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Manoj Kumar Jha Column | Democracy Ethics AI Machines Human Values India


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10 मिनट पहले

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प्रो. मनोज कुमार झा राजद से राज्यसभा सांसद - Dainik Bhaskar

प्रो. मनोज कुमार झा राजद से राज्यसभा सांसद

कुछ व्यक्तित्व इतिहास के किसी एक अध्याय के पात्र नहीं रहते, बल्कि प्रत्येक पीढ़ी के सामने एक नैतिक प्रश्न बनकर उपस्थित होते हैं। महात्मा गांधी और चंद्रशेखर ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। उन्हें साथ-साथ स्मरण करना लोकतंत्र की दो ऐसी परंपराओं को पुनः पढ़ना है, जिन्होंने सत्ता से अधिक समाज पर भरोसा किया।

दोनों के जीवन में यात्राओं का विशेष महत्व था। गांधी ने भारत को पैदल, रेल और बैलगाड़ी से जाना; चंद्रशेखर ने सत्ता के गलियारों से बाहर निकलकर समाज की धड़कनों को समझने के लिए भारत-यात्रा की। वे जानते थे कि भारत की आत्मा गांवों की धूल, कस्बों की बेचैनी और साधारण नागरिक की आकांक्षाओं में बसती है। यात्रा उनके लिए समाज का अध्ययन थी।

आज का भारत अभूतपूर्व तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। दूरियां सिमटी हैं, सूचना का विस्फोट हुआ है और एआई हमारे निर्णयों को प्रभावित कर रहा है। तकनीक ने हमारी गति बढ़ाई है, पर क्या उसने संवेदना भी गहरी की है? यही वह प्रश्न है, जहां गांधी और चंद्रशेखर भविष्य के मार्गदर्शक बनकर सामने आते हैं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी तब शुरू होती है जब उसे केवल चुनावों तक सीमित कर दिया जाता है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव अवश्य हैं, पर उसका सार नहीं। जब नागरिक केवल मतदाता और राजनीति केवल चुनाव-प्रबंधन बनकर रह जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा क्षीण होने लगती है।

महात्मा गांधी के लिए लोकतंत्र कभी मात्र बहुमत का शासन नहीं था। उसकी कसौटी अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का सम्मान थी। गांधी कहते थे कि कानून मनुष्य को दंडित कर सकता है, पर उसे नैतिक नहीं बना सकता। करुणा किसी अधिनियम से पैदा नहीं होती और सह-अस्तित्व किसी न्यायिक आदेश से स्थापित नहीं किया जा सकता।

इसलिए लोकतंत्र अंततः मनुष्य के भीतर जन्म लेता है। यही कारण है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार का महत्व केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है। गांधी अपने प्रखर विरोधियों के प्रति भी सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करते थे। चंद्रशेखर संसद में तीखी आलोचना करते थे, लेकिन विरोध को कभी वैमनस्य में नहीं बदलने देते थे।

मतभेद लोकतंत्र की शक्ति है पर विरोधी का अमानवीकरण उसकी पराजय। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। अनेक भाषाएं, आस्थाएं, संस्कृतियां और जीवन-पद्धतियां मिलकर भारतीयता का निर्माण करती हैं। गांधी ने इसे भारत की आध्यात्मिक शक्ति माना, जबकि चंद्रशेखर ने सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता को एक-दूसरे का पूरक समझा।

आज जब पहचान की राजनीति कई बार संवाद की राजनीति पर भारी पड़ती दिखाई देती है, तब यह स्मरण आवश्यक है कि भारत की आत्मा एकरूपता नहीं, सह-अस्तित्व में बसती है। एआई के इस युग में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि मशीनें कितना सोच सकती हैं, बल्कि यह है कि क्या मनुष्य अब भी महसूस कर पा रहा है।

गांधी मशीनों के विरोधी नहीं थे; वे मनुष्य के विस्थापन के विरोधी थे। चंद्रशेखर भी विकास के नहीं; ऐसे विकास के विरोधी थे, जिसमें मनुष्य पीछे छूट जाए। यदि एल्गोरिदम विवेक का स्थान लेने लगे और मशीनें हमारी स्मृति बन जाएं, तो लोकतंत्र तकनीकी रूप से आधुनिक होते हुए भी नैतिक रूप से दरिद्र हो सकता है।

लोकतंत्र का भविष्य केवल संसद नहीं, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, परिवारों और नागरिक जीवन की छोटी-छोटी प्रक्रियाओं में निर्मित होगा। नई पीढ़ी यदि विविधता का सम्मान, प्रश्न पूछने का साहस और भयमुक्त-विवेक विकसित करेगी, तभी लोकतंत्र जीवित रहेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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