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गुरुग्राम में ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के मंच पर केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के तीखे बयान ने हरियाणा के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। राव इंद्रजीत न केवल अपनी बार-बार की जा रही अनदेखी से आहत बल्कि वे पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर की ‘पंजाबी लॉबी’ के साथ अहीरवाल में एक्टिव रहने से भी नाराज हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के सामने अहीरवाल के राव ने साफ कर दिया है कि वे दक्षिण हरियाणा की राजनीति पर किसी भी बाहरी और पंजाबी समुदाय के कब्जे के प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेंगे। विभाजन विभीषिका कार्यक्रम में जब राव को लगा कि आयोजन के बहाने पंजाबी वर्ग और मनोहर लाल खट्टर को ही मुख्य चेहरे के रूप में स्थापित किया जा रहा है, तो उनका सब्र टूट गया। उन्होंने मंच से पंजाबियों के बहाने मनोहर लाल को चेताया, “सिर्फ पंजाबी होने के नाम पर चुनाव लड़कर देख लें, पता चल जाएगा कितने वोट मिलते हैं।” राव का यह तीखा हमला सीधे तौर पर खट्टर और उनके करीबियों की ओर था, जो गुरुग्राम को अपना नया सियासी ठिकाना बनाने की कोशिश में जुटे हैं। अहीरवाल बनाम पंजाबी लॉबी: वर्चस्व की सीधी जंग राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा थी कि भाजपा के भीतर गैर-जाट और पंजाबी समीकरण को मजबूत करने की कोशिशें चल रही हैं। मनोहर लाल खट्टर की गुरुग्राम और आसपास के इलाकों में प्रशासनिक और सामाजिक सक्रियता लगातार बढ़ रही थी। राव इंद्रजीत सिंह को अपनी ही जमीन पर घेरने की इस अदृश्य स्क्रिप्ट को उन्होंने समय रहते भांप लिया। वोटों का गणित और ’36 बिरादरी’ के आंकड़े समझा दिए राव इंद्रजीत ने केवल बयान नहीं दिया, बल्कि मंच से भाजपा आलाकमान को दक्षिण हरियाणा के जमीनी आंकड़े भी समझा दिए। उन्होंने याद दिलाया कि गुरुग्राम नगर निगम के 36 पार्षदों में से केवल 2 ही पंजाबी समाज से आते हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री की कुर्सी अकेले पंजाबी समाज ने नहीं, बल्कि हरियाणा की “36 बिरादरियों” के सामूहिक समर्थन ने दी थी। तीन प्वाइंट में समझे राव इंद्रजीत के बयान के मायने…………….. वोट बैंक का गणित: दक्षिण हरियाणा में अहीर (यादव) और स्थानीय मूल निवासी मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है, जिनकी अनदेखी पार्टी को भारी पड़ेगी। ताकत का अहसास: राव ने साफ लहजे में चेतावनी दी कि “याद रखना, ताली दोनों हाथों से बजती है।” यानी अगर संगठन उनका सम्मान नहीं करेगा, तो चुनाव में अहीरवाल भी पार्टी का साथ छोड़ सकता है। समावेशी चेहरा: खुद को केवल एक जाति के दायरे से बाहर निकालकर उन्होंने ’36 बिरादरी’ का नैरेटिव सेट किया है। मनोहर खेमे की अहीरवाल में घुसपैठ की कोशिश यह पूरी लड़ाई केवल एक कार्यक्रम के प्रोटोकॉल की नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे और लोकसभा सीट से जुड़ी है। राव इंद्रजीत को अंदेशा है कि खट्टर खेमा अहीरवाल की कई महत्वपूर्ण सीटों पर अपने चहेतों को टिकट दिलाने की फिराक में है। भाषण के दौरान जब मंच संचालक ने कुर्ता खींचकर उन्हें रोकने की कोशिश की, तो राव माइक छोड़कर मंच से नीचे उतर गए। उनका यह ‘वॉकआउट’ दिल्ली दरबार को एक सख्त संदेश है कि अहीरवाल के टिकट केवल और केवल ‘राव’ की मर्जी से तय होंगे। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे भले ही भाजपा में हों, लेकिन उनके क्षेत्र में हुक्म सिर्फ उनका ही चलेगा। अहीरवाल के इस राजा की बगावती हुंकार ने भाजपा संगठन और मनोहर लाल खट्टर गुट को बैकफुट पर ला दिया है। जानिए क्यों टूटी मर्यादा और कैसे रची गई अनदेखी की स्क्रिप्ट………….. पहले निमंत्रण नहीं दिया गया: इस पूरे विवाद की पटकथा कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र से ही शुरू हो गई थी। ‘विभाजन विभीषिका स्मृति न्यास के संयोजक बोधराज सीकरी और स्थानीय प्रशासन के इस बड़े आयोजन में राव इंद्रजीत का नाम मुख्य वक्ताओं या प्रमुख अतिथियों की सूची में शामिल ही नहीं था। प्रदेशाध्यक्ष ने आमंत्रित किया: गुरूवार दोपहर तक जब राव के कार्यालय से मुख्यमंत्री कार्यालय ने संपर्क साधा, तब जाकर खुलासे हुए कि स्थानीय सांसद को औपचारिक न्योता तक नहीं भेजा गया है। इसके बाद आनन-फानन में हरियाणा भाजपा अध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता ने राव को फोन मिलाया और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के आने का हवाला देकर आमंत्रित किया। देर शाम जिला प्रशासन ने डिप्टी कमिश्नर के जरिए कार्ड भिजवाया। मंच मिलते ही दर्द छलका: मंच पर कदम रखते ही राव का यह दर्द छलक पड़ा जब उन्होंने कहा, “अगर पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन यहां नहीं आ रहे होते, तो आयोजक मुझे पूछते तक नहीं। मैं यहां किसी के बुलावे पर नहीं, बल्कि विभाजन का दंश झेलने वाले परिवारों के सम्मान में आया हूं।” बड़ा सवाल: क्या खट्टर की सक्रियता से छिन रहा है राव का गढ़? राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि क्या राव इंद्रजीत सिंह को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का डर सता रहा है? दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर की गुरुग्राम और आसपास के इलाकों में बढ़ती सक्रियता ने राव खेमे की धड़कनें बढ़ा दी हैं। गुरुग्राम लोकसभा सीट राव इंद्रजीत का अभेद्य किला माना जाता है, लेकिन खट्टर की यहां पैठ और प्रशासनिक बैठकों में उनका बढ़ता दखल राव को यह संदेश दे रहा है कि भविष्य में इस सीट से उनका टिकट काटकर मनोहरलाल या किसी पंजाबी चेहरे को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसी घेराबंदी को भांपते हुए राव ने समय रहते हुंकार भरी है। अनदेखी के कारण कांग्रेस छोड़ी थी, अब भाजपा में भी वही हाल साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राव इंद्रजीत सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर अहीरवाल की अनदेखी और रोहतक-केंद्रित विकास के आरोप लगाकर कांग्रेस को ‘बाय-बाय’ कह दिया था। उन्होंने आत्मसम्मान की खातिर भाजपा का दामन थामा। भाजपा में वे लगातार रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीतते रहे, लेकिन उन्हें कभी पूर्ण कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं मिला। जब भी हरियाणा में मुख्यमंत्री चुनने की बात आई, राव की दावेदारी को दरकिनार कर पहले मनोहर लाल खट्टर और फिर नायब सिंह सैनी को कमान सौंप दी गई। अब कांग्रेस को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा और विपक्ष अब जनता के बीच यह प्रचारित करेंगे कि जिस मान-सम्मान के लिए राव ने कांग्रेस छोड़ी थी, भाजपा में 12 साल रहने के बाद भी उन्हें वही उपेक्षा और अपमान झेलना पड़ रहा है। अहीरवाल बड़ी ताकत राव इंद्रजीत सिंह का यह कदम कोई तात्कालिक गुस्सा नहीं, बल्कि आलाकमान पर दबाव बनाने की एक बेहद सोची-समझी क्रोनोलॉजी है। वे जानते हैं कि अहीरवाल की सीटों पर उनके बिना भाजपा की नैया पार नहीं हो सकती।
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अहीरवाल के 'राव' का मनोहर के पंजाबी कार्ड पर निशाना:दक्षिण हरियाणा की राजनीति में कब्जे के प्रयास को चुनौती; कहा-"लड़कर देख लें चुनाव, पता चल जाएगा"
