर्य और फील्ड क्राफ्ट है असली पुलिसिंग प्रशिक्षु अधिकारियों को कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए डीजीपी विनय कुमार ने पुलिसिंग के मूल सिद्धांतों को परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्यप्रणाली केवल किताबी ज्ञान के आधार पर संचालित नहीं हो सकती। संगठित अपराध, आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए धैर्य, साहस, वीरता और ऑपरेशनल कुशलता की आवश्यकता होती है। उन्होंने अपने करियर के शुरुआती 7-8 वर्षों में नक्सल प्रभावित चतरा, पलामू और गढ़वा जिलों में कमांडेंट और एसपी के तौर पर बिताए गए बेहद चुनौतीपूर्ण कार्यकाल का जमीनी अनुभव साझा किया। डीजीपी ने बताया कि उन दिनों उग्रवादियों से लड़ते हुए करीब आधा दर्जन से अधिक बार हमारी टीम एंबुश (घात लगाकर किए गए हमले) में फंसी। उस वक्त यह अहसास हुआ कि आपका किताबी ज्ञान चाहे कम हो, लेकिन यदि आप फील्ड क्राफ्ट और रणनीति में निपुण हैं, तो आप किसी भी जानलेवा चुनौती का सामना कर सकते हैं। पुलिस अधिकारी को एक कुशल रणनीतिकार होना ही पड़ेगा, अन्यथा सफलता की कोई गारंटी नहीं है। 4000 क्षमता वाला कांस्टेबल स्कूल अंतिम चरण में डीजीपी ने बताया कि बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। उनके आईजी ट्रेनिंग (2011-2013) रहने के दौरान डुमरांव एमटीपीसी और सिमुलतला एसटीएस को अधिसूचित किया गया था। डुमरांव में काम चल रहा है, जबकि सिमुलतला में बाउंड्री का काम जारी है और 1-2 साल में वह भी कार्यरत हो जाएगा। इसके अलावा बांका, बेतिया और मोतिहारी में भी नए प्रशिक्षण केंद्रों के लिए जमीन अधिग्रहित कर ली गई है, जो अगले 4-5 वर्षों में शुरू हो जाएंगे। सबसे बड़ी घोषणा करते हुए डीजीपी ने बताया कि राजगीर में बिहार पुलिस अकादमी के ठीक बगल में 20-21 एकड़ जमीन पर 4000 क्षमता वाले एक विशाल ‘कांस्टेबल ट्रेनिंग स्कूल’ का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। इसका शिलान्यास 10 साल पहले हुआ था, लेकिन मामला कोर्ट में फंसने के कारण इसमें देरी हुई। अब निर्माण अंतिम चरण में है। इसके शुरू होने के बाद राजगीर में एक ही स्थान पर अकादमी और सिपाही स्कूल को मिलाकर कुल 6000 पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण की विश्वस्तरीय व्यवस्था मुकम्मल हो जाएगी। 2008 का संकल्प आज बना उत्कृष्ट संस्थान: निदेशक अकादमी की निदेशक और आईपीएस आर. मलार विझी ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि आज बिहार पुलिस और अकादमी के लिए बेहद ऐतिहासिक और हर्ष का दिन है। वर्ष 2008 में बिहार के लिए एक विश्वस्तरीय पुलिस अकादमी की स्थापना का जो संकल्प लिया गया था, वह आज एक उत्कृष्ट और वाइब्रेंट संस्थान के रूप में सबके सामने खड़ा है। उन्होंने अकादमी को इस मुकाम तक पहुंचाने में योगदान देने वाले सभी पदाधिकारियों और कर्मियों की कड़ी मेहनत को नमन करते हुए कहा कि इन्हीं प्रयासों से आज हम राज्य को बेहतरीन प्रशिक्षित पुलिस पदाधिकारी दे पा रहे हैं। इस गौरवमयी अवसर पर पूरे पुलिस परिवार को शुभकामनाएं दी और कहा कि अकादमी भविष्य में भी इसी तरह राज्य की कानून-व्यवस्था को मजबूत करने वाले बेहतरीन अफसर तैयार करती रहेगी। कार्यक्रम के समापन पर अकादमी के उप निदेशक अभय कुमार लाल ने मुख्य अतिथि, उपस्थित अधिकारियों, जवानों और मीडिया बंधुओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। शानदार मार्च पास्ट और परेड के निष्क्रमण के साथ 18वें स्थापना दिवस का यह ऐतिहासिक समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
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'पुलिस कोई सामान्य नौकरी नहीं है, भय-घबराहट की गुंजाइश नहीं':बिहार पुलिस अकादमी का स्थापना दिवस समारोह; डीजीपी बोले- 10 हजार पुलिसकर्मियों की बहाली होगी
