एक रात मेरा पति नशे में घर आया। मैंने पूछा-’खाना लगा दूं?’ वो झल्लाकर बोला-’आज तेरे हाथ का बना खाना नहीं खाऊंगा।’ पास ही मेरी बेटी सो रही थी। अचानक वो बेटी के पास गया। उसकी टांग पकड़ी और उसे जमीन पर पटक दिया। बेटी रोने लगी तो उसने उसे थप्पड़ मारने शु
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मैंने उसे धक्का देकर बेटी को बचाने की कोशिश की। बस, इतनी सी बात पर वह मेरे ऊपर टूट पड़ा। गालियां दीं। लात-घूंसे मारे। सुबह के पांच बज चुके थे। लेकिन वो शांत नहीं हुआ था। उसने पहले मेरी गर्दन पकड़ी, फिर दुपट्टा खींचा, फिर कुर्ती और सलवार फाड़ दी। फिर मुझे घसीटते हुए घर से बाहर ले आया।
तब तक पड़ोसी जाग चुके थे, लेकिन मुझे निर्वस्त्र देखकर सभी ने नजरें घुमा लीं। मेरी बेटियां मुझे बचाने आईं तो उसने उन्हें भी धक्का दे दिया। तभी एक पड़ोसन दौड़ती हुई आई। उसने मुझे चादर ओढ़ाई।
आज ब्लैकबोर्ड में मैं मनीषा भल्ला लाई हूं शर्मिला धनखड़ की कहानी, जिसे पति ने निर्वस्त्र कर जलील किया, लेकिन उसने हार नहीं मानी, मेहनत की और कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीता…
उस रात शर्मिला के पास अपना तन ढंकने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन सालों बाद एक रात ऐसी भी आई, जब उसी शर्मिला के कंधों पर तिरंगा और गले में गोल्ड मेडल था।
हरियाणा के रेवाड़ी की उबड़-खाबड़ सड़कों से होते हुए मैं सनसिटी के बीपीएल क्वार्टर पहुंची। एक घर के बाहर भीड़ लगी है। भीड़ के बीच गहरे रंग की टीशर्ट पहने एक औरत खड़ी है। बॉय कट बाल और उम्र लगभग 40 साल।
आसपास खड़े लोग कह रहे हैं- देश का नाम रोशन करने वाली शर्मिला दीदी को जन्मदिन की बधाई।

15 अगस्त को शर्मिला के जन्मदिन पर उनके घर के बाहर लोग केक लेकर आए थे।
मुझे देखते ही शर्मिला ने घर के अंदर बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद वो आईं और बोलीं- मैंने तो कभी सोचा नहीं था, ये दिन भी देख पाऊंगी। इतने लोग मुझे जानने लगेंगे। मेरी लंबी उम्र की दुआएं करेंगे। मैंने तो बस वही किया जो मेरे दूसरे पति ने कहा।
दो साल की थी जब पैर में पोलियो हो गया था। हम चार भाई-बहन थे। महेंद्रगढ़ जिले के छितरौली गांव में रहते थे। पिता किसान थे। गरीबी इतनी थी कि दो वक्त का खाना मिल जाना ही बड़ी बात थी।
मां की आंखों की रोशनी बचपन में ही चली गई थी, उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था। हर काम अंदाजे से करती थीं। रोटियां भी कभी कच्ची तो कभी पकी बनाती थी।
पापा के ऊपर कर्ज इतना था कि पैसे मांगने वाले आए दिन दरवाजे पर खड़े रहते थे। इस वजह से वो महीनों तक घर नहीं आते थे। मां को विकलांगता पेंशन मिलती थी, उसी से हमारी पढ़ाई और बाकी खर्च चलते थे।
हमें तो ये भी नहीं पता था कि दाल-रोटी और गुड़ के अलावा कुछ और भी खाया जाता है। जब 19 साल की हुई तो घरवालों ने लड़का देखे बिना शादी करवा दी। पति शराबी था।
शादी के मंडप में भी शराब पीकर आया था। बैठ भी नहीं पा रहा था। दो लोग उसे पकड़े हुए थे। पापा ने बिचौलिए से पूछा तो उसने ये कहकर किनारा कर लिया कि उसे भी नहीं पता था।
शादी होते ही मेरी जिंदगी नरक बन गई। पापा दहेज नहीं दे पाए, उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने कहा था कि जब मेरे बच्चे होंगे तो दे देंगे।
ससुराल में पहला दिन था। सास-ससुर थे नहीं। चार जेठ-देवर थे। उनका घर आसपास था। पति दोपहर 12 बजे तक सोया रहा। उठाने गई तो गाली देते हुए बोला- *@#% एक तो तेरे बाप ने दहेज नहीं दिया, ऊपर से लंगड़ी लड़की मेरे माथे मढ़ दी।’ मैं रोते हुए वहां से चली गई। वो मुझे रोज ऐसे ही जलील करता था।
जब शादी का वीडियो बनकर आया तो मैंने कहा-चलो देखते हैं। वो गुस्सा हो गया, कहने लगा- तेरे बाप ने टीवी दिया है क्या, जो शादी का वीडियो देखेगी #@%*। इतनी गंदी गालियां देता था कि मैं बता नहीं सकती।
वो रात-रातभर घर नहीं आता। लोगों से लड़ाई-झगड़ा करता। शादी के वक्त बताया गया था कि वो किसी कंपनी में नौकरी करता है। जबकि वो बेरोजगार था। शुरू-शुरू में काम का कहकर घर से जाता और रेलवे स्टेशन के चक्कर काटकर लौट आता। धीरे-धीरे पता चला कि उसके पास नौकरी नहीं हैं।
कुछ समय बाद बेटी हुई। वो चार महीने की थी तब निमोनिया हो गया। डॉक्टर को दिखाने के लिए झज्जर भागी। पति भी साथ था। वहां से लौटने में रात हो गई। बेटी बुखार में तड़प रही थी। लेकिन वो बस स्टैंड पर अकेले खाना खाने चला गया।
मैंने कई बार कहा बच्ची मर जाएगी, तेज बुखार है। घर नहीं जा रहे तो कम से कम दवा ही खरीदकर ले आओ। उसने मुझे जोर से थप्पड़ जड़ दिए। फिर शराब पीने लगा। मैं रातभर बच्ची को चुप कराती रही, आखिरकर बच्ची की सुबह मौत हो गई।

पहली बेटी की मौत के बारे में बताते हुए शर्मिला दुखी हो जाती हैं।
कुछ देर बाद खुद को संभालते हुए कहती हैं- जब दूसरी बार प्रेग्नेंट हुई। बेटी को जन्म दिया तो दिन-रात ताने सुनाता था। मारता-पीटता था। बेटी कभी बीमार हो जाए तो इलाज तक नहीं करवाता था। तीसरी बार प्रेग्नेंट हुई तो बड़ी बेटी साढ़े तीन साल की हो चुकी थी।
वो मुझे जबरदस्ती अल्ट्रासाउंड करवाने ले गया। उस वक्त पांचवां महीना चल रहा था। पता चला कि पेट में बच्ची है, तो उसे गिराने के लिए पीछे पड़ गया। एक रात दवाई ले आया और जबरदस्ती खिलाने लगा। उस रात तो जैसे-तैसे बच गई। सुबह होते ही मां के घर चली गई। डिलीवरी तक वहां रही फिर पति के पास लौट गई।
तब तक भी पति की आदतें नहीं सुधरी थीं। एक रात जब पति घर लौटा तो मैंने कहा- बच्चे भूखे मर रहे हैं, तुम्हें शराब के अलावा कुछ नहीं दिखता। वो पास आया और दीवार पर मेरा सिर दे मारा। सिर से खून निकलने लगा। उसने मुझे धक्का देकर जमीन पर पटक दिया। लात-घूंसे मारे। मैं मदद के लिए चीख रही थी, तभी देवर आ गया।
वो कहने लगा कि छोड़ दे, मत मार। तो पति गालियां देते हुए बोला- मेरी लुगाई है या तेरी। ज्यादा दर्द हो रहा है तो ले जा अपने घर, अपनी लुगाई बना ले। इसके बाद देवर बोला– जो करना है कर, हमें क्या। उस दिन के बाद से रिश्तेदार और मोहल्ले वालों ने भी मुझे बचाना बंद कर दिया।
कई बार घर में खाने तक के लाले पड़ जाते थे। एक बार तो 10 दिन तक घर में राशन नहीं था। मेरी दोनों बेटियां भूख से बिलखती रहती थीं। मैंने मां को बताया तो 11 वें दिन भाई राशन लेकर आया। लेकिन वो राशन भी कुछ दिन में खत्म हो गया। सिर्फ आटा बचा था। मैं रोटियां बनाती और पानी में भिगो-भिगोकर बेटियों को खिलाती। यह सिलसिला एक महीने तक चला।
पैसों की बहुत तंगी रहने लगी तो मैंने आस-पड़ोस की महिलाओं के कपड़े सिलना शुरू कर दिए। कुछ पैसे आए तो बेटियों का स्कूल में एडमिशन करवाया। लेकिन प्रिंसिपल से दो टूक कह दिया- अगर इनका बाप कभी इन्हें लेने आए, तो बेटियों को उनके साथ मत भेजना।
अब तक मैं समझ चुकी थी कि ऐसे माहौल में बेटियां सुरक्षित नहीं रह पाएंगी। इसलिए एक दिन बेटियों को लेकर मायके आ गई।
2005 से 2012 तक मायके में रही। वो अक्सर वहां आ जाता था। रिश्तेदार कहते थे- ससुराल चली जा। शराब ही तो पीता है। वो तो दुनिया पी रही है। बच्चों को पालने के लिए मैं एक डॉक्टर के यहां झाड़ू-पोछा करने लगी। धीरे-धीरे नर्स का काम सीख लिया, लेकिन पति भी वहां पहुंच जाता। डॉक्टर और मरीजों को धमकाता। आखिर एक दिन डॉक्टर बोला- मैं तुम्हारी मजबूरी समझता हूं, लेकिन इस तरह क्लीनिक नहीं चला पाऊंगा।
आखिर एक शोरुम में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिली, लेकिन पति की वजह से वो भी छोड़नी पड़ी।एक दिन मां के साथ मंदिर गई, तो वो वहां भी पहुंच गया। मुझे पीटा। तभी वहां एक शख्स पहुंचा और उसने मुझे बचाया।
वो शख्स मुझे और मां को घर तक छोड़ने आया। रास्ते में मां ने उसे पूरी कहानी सुनाई, फिर कहने लगा कि ऐसे पति को छोड़ देने में ही भलाई है। उसके बाद वो शख्स कई बार घर आया। फिर एक दिन उसने कहा कि वो मुझसे शादी करेगा और मेरी बेटियों को भी अपनाएगा। उसके बाद मैंने पहले पति को तलाक दे दिया और 28 साल की उम्र में अजीत सैनी से दूसरी शादी कर ली। जिंदगी अच्छी चल रही थी।
एक दिन दिवाली के आसपास हम दोनों घर की सफाई कर रहे थे। मैंने अकेले बॉक्स वाला बेड एक तरफ घुमा दिया। पति ये देखकर हैरान हो गए। कहने लगा कि तुम में इतना दम है, खिलाड़ी बन जाओ। मैंने कहा-चूल्हा चौका करने वाली औरत हूं। मुझे क्या पता खेल क्या होता है। लेकिन पति ने हार नहीं मानी। वो लगातार मेरे पीछे पड़े रहे।
अजीत पता करने में लग गए कि विकलांग के लिए कौन-कौन से खेल होते हैं। स्टेडियम देखकर आए। एक दिन वह जबरदस्ती रेवाड़ी के राव तुलाराम स्टेडियम ले गए। वहां पैरा एथलीट कोच टेकचंद मिले। उन्होंने मुझे शॉट-पुट की तकनीक सीखने के लिए कहा।
तब से स्टेडियम जाने लगी। बाल लंबे थे तो प्रैक्टिस में दिक्कत होती थी। एक दिन अजीत ने जबरदस्ती मेरी चोटी काट दी। ताकि मैं प्रैक्टिस कर पाऊं। मुझे पैंट पहनने की आदत नहीं थी, लेकिन अजीत के आगे मेरी एक न चली।

शर्मिला बताती हैं कि जब टीशर्ट और पैंट पहनना शुरू किया तो घर से बाहर निकलने में अजीब लगता था। ऐसे कपड़े कभी पहने नहीं थे।
पहले दिन जब स्टेडियम गई तो एक शख्स ने पूछा- ‘कितनी उम्र है आपकी।’ मैंने कहा 35 साल। तो वो तंज कसते हुए बोला-आप तो रिटायरमेंट के काफी नजदीक हैं। उसकी बात सुनते ही सब हंसने लगे, लेकिन मैं प्रैक्टिस करती रही। शाम को घर जाकर अजीत को बताया तो उसने कहा- कुछ भी हो तुम प्रैक्टिस नहीं छोड़ोगी।
एक दिन मेरी तबीयत ठीक नहीं थी, लेकिन अजीत ने जबरदस्ती स्टेडियम भेज दिया। मैं चली तो गई, लेकिन प्रैक्टिस नहीं कर पा रही थी। तब एक खिलाड़ी बोला- ‘बूढ़ी हो गई हो आंटी, घर बैठो, कहां इस उम्र में हडि्डयां थका रही हो।’
उसकी बातें चुभ गईं। अब तक ये समझ आ गया था कि खेल को ही अपनी दुनिया बनाना है। मैंने उसके लिए दिन-रात एक कर दिए।
मुझे खेलने के लिए अच्छी खुराक की जरूरत थी। दो लीटर दूध, देसी घी, सप्लीमेंट। डाइट का खर्च बढ़कर महीने का एक से डेढ़ लाख रुपये हो गया।
अजीत ने दिन-रात गैराज में काम करना शुरू कर दिया, ताकि प्रैक्टिस न रुके। एक साल की कड़ी मेहनत के बाद राष्ट्रीय चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। अब अजीत का भरोसा और बढ़ गया। उसने मेरी डाइट के लिए 25 गज में बना मकान दस लाख रुपये में बेच दिया। सभी लोग बीपीएल क्वाटर्स के छोटे से एक कमरे में रहने लगे। मां ने भी अपनी जमीन बेच दी, ताकि प्रैक्टिस न रुके।
जब शॉट-पुट फेंकती थी उसे वापस उठाकर लाने में बहुत दिक्कत होती थी। इसलिए अजीत ने नौकरी छोड़ दी। उनके पास जमीन का एक और टुकड़ा बचा था, वो भी बेच दिया। सारा दिन स्टेडियम में मुझे ट्रेनिंग करवाने लगे। पैसे खत्म हुए तो पांच लाख रुपये का कर्ज लिया।
बेटियां बड़ी हो रही थीं। अजीत ने साथ-साथ बेटियों को भी गेम्स में डाल दिया। अजीत मुझे घर का कोई काम नहीं करने देते। मेरे लिए डाइट वाला खाना बनाते, बच्चियों का ध्यान रखते।
इसके बाद, मेरी मेहनत रंग लाई 2022 में बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लिया। 2026 में दुबई में फज्जा इंटरनेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोल्ड जीता।
इसके बाद 27 जुलाई 2026 की रात मेरा एक और सपना पूरा हुआ। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में मैंने महिला शॉट-पुट में 9.81 मीटर का थ्रो करके गोल्ड मेडल जीत लिया। वहां इंडिया के कई लोग थे मेरा हौसला बढ़ाने के लिए। मैदान में पहुंचने पर पता लगा कि मेरा दूसरा नंबर है। मुझसे पहले एक नाइजीरियन है। उसने शॉट-पुट 8.61 मीटर की दूरी पर फेंका। मैं तो आंखे बंद करके मन ही मन सोचने लगी कि घणी प्रैक्टिस करके आई हूं, बेटियों के लिए गोल्ड लेकर ही जाना है और मैं ही लूंगी।
जैसे ही मेरी बारी आई मैंने शॉट-पुट फेंका और आंखें बंद कर ली। जब पता चला 9.81 मीटर का थ्रो है, तो लगा कि आखिर अजीत का सपना पूरा हुआ। जब मेडल मेरे गले में डाला गया, तो मेरी आंखों में आंसू थे। आंखों के सामने पूरी जिंदगी घूम रही थी- संघर्ष, भूख और वो बेइज्जती।
गोल्ड की वजह से अब पैसे की कमी नहीं है। सरकार ने जो दिया वो तो है ही। उसके अलावा जगह-जगह सम्मान के लिए बुलाया जाता है। केबीसी में भी 12 लाख रुपये जीतकर आई हूं।
एक ज्वेलर ने सोने के सिक्के और हीरे का सेट दिया है। अजीत अक्सर कहते थे कि मैं तुम्हारी और बेटियों की जिंदगी स्वर्ग बनाना चाहता हूं और उसने वही किया।

शर्मिला धनखड़ के साथ उनकी दोनों बेटियां।
अजीत ने मेरा हौसला बढ़ाकर एक-एक बेइज्जती का बदला लिया। मर्द चाहे तो औरत की जिंदगी बर्बाद कर सकता है और संभालने वाला हो तो संवार भी सकता है। आज दुनिया मुझे पहचानती है, केवल अजीत की वजह से।
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