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संसद से कानून में बदलाव के बाद यूपीआई के बड़े लेनदेन पर एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) शुल्क वसूलने का रास्ता साफ हो गया है। अमेरिकी दबाव को नकारते हुए सरकार ने कहा है कि साइबर सुरक्षा और डिजिटल इन्फ्रा की मजबूती के लिए बड़े व्यापारियों से शुल्क लेना जरूरी है। डिजिटल पेमेंट के लिए संसद से 2007 में कानून बना था, उसके अनुसार 2008 में एनपीसीआई का गठन हुआ। 2016 में नोटबंदी के कुछ महीने पहले यूपीआई की शुरुआत हुई थी। पिछले 10 सालों में यूपीआई से लेनदेन की संख्या 12 हजार गुना बढ़ गई है। रियल टाइम पेमेंट में 49% की वैश्विक हिस्सेदारी के साथ आज 12 से ज्यादा देशों में यूपीआई की विजय पताका लहरा रही है। लेकिन 55.49 करोड़ भारतीयों को फ्री में मिल रहे यूपीआई से कमजोर होते बैंकों और विदेशी कम्पनियों को मिल रहे मुनाफे से जुड़े 4 पहलुओं को भी समझें। 1. रिजर्व बैंक के 6 अप्रैल 2018 के आदेश के अनुसार सर्विस प्रोवाइडर्स, इंटरमीडियरीज़, थर्ड पार्टी वेंडर्स और अन्य लोगों को डिजिटल पेमेंट से जुड़ा सारा डेटा सिर्फ भारत में ही स्टोर करना जरूरी था। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट में 2020 में गूगल-पे ने कहा कि वह ग्राहकों के नाम, पते, ईमेल और लेन-देन का विवरण ग्रुप कम्पनियों और बाहरी कम्पनियों से साझा करती है। यूपीआई में पैठ बढ़ाने के लिए वॉट्सएप के निवेश से 1.7 करोड़ मासिक यूजर्स वाली क्रेड कम्पनी की वैल्यू 43239 करोड़ हो गई है। यूपीआई से जुड़ी अन्य कम्पनियां भी भारतीयों के निजी और बैंकिंग डेटा के कारोबार से अरबों डॉलर का मुनाफा कमा रही हैं। 2. एनपीसीआई ने नवम्बर 2020 में आदेश जारी किया था, जिसके अनुसार यूपीआई में किसी कंपनी का 30% से ज्यादा आधिपत्य नहीं हो सकता। इस नियम के अनुपालन की समय-सीमा तीन बार बढ़ाई जा चुकी है, जो दिसम्बर में खत्म हो रही है। 2016 में भीम एप का ढिंढोरा पीटा गया था, जिसकी कुल हिस्सेदारी सिर्फ 0.86% है। जबकि अमेरिका के वालमार्ट के स्वामित्व वाली फोन-पे के पास 47% और गूगल-पे के पास 37% हिस्सेदारी है। दो अमेरिकी कम्पनियों के पास यूपीआई में 84% हिस्सेदारी के मामले पर संसदीय समिति ने 2024 में चिंता जाहिर की थी। 3. पेमेंट कांउसिंल ऑफ इंडिया ने मई 2023 में एमडीआर लागू करने की मांग की थी। ट्रम्प के दबाव पर लागू हो रहे एमडीआर से भारत का रुपे कार्ड कमजोर होने के साथ अमेरिका के वीजा और मास्टर कार्ड का कारोबार बढ़ेगा। नीट परीक्षा आयोजित करने वाली एनटीए की तरह एनपीसीआई भी संस्थागत कमजोरियों, आउटसोर्सिंग और ठेकेदारी की शिकार है। दुनिया के 49% रियल टाइम पेमेंट को नियंत्रित करने वाली एनपीसीआई खुद को आरटीआई और राज्य की परिभाषा के दायरे से बाहर मानती है। कानून में बदलाव के बाद अब शुल्क की दरों और एमडीआर को लागू करने का फैसला एनपीसीआई करेगी। विस्तार पर जोर और नियमों में ढील से बैंकिंग और अर्थव्यवस्था में विदेशी कंपनियों का वर्चस्व बढ़ना चिंताजनक है। 4. माइक्रोसॉफ्ट और ओपन-एआई के चैट-जीपीटी से यूपीआई में एआई का इस्तेमाल शुरू हो गया है। यूपीआई के लेनदेन की हिस्ट्री, बिजली बिल, खर्च और बचत के पैटर्न के आंकड़ों से क्विक कॉमर्स, फिनटैक, गेमिंग, बीमा और लोन से जुड़े स्टार्टअप मालामाल हो रहे हैं। यूपीआई में केवाईसी में ढील और बैंकिंग डेटा के इस्तेमाल से साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। अमेरिका की एआई कम्पनी एन्थ्रोपिक के क्लॉड मिथोस के खतरों से निपटने के लिए बैंकों के पास तकनीक और संसाधन दोनों की कमी है। एनपीसीआई के गठन से जुड़े स्टेट बैंक और दूसरे बैंकों को यूपीआई क्रांति का फायदा क्यों नहीं मिला, इस पर देशहित में विमर्श जरूरी है। भीम एप की कुल हिस्सेदारी 0.86% है। जबकि अमेरिका के वालमार्ट के स्वामित्व वाली फोन-पे के पास 47% और गूगल-पे के पास 37% हिस्सेदारी है। दो अमेरिकी कम्पनियों के पास यूपीआई में 84% की हिस्सेदारी हमारे लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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विराग गुप्ता का कॉलम:मुफ्त के "यूपीआई' से भारी मुनाफा कौन कमा रहा है?
