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- Neeraj Kaushal Column | Focus On Forex Reserves Over Rupee Depreciation
3 घंटे पहले
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नीरज कौशल, कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर
नागरिकों को अकसर लगता है कि अन्य मुद्राओं की तुलना में उनकी मुद्रा की एक्सचेंज-दर उनकी अर्थव्यवस्था की स्थिति को दर्शाती है। वे यह भी समझते हैं कि कमजोर मुद्रा, कमजोर अर्थव्यवस्था को दर्शाती है। लेकिन ऐसी “करेंसी-जिंगोइज्म’ (मुद्रा-राष्ट्रवाद) वाली सोच सतही आर्थिक समझ को बताती है। और जब सरकार भी मुद्रा के अवमूल्यन को राष्ट्रीय गौरव के लिए अपमान मानने लगती है और एक्सचेंज-दर को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार को खर्च करने लगती है, तो यह बेहद महंगा साबित होता है।
मुद्रा-राष्ट्रवाद का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 1992 का है, जब पाउंड-स्टर्लिंग यूरोप के एक्सचेंज रेट मैकेनिज्म (ईआरएम) का हिस्सा था। इस कारण ब्रिटेन की मुद्रा का जर्मन मार्क के मुकाबले एक निर्धारित दायरे में रहना जरूरी था। बाजार को लगता था पाउंड का मूल्य अधिक आंका गया है, फिर भी बैंक ऑफ इंग्लैंड पाउंड खरीदता रहा, ताकि मुद्रा को ईआरएम की तय सीमाओं के भीतर बनाए रखा जा सके।
सितंबर 1992 के एक ही दिन में यह सब बेकार साबित हो गया था, जब फाइनेंसर जॉर्ज सोरोस ने पाउंड के खिलाफ करीब 10 अरब डॉलर की पोजिशन ले ली। दबाव के चलते ब्रिटिश सरकार को पाउंड-स्टर्लिंग का अवमूल्यन करना पड़ा और ईआरएम से निकलना पड़ा। सोरोस ने इस मुद्रा-कारोबार से 2 अरब डॉलर कमाए और उन्हें बैंक ऑफ इंग्लैंड को कंगाल कर देने वाले व्यक्ति के रूप में ख्याति मिली।
इसका एक हालिया उदाहरण जापानी येन को सहारा देने के लिए जापान और अमेरिका की सरकारों द्वारा किया गया हस्तक्षेप है। जनवरी से जापान सरकार अपनी मुद्रा को सहारा देने के लिए 100 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का येन खरीद चुकी है।
कुछ अनुमानों के मुताबिक यह राशि 150 अरब डॉलर तक हो सकती है। पहला बड़ा हस्तक्षेप अप्रैल और मई में हुआ, जब जापान के वित्त मंत्रालय ने 73 अरब डॉलर मूल्य का येन खरीदा। लेकिन इससे केवल अस्थायी राहत मिली।
दो महीने बाद ही, जुलाई में येन गिरकर 1 डॉलर के मुकाबले 163 येन पर आ गया। इसके बाद अमेरिकी ट्रेजरी और जापान के वित्त मंत्रालय के संयुक्त हस्तक्षेप से येन मजबूत होकर 1 डॉलर के मुकाबले 155 येन तक पहुंचा। लेकिन दो सप्ताह से भी कम समय बाद येन को मिली लगभग आधी बढ़त खत्म हो गई है।
ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका जरूरत के समय एक मित्र की मदद कर रहा है। हालांकि, अमेरिका का एक छिपा हुआ उद्देश्य जापानी सरकार द्वारा अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज़ की बिक्री को सीमित करना लगता है। क्योंकि बैंक ऑफ जापान इन प्रतिभूतियों के सबसे बड़े धारकों में से है। वास्तव में इन हस्तक्षेपों के बावजूद पिछले सप्ताह 25 अरब डॉलर मूल्य के 30-वर्ष के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की नीलामी 5.2 प्रतिशत की यील्ड पर हुई, जो चौथाई सदी में सबसे अधिक है।
इसमें भारत के लिए भी कुछ सबक हैं। अव्वल तो यही कि रुपये को सहारा देने के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा को समाप्त न करें। इसके बजाय उन बुनियादी फैक्टरों पर ध्यान दें, जो लम्बे समय तक कायम रहने वाले आर्थिक विकास को निर्धारित करते हैं।
पिछले एक साल में रुपया करीब 10% गिर चुका है। कई विश्लेषकों का कहना है कि सरकार को रुपये को सहारा देना चाहिए, डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर को पार नहीं करना चाहिए। लेकिन इसे लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित होना समझदारी नहीं है।
याद रखें कि 1970 के दशक में एक डॉलर की विनिमय दर 10 रुपये से भी कम थी और उस समय कई लोग 10 रुपये प्रति डॉलर को वह मनोवैज्ञानिक सीमा मानते थे, जिसे आरबीआई को पार नहीं करने देना चाहिए। लेकिन जब रुपया उस सीमा को पार कर गया, तो कोई बड़ी विपदा नहीं आ गई थी।
पिछले एक साल में रुपया 10% गिर चुका है। लेकिन इस लेकर ज्यादा चिंतित होना समझदारी नहीं। 1970 के दशक में एक डॉलर की विनिमय दर 10 रुपये से भी कम थी। तब कई लोग 10 रुपये को वह मनोवैज्ञानिक सीमा मानते थे, जो पार नहीं होनी चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

