दैनिक भास्कर की ‘स्पाई फाइल्स’ सीरीज में आप पढ़ रहे हैं भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 22 साल की उम्र में IPS बने डोभाल को 1972 में भारत की खुफिया एजेंसी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ में शामिल कर लिया गया।
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मिजोरम में उग्रवादियों का भरोसा जीतने के लिए डोभाल ने सुअर का मांस खिलाया।1988 में रिक्शेवाला के भेष में ISI एजेंट बनकर सिख चरमपंथियों को सरेंडर कराया। इसके बाद डोभाल को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। तब डोभाल यह अवॉर्ड पाने वाले पहले IPS अफसर थे, लेकिन उनकी असली परीक्षा बाकी थी… पार्ट-2 में आगे की कहानी…
1970 का दशक… हिमालय की वादियों में बसा सिक्किम तब एक आजाद रियासत हुआ करता था। चीन और अमेरिका ने इस पर नजरें गड़ा रखी थीं। राजा के ज्यादातर फैसले अमेरिका के इशारे पर हो रहे थे।
दरअसल, सारा खेल नक्शे के एक छोटे से हिस्से का था।
चीन की चुंबी घाटी से सटा हुआ भारत की जमीन का एक संकरा टुकड़ा है- महज 22 किलोमीटर चौड़ा। इसे दुनिया ‘चिकन नेक’ के नाम से जानती है। यह भारत को उसके पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ने वाला इकलौता जमीनी रास्ता है।
अगर सिक्किम पर अमेरिका या चीन का वर्चस्व हो जाता, तो ‘चिकन नेक’ पर तलवार लटक जाती। भारत से उसका पूर्वोत्तर कट जाता। भारत हरगिज ऐसा नहीं चाहता था।
तो क्या राजा की अमेरिकी गर्लफ्रेंड ये सब करवा रही थी…?
बात 1959 की है। शाम के 6 बज रहे थे। सिक्किम के युवराज पालदेन थोंडुप की मर्सिडीज कार दार्जिलिंग के विंडामेयर होटल के बाहर रुकी। उन्होंने अपनी पसंदीदा ड्रिंक ऑर्डर की। तभी उनकी नजर कोने में बैठी 19-20 साल की एक लड़की पर ठहर गई।
जल्द ही उन्होंने पता लगा लिया कि यह लड़की अमेरिका से भारत में छुट्टियां मनाने आई है।
युवराज तुरंत अपनी कुर्सी से उठकर लड़की के पास चले गए। बगल की कुर्सी पर बैठते हुए पूछा- ‘क्या नाम है आपका’?
लड़की ने झेंपते हुए बताया- ‘होप कुक।’
युवराज ने परिचय दिया और अपनी रियासत का गुणगान करने लगे। थोड़ी देर बाद लड़की, युवराज को बाय बोलकर वहां से चली गई।

सिक्किम के राज पालदेन और अमेरिकी लड़की होप कुक।
2 साल बाद…
वो लड़की फिर से दार्जिलिंग आई। दोपहर का वक्त था। वो होटल के लॉन में बैठी चाय पी रही थी, तभी युवराज वहां पहुंच गए।
युवराज ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘दार्जिलिंग की दोपहर और चाय… बिना किसी अच्छे दोस्त के अधूरी लगती है, होप।’
होप ने मुस्कुराकर चाय की एक प्याली युवराज की तरफ बढ़ा दी।
चाय की चुस्की लेते हुए युवराज बोले, ‘आज शाम मेरे साथ जिमखाना क्लब चलो। बहुत शानदार जगह है।’
होप ने हंसते हुए हां कह दिया।
उस शाम… दोनों जिम खाना क्लब में थे। युवराज, होप का हाथ थामे डांस कर रहे थे। धीरे-धीरे संगीत की रफ्तार धीमी हुई, तो युवराज ने होप को अपनी तरफ खींच लिया। उसके कान फुसफुसाए-‘मुझसे शादी करोगी?’
होप ने बिना एक पल गंवाए कहा, ‘हां… हां, थोडुप।’
युवराज ने तुरंत उसे गले लगा लिया।
अगले दिन युवराज उसे अपनी गाड़ी में बैठाकर राजमहल ले गए। राजमहल की खूबसूरती देखकर होप हैरान रह गई।
इसके बाद दोनों का मिलना-जुलना चलता रहा। 1963 में दोनों ने शादी कर ली। होप रानी बनकर अपने इशारे पर सिक्किम रियासत चलाने लगी। राजा के घर विदेशी मेहमानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया। खास तौर पर अमेरिकी अफसरों का।

सिक्किम के राजा और होप कुक। होप, राजा से 20 साल छोटी थी।
1966 में होप ने एक आर्टिकल में लिखा- ‘दार्जिलिंग, सिक्किम का हिस्सा होना चाहिए।’
होप का ये आर्टिकल जिस मैगजीन में छपा, उसका संबंध अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA से था। इसके बाद भारत में चर्चा होने लगी कि होप, CIA की एजेंट है।
भारत के अखबारों में भी होप को लेकर खबरें छपने लगीं। जिनकी हेडलाइंस कुछ इसप्रकार थीं- ‘CIA एजेंट के पंख निकले।’ एक अखबार ने लिखा- ‘ट्रोजन घोड़ी की गंगटोक में दस्तक।’
ये सारी खबरें दिल्ली में पीएम इंदिरा की टेबल तक पहुंच रही थीं, लेकिन तब वो दूसरे मोर्चों पर फंसी हुई थीं।
एक तरफ उनकी पार्टी में बगावत उठ रही थी, तो दूसरी तरफ मिजोरम उग्रवादियों की आग में झुलस रहा था। इसी दौरान पूर्वी पाकिस्तान में भी बंगालियों की बगावत उठी और फिर भारत-पाकिस्तान के बीच जंग हो गई।
16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से जंग जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने ठान लिया- ‘अब सिक्किम को हम लेकर रहेंगे।’ पर कैसे… ?
तभी उनके जेहन में भारत की खुफिया एजेंसी RAW का नाम उभरा। इसी एजेंसी ने 1971 की जंग का रोडमैप तैयार किया था।
दिसंबर 1972, दिल्ली में प्रधानमंत्री दफ्तर…
मेज पर सिक्किम का नक्शा और CIA की खुफिया रिपोर्ट्स पड़ी थीं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उनके प्रमुख सचिव पीएन हक्सर और RAW प्रमुख आरएन काव बैठे थे।
इंदिरा ने RAW प्रमुख की तरफ देखा, ‘आप सिक्किम को लेकर कुछ कर सकते हैं?’
आरएन काव ने कहा, ‘मुझे दो हफ्ते का वक्त चाहिए।’
ठीक 10 दिन बाद। आरएन काव दोबारा प्रधानमंत्री दफ्तर पहुंचे। उन्होंने इंदिरा से कहा, ‘मैडम, सिक्किम भारत का हिस्सा बनेगा… और वो भी बिना कोई गोली चलाए।’
इंदिरा ने चौंकते हुए पूछा, ‘कैसे?’
काव ने कहा, ‘चुनाव करवाकर।’
‘आपको लगता है ऐसा मुमकिन होगा?’ इंदिरा ने पूछा।
काव के लबों पर हल्की मुस्कान तैर गई, ‘बिल्कुल।’

1970 के दशक की तस्वीर। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ RAW चीफ आरएन काव। AI इमेज
RAW को मिशन सिक्किम के लिए ऐसा शख्स चाहिए था, जो अंदर तक जाकर अपनी पैठ बना सके। ये तलाश डोभाल पर जाकर खत्म हुई। वे उन दिनों मिजोरम के उग्रवादी कैंपों में सेंधमारी कर चुके थे।
डोभाल फौरन सिक्किम पहुंच गए। वे राजा के वफादारों, उसकी सेना और स्थानीय लोगों के बीच भेष बदलकर घूमने लगे। कुछ ही महीनों के भीतर उन्होंने जमीनी हकीकत भांप ली और एक सीक्रेट रिपोर्ट दिल्ली RAW दफ्तर भेजी।
रिपोर्ट में लिखा था- ‘लोग राजा से नाराज हैं। खास तौर पर नेपाली समुदाय।’
रिपोर्ट में एक चेहरे का भी जिक्र था- ‘काजी लेंडुप दोरजी।’
काजी, प्रधान लामा रह चुके थे। बौद्ध मठों के सबसे बड़े धार्मिक गुरू को लामा कहा जाता है। बाद में वे राजनीति में उतर गए और नेपालियों के हक और अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे। 1962 में उन्होंने पार्टी बनाई- ‘सिक्किम नेशनल कांग्रेस।’
डोभाल का मानना था- ‘काजी को आगे करके राजा को चुनाव में हराया जा सकता है।’
RAW के अधिकारियों ने काजी से मुलाकात की और उन्हें साफ-साफ बता दिया कि भारत की खुफिया एजेंसी आपके साथ है। चुनाव की तैयारी करिए। शुरुआत में काजी को यकीन नहीं हुआ, लेकिन फिर वे राजी हो गए।
अब RAW के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं- सिक्किम की जनता को राजशाही के खिलाफ बगावत के लिए तैयार करना और फिर वहां चुनाव का माहौल बनाना।
डोभाल भेष बदल-बदलकर हर इलाके में पहुंचे, समाज के हर तबके से मिले और धीरे-धीरे राजशाही के खिलाफ बगावत की आग को हवा देने लगे।
वहां नेपालियों की आबादी 70% थी, लेकिन राजा उनके समुदाय का नहीं था। डोभाल ने नेपाली और गैर-नेपाली समुदाय के इसी फासले को हथियार बना लिया।
डोभाल ने वहां के लोगों को समझाया कि अगर वे बगावत करते हैं, तो भारत की सेना उनके पीछे खड़ी रहेगी।
धीरे-धीरे जनता ने बगावत का मन बना लिया, लेकिन राजा चुनाव के लिए तैयार नहीं था। भारत सीधे तौर पर ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। क्योंकि इससे दुनिया में गलत मैसेज जाता। सिक्किम की जनता भी भड़क जाती।
डोभाल का दिमाग दौड़ा…
एक रोज वे बिचौलिया राजमहल पहुंच गए। डोभाल ने राजा और रानी का भरोसा जीता। फिर कहा- ‘मेरे पास पक्की रिपोर्ट है। जनता आपके साथ खड़ी है। चुनाव करवाकर हमेशा के लिए भारत का मुंह बंद कर दीजिए।’
राजा ने डोभाल पर भरोसा कर लिया। होप को भी यही लगा कि अगर चुनाव हुए, तो वे अपनी फौज के दम पर आसानी से जीत जाएंगे।

सिक्किम के राजा पालदेन, उसकी पत्नी होप और अजीत डोभाल। AI इमेज
लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, राजा समझ गया कि उसके साथ खेल हो चुका है। उसने चुनाव कराने से इनकार कर दिया। रानी होप भी इसे भारत की साजिश बताते हुए विदेशी नेताओं को चिट्ठियां लिखने लगीं।
लेकिन तब तक डोभाल अपना काम कर चुके थे।
अप्रैल 1973 में नाराज भीड़ ने राजमहल को घेर लिया। सिक्किम की पुलिस और राजा की सेना भीड़ को रोकने में नाकाम रही। घबराए राजा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को फोन मिलाया और मदद की गुहार लगाई।
भारत की खुफिया एजेंसी यही तो चाहती थी।
6 अप्रैल 1973 को भारत की सेना सिक्किम पहुंच गई। दो दिनों के भीतर सिक्किम का प्रशासन भारत सरकार के हाथों में था।
राजा के पास चुनाव कराने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा। 8 मई 1973 को एक समझौता हुआ। तय हुआ कि भारत के निर्वाचन आयोग की देखरेख में सिक्किम में चुनाव होंगे।
होप समझ चुकी थी कि उसके हाथ से सब कुछ निकल चुका है। अगस्त 1973 में वह अपने दो बच्चों के साथ अमेरिका चली गई।
बाद में पता चला कि होप ने राजमहल की कई महंगी पेंटिंग्स और कीमती तोहफें चोरी-छिपे अमेरिका भेजवा दी थी।
8 अप्रैल 1974 को सिक्किम में मतदान हुआ। कुल 32 सीटों में से 31 सीटें काजी की पार्टी सिक्किम नेशनल कांग्रेस ने जीत ली। सिर्फ एक सीट राजा की पार्टी को मिली।
काजी दोरजी सिक्किम के पहले प्रधानमंत्री बने। राजा की भूमिका नाम मात्र के संवैधानिक प्रमुख की रह गई।
लेकिन राजा ने ठसक नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री काजी जो भी कानून बनाते राजा उस पर दस्तखत करने से इनकार कर देता। काजी ने भारत से मदद की गुहार लगाई।

साल 1966, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ सिक्किम के राजा और रानी।
इधर, डोभाल ने पता कर लिया था कि राजा के पास सैनिक कितने हैं, उनके पास कौन-कौन से हथियार हैं और उनके ठिकाने कहां हैं… यानी अगर राजा अपनी फौज उतारता, तो उससे निपटने का भी बंदोबस्त डोभाल ने कर रखा था।
6 अप्रैल 1975 की सुबह। घड़ी में 6 बज रहे थे। सिक्किम के राजा को भारतीय सैनिकों के ट्रकों की आवाज सुनाई पड़ी। वह दौड़ कर खिड़की के पास पहुंचे। 5 हजार भारतीय सैनिकों ने राजमहल को घेर रखा था।
तभी गेट पर तैनात संतरी ने राइफल तानते हुए कहा- ‘रुक जाओ।’ उसकी बात पूरी होने से पहले ही भारतीय सेना की मशीनगन से निकली गोली उसके छाती में के आर-पार जा चुकी थी। वह वहीं गिर पड़ा।
आधे घंटे के भीतर राजा के 243 गार्डों ने सरेंडर कर दिया। राजा को महल में ही नजरबंद कर दिया गया।
14 अप्रैल 1975 को सिक्किम में जनमत संग्रह कराया गया। 97% जनता ने राजा के खिलाफ मतदान किया। दो दिन बाद यानी 16 अप्रैल को सिक्किम का विलय भारत में हो गया।
सिक्किम, भारत का 22वां राज्य बन गया। डोभाल को पुलिस मेडल से नवाजा गया। तब डोभाल ये अवॉर्ड पाने वाले सबसे कम उम्र के पुलिस अफसर थे।
अब डोभाल का सबसे खतरनाक मिशन पाकिस्तान शुरू होने वाला था…
अंडरकवर एजेंट बनकर डोभाल पाकिस्तान पहुंच गए। वे 6 साल तक वहां अलग-अलग शहरों में भेष बदलकर घूमते रहे।
उन्होंने यह पता लगाया कि पाकिस्तान रावलपिंडी के पास कहूटा में परमाणु बम बना रहा है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI खालिस्तानी उग्रवादियों को ट्रेनिंग हथियार मुहैया करा रही है।
इस दौरान एक रोज डोभाल की पहचान उजागर हो गई…
लाहौर का औलिया मजार। शाम का वक्त था। डोभाल मजार के पास से गुजर ही रहे थे कि बाहर बैठे एक बुजुर्ग की नजर उन पर पड़ी। लंबी सफेद दाढ़ी, चेहरे पर झुर्रियां- पहली नजर में वह कोई मौलवी ही लगता था।
जैसे ही डोभाल आगे बढ़े, उसने आवाज लगाई, ‘सुनो… इधर आओ।’
डोभाल उसके करीब आकर अदब से बोले, ‘जी… मुझसे कुछ काम है?’
बुजुर्ग ने सीधे पूछा, ‘तुम हिंदू हो ना?’
डोभाल ने झट से कहा, ‘नहीं जनाब, मैं मुस्लिम हूं।’
बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए डोभाल की बांह थाम ली और कहा, ‘चलो मेरे साथ।’
डोभाल के धड़कनें तेज हो गईं। मन में खटका, लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। खामोशी से उसके पीछे चल दिए।

लाहौर में मौलवी के साथ अजीत डोभाल। AI इमेज
बुजुर्ग उन्हें मजार के पीछे एक छोटे से अंधेरे कमरे में ले गया। दरवाजा बंद करके पलटा और बोला, ‘झूठ मत बोलो भाई। तुम्हारे कान छिदे हुए हैं। मुसलमानों में मर्दों के कान छिदवाने का रिवाज नहीं होता।’
डोभाल कोई जवाब सोच ही रहे थे कि बुजुर्ग बोल पड़ा, ‘घबराओ मत… मैं भी हिंदू ही हूं।’
उसने डोभाल को खाट पर बिठाया और गहरी सांस लेते हुए बोला, ‘बंटवारे के वक्त… मेरी आंखों के सामने पूरे परिवार को काट डाला गया। मैं किसी तरह जिंदा बचा। जान बचाने के लिए फकीर का चोला पहन लिया। तब से अपनी पहचान दफन करके जी रहा हूं।’
डोभाल चुपचाप उसकी बात सुनते रहे। फिर बुजुर्ग ने डोभाल से कहा, ‘अगर इस मुल्क में रहकर काम करना है… तो सबसे पहले कान की प्लास्टिक सर्जरी करवा लो। वरना किसी दिन मारे जाओगे।’
उसने अपने फटे हुए कुर्ते की जेब से कुछ रुपए निकाले और डोभाल की हथेली पर रख दिए। जल्द ही डोभाल ने एक भरोसेमंद डॉक्टर से संपर्क किया और अपने कानों की प्लास्टिक सर्जरी करवा ली।
पाकिस्तान से लौटने के बाद डोभाल की अग्नि परीक्षा की बारी थी…
24 दिसंबर 1999…काठमांडू का त्रिभुवन हवाई अड्डा। शाम के ठीक साढ़े चार बजे थे। इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी। 176 यात्री और 15 क्रू मेंबर्स सवार थे।
शाम पांच बजे। विमान जैसे ही भारतीय हवाई क्षेत्र में दाखिल हुआ, पांच नकाबपोश अपनी सीटों से उठे। वे कॉकपिट के दरवाजे को धक्का देकर अंदर घुसे। एक ने पिस्टल की नली पायलट की कनपट्टी पर टिका दी।
‘इसे फौरन लाहौर लेकर चलो।’ पायलट वह कुछ बोल पाता, उससे पहले ही दूसरे नकाबपोश ने चिल्लाते हुए कहा- ‘होशियारी दिखाई, तो जहाज को हवा में ही उड़ा देंगे।’
पायलट ने विमान का रुख लाहौर की तरफ मोड़ दिया, लेकिन फ्यूल का कांटा तेजी से नीचे गिर रहा था। मजबूरन, शाम 7 बजकर 5 मिनट पर जहाज को अमृतसर में उतारना पड़ा।
उधर, दिल्ली में हड़कंप मच चुका था। सुरक्षा एजेंसियों के हाथ-पांव फूल चुके थे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी बैठकें कर रहे थे।
रात 7 बजकर 51 मिनट। हाईजैकर्स के पास कहीं से खबर पहुंच गई कि भारतीय सेना के स्पेशल कमांडोज एक्शन में आ चुके हैं।
‘इसे अभी के अभी उड़ाओ, लाहौर चलो।’ हाइजैकर ने बौखलाकर पिस्टल पायलट की कनपट्टी पर और जोर से गड़ा दिया।
‘लेकिन हमारे पास फ्यूल नहीं है।’ पायलट ने हांफते हुए कहा।
हाईजैकर चिल्लाया- ‘जहाज क्रैश होने से पहले तेरे भेजे में गोली मारूंगा।’
पायलट ने विमान का रुख लाहौर की तरफ मोड़ दिया।
कुछ ही देर में IC 814 लाहौर के आसमान पर चक्कर काट रहा था। लाहौर एयरपोर्ट के अफसरों ने रनवे की बत्तियां बुझा दी थीं। वे लैंडिंग की परमिशन नहीं दे रहे थे।
‘बत्तियां जलाओ वरना विमान लाहौर के ऊपर ही क्रैश हो जाएगा।’ पायलट ने कहा।
आनन-फानन में लैंडिंग की इजाजत मिली, लेकिन पाकिस्तानी अफसरों ने साफ-साफ कहा दिया- ‘इसे तुरंत यहां से ले जाओ।’
फ्यूल भरने के बाद विमान फिर से आसमान में था। रात 1:45 बजे विमान दुबई पहुंचा। वहां की सरकार ने सख्त शर्त रखी- फ्यूल तभी मिलेगा जब यात्रियों को छोड़ोगे। तीखी तकरार के बाद आतंकियों ने 27 यात्रियों को छोड़ दिया, लेकिन एक यात्री की बेरहमी से हत्या कर दी।
अब जहाज की अगली मंजिल थी- कंधार, अफगानिस्तान। जहां, तालिबानी राज था। आतंकियों के लिए सबसे मुफीद जगह।

कंधार एयरपोर्ट पर खड़ा भारतीय विमान और हथियार लिए तैनात तालिबानी लड़ाके।
25 दिसंबर की सुबह 8:30 बजे, विमान कंधार उतरा। पाकिस्तानी आतंकी संगठन ‘हरकत-उल-मुजाहिदीन’ के इन आतंकियों ने भारत सरकार के सामने 38 शर्तें रख दीं।
भारतीय जेलों में बंद 36 आतंकियों की रिहाई, कश्मीरी अलगाववादी सज्जाद अफगानी का शव और 20 करोड़ डॉलर की फिरौती।
दिल्ली में रात-रात भर बैठकों का दौर चला। दांव पर 155 बेगुनाहों की सांसें थीं।
27 दिसंबर की शाम। कंधार के रनवे पर भारत का एक विशेष विमान उतरा। उसमें भारत सरकार के पांच प्रतिनिधि शामिल थे। इसमें एक अजीत डोभाल भी थे। तब डोभाल इंटेलिजेंस ब्यूरो में एडिशनल डायरेक्टर थे।
अगले तीन दिनों तक कंधार में हाईजैकरों और डोभाल के बीच बातचीत चलती रही।
डोभाल ने 20 करोड़ डॉलर की फिरौती और शव सौंपने की मांग को पूरी तरह खारिज करवा दिया। इतना ही नहीं, 36 आतंकियों की लिस्ट को समेटकर 3 पर लाकर खड़ा कर दिया।
31 दिसंबर की शाम। साल का आखिरी दिन। विदेश मंत्री जसवंत सिंह एक विशेष विमान से उन तीन आतंकियों को लेकर कंधार पहुंचे।
हाईजैकर्स ने एक-एक कर तीनों आतंकियों का चेहरा पहचान। फिर 155 भारतीय यात्रियों को रिहा कर दिया। रिहाई के वक्त हाईजैकरों ने अजीत डोभाल को एक दूरबीन गिफ्ट किया था।
लेकिन इस रिहाई की भारी कीमत देश ने चुकाई। रिहा हुए उन तीन आतंकियों में एक नाम था- मसूद अजहर। वही अजहर, जिसने महज एक महीने बाद ‘जैश-ए-मोहम्मद’ की नींव रखी और 2001 में संसद पर हमला कर दिया।
उस वक्त RAW चीफ रहे एएस दुलत एक आर्टिकल में लिखते हैं- ‘कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि तीन आतंकियों को क्यों रिहा किया, लेकिन ये डोभाल का ही बूता था कि उन्होंने हाइजैकर्स को यात्रियों को छोड़ने के लिए राजी किया। वो भी तब जब तालिबान से हमारा कोई संबंध नहीं था।’

कंधार एयरपोर्ट पर आतंकी हाइजैकरों से डील करते हुए अजीत डोभाल।
यूपीए सरकार के दौरान जुलाई 2004 में डोभाल इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर बने और जनवरी 2005 में रिटायर हो गए। इसके बाद भी वे खुफिया ऑपरेशनों से जुड़े रहे।
अगस्त 2005 के विकीलीक्स केबल की रिपोर्ट के मुताबिक डोभाल ने दाऊद इब्राहिम पर हमला करवाने की योजना बनाई थी, लेकिन मुंबई पुलिस के कुछ अधिकारियों की वजह से इसे अंतिम समय पर अंजाम नहीं दिया जा सका।
2009 में डोभाल ने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर रिसर्च के लिए दिल्ली में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की नींव रखी और इसके फाउंडिंग डायरेक्टर रहे। इस संस्था का संबंध RSS से जुड़े विवेकानंद केंद्र से है।
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया। अभी भी वे इस पद पर बने हुए हैं।
सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयरस्ट्राइक, आर्टिकल 370 खत्म करना, श्रीलंका में 6 भारतीय मछुआरों को फांसी दिए जाने से एक दिन पहले माफी दिलवाना और देपसांग और देमचोक इलाके में स्थायी चीनी कैपों को हटाने में डोभाल की अहम भूमिका मानी जाती है।
हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स पठानकोट हमला, गुरुदासपुर हमला और कश्मीर में आतंकवाद को लेकर डोभाल की रणनीति पर सवाल भी उठाते हैं।
अजीत डोभाल की कहानी का पार्ट-1 भी पढ़िए :

नोट : कहानी को रोचक बनाने के लिए कुछ सीन रूपांतरित किए गए हैं…
रेफरेंस :
- Ajit Doval : On a Mission : D Devdatt, Mahesh Wagh
- A Life in the Shadows : A.S Dulat
- Kashmir: The Vajpayee Years : A.S Dulat
- Dongri to Dubai : S. Hussain Zaidi
- Time Change : By Hope Cooke
- Memoirs of an Indian Diplomat : B.S Das
