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हममें से कई लोगों ने ऐसी कोई फिल्म या टीवी सीरियल जरूर देखे होंगे, जिनकी कहानियां मेडिकल से जुड़े हालात के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इनमें डिलीवरी के बाद मरीज को अचानक से पोस्टपार्टम हैमरेज (पीपीएच) होता है- यानी अत्यधिक ब्लीडिंग, जो जानलेवा हो सकती है। ‘ग्राम चिकित्सालय’ ऐसा ही एक सीरियल है, जिसमें युवा, प्रतिभाशाली और आदर्शवादी डॉक्टर प्रभात झारखंड में सुदूरवर्ती गांव भटकंडी के उपेक्षित प्राइमरी हेल्थ सेंटर की जिम्मेदारी संभालते हैं। वे वहां जरूरी बदलाव लाने के लिए दृढ़ होते हैं, लेकिन फिर पाते हैं कि कुछ और बदलने से पहले उन्हें खुद को बदलना होगा। ऐसे एंटरटेनमेंट में किरदार डायरेक्टर की बताई भूमिकाएं ही निभाते हैं और वही बोलते हैं, जो किसी ने उनके लिए लिखा है। हम भी हमेशा यही चाहते हैं कि हमारे सामने ऐसी कोई स्थिति आए, तो हम भी वैसा ही व्यवहार करें। लेकिन महाराष्ट्र में चंद्रपुर जिले के जिंटल तालुका स्थित दूरदराज की आदिवासी बस्ती ‘घोड़नकप्पी’ के निवासी तुलसीराम गेडाम ने ऐसा कुछ किया। जिसे किसी लेखक या डायरेक्टर ने कभी पर्दे पर दिखाने के बारे में नहीं सोचा होगा। और इसे ही ‘एक युवा पिता की विज्डम’ कहते हैं। उन्होंने साबित किया कि ‘विज्डम’ हमेशा उम्र के साथ नहीं आती। कई बार यह इतना गहरा घाव लगने के बाद आती है कि इंसान का दुनिया देखने का नजरिया ही बदल जाता है। 14 जून को प्रेग्नेंसी के 33वें हफ्ते (नॉर्मल डिलीवरी 40वें हफ्ते में होती है) में घर पर बच्चे को जन्म देने के बाद तुलसीराम की 25 वर्षीय पत्नी संगीता को पीपीएच होने लगा। परिवार ने हेल्थ डिपार्टमेंट से संपर्क किया। तुरंत गांव के समीप पहाड़ी पर वहां तक एंबुलेंस भेजी गई, जहां तक पहुंचना संभव था। परिजन महिला को लेकर कठिन रास्तों से होते हुए एंबुलेंस तक पहुंचने को जूझते रहे। इस मशक्कत में मेडिकल टर्मिनोलॉजी में कहे जाने वाला ‘गोल्डन ऑवर’ टाइम निकल गया। संगीता को ट्रीटमेंट मिलता, उससे पहले ही अत्यधिक खून बहने से उसकी मृत्यु हो गई। लगभग 2.2 किलो वजन वाले नवजात की हालत स्थिर बताई गई। बहुत से लोग यहीं रुक जाते। कुछ सरकार को दोष देते। कुछ विरोध करते। कुछ मुआवजा मांगते और कुछ स्वाभाविक तौर पर दुख के साथ घर लौट जाते। लेकिन तुलसीराम ने कुछ और, अधिक कठिन रास्ता चुना। उन्होंने खुद से पूछा कि ऐसा क्या कर सकते हैं, ताकि किसी दूसरे परिवार को उसके परिवार जैसी पीड़ा न झेलनी पड़े। यह बहुत गहरी सोच है। अपनी निजी पीड़ा को पब्लिक पर्पज में बदलने के लिए खास तरह की मैच्योरिटी जरूरी होती है। और जब इस पीड़ा को ढोने वाला व्यक्ति इतना युवा हो तो यह और अधिक उल्लेखनीय हो जाता है। तुलसीराम के पास न तो समय की लग्जरी है और न आरामदायक जीवन। उन्हें दो छोटे बच्चों की परवरिश करनी है और उन्होंने इस जिम्मेदारी को शेयर करने वाले को भी खो दिया। उनके पास दुख में डूबे रहने की हर वजह है। लेकिन इसके बजाय उन्होंने किसी और की पत्नी, किसी और के बच्चे, किसी और की इमरजेंसी के बारे में सोचना शुरू किया। यहीं से ‘विज्डम’ शुरू होती है। तुलसीराम को समझ आया कि सड़क महज सड़क नहीं होती। घोड़नकप्पी के 20 परिवारों के लिए यह हॉस्पिटल तक पहुंचने का जरिया है। यह किसी प्रेग्नेंट महिला की सुरक्षा, किसी बच्चे का स्कूल रूट और किसी बुजुर्ग की गरिमा है। यह इमरजेंसी और ट्रैजेडी के बीच का अंतर है। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर मुख्य सड़क तक 1.5 किमी लंबे रास्ते का निर्माण शुरू किया। स्वैच्छिक श्रमदान के जरिए 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर काम शुरू हुआ। अब रास्ते का आधा काम पूरा हो चुका है। फंडा यह है कि हम अकसर समझदारी को सफेद बालों, वर्षों के अनुभव और जीवन को लेकर लंबे-चौड़े भाषणों से जोड़ कर देखते हैं। लेकिन शायद समझदारी इससे कहीं अधिक सरल है। यह अपनी पीड़ा से सीखने और यह सुनिश्चित करने की क्षमता है कि वही पीड़ा किसी और की किस्मत में न आए।
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एन. रघुरामन का कॉलम:पीड़ा को महसूस करने से ही समझदारी आती है
