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रायडीह के बख्तर साय और मुंडल सिंह ऐसे योद्धा रहे हैं, जिनका देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लेकिन जिस जगह अंग्रेजों से लड़ते हुए उन्होंने जान गंवाई थी, वह जगह आज भी उपेक्षित है। इस कारण वंशज और प्रखंडवासी खुद को उपेक्षित मान रहे हैं। शहीद बख्तर साय गुमला जिले के नवागढ़ बासुदेवकोना के जागीरदार थे। अंग्रेजों की कूटनीति, लूटनीति, अत्याचार के विरोध में उन्होंने क्रांति का उद्घोष किया। अंग्रेजों के कहने पर तत्कालीन रातू महाराजा ने अपने आदमी हीरा राम को क्षेत्र के लोगों से कर-चुंगी वसूली करने भेजा था। चूंकि यह उनके शासकीय क्षेत्र में आता था। लेकिन बख्तर ने वसूली करने आए हीरा का सिर काटकर वापस महाराजा के पास भेज दिया। इससे वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने इसकी सूचना ईस्ट इंडिया कंपनी को दी। 11 फरवरी 1812 को रामगढ़ मजिस्ट्रेट ने लेफ्टीनेंट एच.ओ. डोनेल के नेतृत्व में हजारीबाग की सैन्य टुकड़ी को नवागढ़ के जागीरदार को पकड़ने के लिए भेजा। बख्तर साय की मदद करने के लिए गुमला पनारी से मुंडल सिंह भी आ गए। वे उस समय पहाड़ पनारी परगना के परगनैत थे। दोनों ने मिलकर स्थानीय जनजातीय युवकों तथा किसानों की सेना तैयार की। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। उन्होंने अंग्रेजों को अनेक बार पराजित किया। दोनों के साथ सैकड़ों आंदोलनकारियों ने अपने पारंपरिक हथियार तीर-धनुष, तलवार, बरछे और देशी जुगाड़ के साथ अपना आशियाना बासुदेवकोना गढ़पहाड़ को चुना। गढ़पहाड़ में अभी भी अनेक गुफाएं हैं। उनमें वे छिपते थे। वे अंग्रेजों पर वार भी करते थे। बख्तर साय और मुंडल सिंह ने अपनी सेना के साथ गढ़पहाड़ के ऊपर बड़े-बड़े पत्थरों को लव की रस्सियों से बांधकर रखा था। वे पत्थरों का उपयोग अंग्रेजों को मारने के लिए करते थे। जब अंग्रेजों की बड़ी सेना गढ़पहाड़ पर हमला करने के लिए चढ़ रही थी। उसी दौरान लव की रस्सियों से बंधे पत्थरों की रस्सियां काट दी गईं। इसमें अंग्रेजों के ग्यारह सौ सैनिक गढ़पहाड़ से नीचे पत्थरों के साथ गिरते गए। वे मरते गए। गढ़पहाड़ में खून की नदी बहने लगी। गढ़पहाड़ के नीचे, जहां अंग्रेजों की बड़ी सेना मारी गई, वहां एक तालाब है। उसे आज भी लोग रक्तबाध के नाम से जानते हैं। उस घटना से अंग्रेज उग्र हो चुके थे। हजारीबाग से और बड़ी सेना भेजी गई। उन्होंने जनजातीय क्रांतिकारियों को छल से गिरफ्तार कर लिया। बख्तर साय व मुंडल सिंह पकड़े गए। उन्हें अंग्रेज कलकत्ता ले गए। 4 अप्रैल 1812 को फोर्ट विलियम, कोलकाता में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। मरकर भी ये बलिदानी अमर हो गए। जिनकी गाथा आज भी लोग गाते हैं।
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देश की आजादी में बख्तर साय और मुंडल सिंह ने जान दी, पर कर्मभूमि है उपेक्षित
