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धर्म सम्राट स्वामी करपात्रीजी महाराज का प्रादुर्भाव महोत्सव आज श्रावण शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं और संत-महात्माओं ने महाराज श्री के अद्भुत शास्त्र ज्ञान, धर्मनिष्ठ जीवन, साधना और जनकल्याणकारी विचारों को स्मरण किया। आचार्य श्रीकान्त शास्त्री, कोलकाता ने कहा कि करपात्रीजी महाराज का व्यक्तित्व अद्भुत प्रतिभा, अनुपम पांडित्य, तर्कशक्ति और अदम्य स्मरण शक्ति का संगम था। शास्त्रों के गहन अध्येता और धर्म साधक थे महाराज श्री आचार्य श्रीकान्त शास्त्री ने बताया कि स्वामी करपात्रीजी महाराज की वेद, दर्शन, तंत्र और धर्मशास्त्रों पर असाधारण पकड़ थी। उनकी शास्त्रानुकूल तर्क शैली और विषय की गहराई में जाने की क्षमता बड़े-बड़े देशी-विदेशी विद्वानों को भी आश्चर्यचकित कर देती थी। धर्माचरण, स्पष्टवादिता और जनकल्याणकारी सिद्धांत उनके जीवन के प्रमुख आधार थे। महाराज श्री की दैनिक जीवनचर्या भी अत्यंत अनुशासित और साधनामय थी। वे त्रिकाल स्नान, त्रिकाल भगवदर्चन, विशेष पूजन, विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन और नियमित योग साधना करते थे। सभी से मधुर और सरल व्यवहार करना, लोगों के प्रश्नों का शास्त्रसम्मत समाधान देना और कथा-प्रवचन के निमंत्रण स्वीकार करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। वे ब्रह्ममुहूर्त में परिभ्रमण करते और निरंतर भगवान का नाम जपते रहते थे। लेखनी से दिए शास्त्र और दर्शन को नए आयाम स्वामी करपात्रीजी महाराज की साधना के साथ लेखन कार्य भी नियमित रूप से चलता रहा। उनकी लेखनी से अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई। उनके ग्रंथ तर्क, प्रमाण और गहन दार्शनिक चिंतन के लिए जाने जाते हैं। उनका विशाल ग्रंथ ‘वेदार्थ पारिजात’ धार्मिक और दार्शनिक विद्वानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें वेदांत के सिद्धांतों की तार्किक व्याख्या के साथ नास्तिक और विरोधी मतों के प्रश्नों का भी शास्त्रसम्मत उत्तर प्रस्तुत किया गया है। आचार्य श्रीकान्त शास्त्री के अनुसार इसके अध्ययन-मनन से तर्कशक्ति, सूक्ष्म चिंतन और सद्विचारों को मजबूती मिलती है। ‘सच्चिदानंद’ स्वरूप की तार्किक व्याख्या करपात्रीजी महाराज ने अपने ‘सर्वसिद्धान्त समन्वय’ जैसे ग्रंथों में विभिन्न दार्शनिक मतों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने चार्वाक जैसे नास्तिक मत तक का तार्किक विश्लेषण किया। उनके दर्शन में मनुष्य के अस्तित्व, चेतना और आनंद की अनुभूति को ईश्वर के ‘सत्, चित् और आनंद’ स्वरूप से जोड़ा गया है। उनका तर्क था कि व्यक्ति संसार, ईश्वर और धर्म-कर्म पर संदेह कर सकता है, लेकिन अपने अस्तित्व के अभाव को स्वयं सिद्ध नहीं कर सकता। इसी प्रकार ज्ञान की जिज्ञासा और आनंद की चाह मनुष्य के भीतर स्वाभाविक रूप से मौजूद रहती है। इसी आधार पर वे सच्चिदानंद स्वरूप भगवान की अवधारणा को तार्किक रूप से प्रस्तुत करते हैं। स्वामी करपात्रीजी महाराज का जीवन शास्त्र, साधना, धर्माचरण, लेखन और जनकल्याण के समन्वय का उदाहरण रहा। उनके प्रादुर्भाव महोत्सव पर देशभर में श्रद्धालु उनके विचारों और आध्यात्मिक योगदान को स्मरण कर रहे हैं।
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अद्भुत-पांडित्य और धर्म साधना के लिए प्रसिद्ध थे करपात्रीजी महाराज:देशभर में मनाया गया प्रादुर्भाव महोत्सव, शास्त्र ज्ञान और धर्म साधना को किया याद
