भारतीय फौज को सियाचिन पहुंचे 4 दिन ही हुए थे। माइनस 50 डिग्री तापमान में 27 में से 21 जवानों के हाथ-पैर गल गए थे। हर कदम पर मौत मुंह बाए खड़ी थी।
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इसी बीच बादलों को चीरती हुई एक गड़गड़ाहट गूंजी। आसमान में पाकिस्तानी हेलिकॉप्टर मंडरा रहा था।
हिंदुस्तानी कैप्टन ने फौरन इशारा किया- ‘किल द बास्टर्ड’। सैनिकों की उंगलियां ट्रिगर पर कस गईं। तभी हेलिकॉप्टर धुंध में गायब हो गया।
एक हफ्ते बाद, अचानक आसमान से गोले बरसने लगे। इस बार पाकिस्तान पूरी तैयारी से आया था। सियाचिन ग्लेशियर धमाकों से गूंज उठा।
भारत के पास न भारी तोपें थीं और न हैवी गोले, लेकिन जब जंग थमी, तो सियाचिन के सफेद सागर में तिरंगा लहरा रहा था।
ये बात 1984 की है और महीना था अप्रैल। दुनिया के सबसे ऊंचे जंग के मैदान में भारत और पाकिस्तान आमने-सामने थे। एक ऐसी जंग, जहां दुश्मन से ज्यादा खतरनाक है कुदरत से लड़ना। नसों में बहता खून जम जाए। फेफड़ों के भीतर ऑक्सीजन कांच सी चुभने लगे।
ये भारतीय फौज का ‘ऑपरेशन मेघदूत’ था और पाकिस्तानी साजिश का खुलासा किया था- भारत की खुफिया एजेंसी RAW ने… पूरी कहानी स्पाई फाइल्स के इस एपिसोड में…

अप्रैल 1984, सियाचिन फतह करने के बाद भारतीय फौजी।
2 जुलाई 1972…
शिमला के राजभवन का आलीशान कमरा। एक तरफ भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बैठी थीं और दूसरी तरफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो। भुट्टो के चेहरे पर 1971 की करारी हार और पाकिस्तान के दो टुकड़े होने का दर्द साफ झलक रहा था।
लंबी खींचतान, कूटनीतिक दांव-पेच और घंटों की बहस के बाद आधी रात को दोनों ने एक समझौते पर दस्तखत कर दिए। इसे शिमला समझौता कहा गया।
दो शर्तें प्रमुख थीं :
पहली- भारत की जेलों में बंद पाकिस्तान के 70 हजार से ज्यादा युद्धबंदियों की वतन वापसी।
दूसरी- कश्मीर में पुरानी सीजफायर लाइन को मिटाकर एक नई ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ (LoC) खींचना।
मेज पर दोनों मुल्कों के नक्शे फैला दिए गए। नक्शानवीसों की कलम एक-एक पहाड़ी, नाले और गांव को बांटती हुई आगे बढ़ रही थी। अचानक कलम एक जगह ठिठक गई- पॉइंट NJ9842
लद्दाख के उत्तर में बसा एक ऐसा इलाका, जिसके आगे इंसानी आबादी खत्म हो जाती थी।
भारतीय अफसर ने कहा- ‘आगे तो सिर्फ बर्फ का समंदर है। 20 हजार फीट ऊंचे पहाड़। न कोई बंदा, न घास का तिनका। वहां लाइन खींचकर वक्त क्यों बर्बाद करना?’
पाकिस्तानी अफसर ने सिगार का धुआं छोड़ते हुए सिर हिलाया, ‘बिल्कुल सही फरमाया जनाब। वहां इंसान तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकता।’
दोनों अफसरों ने कलम उठाई और नक्शे के कोने में एक लाइन दर्ज कर दी- ‘Point NJ9842 thence north to the glaciers’, यानी NJ9842 से आगे यह रेखा उत्तर की ओर ग्लेशियरों की तरफ जाएगी।

समझौता तो हो गया, लेकिन नक्शे पर दर्ज यही अधूरा सिरा, आगे चलकर खून से लाल होने वाला था…
साल 1976-77… रावलपिंडी में पाकिस्तानी फौज का जनरल हेडक्वार्टर।
जनरल जिया-उल-हक नए-नए आर्मी चीफ बने थे। उनके जेहन में 1971 की जंग के घाव हरे थे। हिंदुस्तान से बदला लेने की आग सुलग रही थी। उनकी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ बंद कमरों में कई बैठकें हो चुकी थीं।
एक रोज कोर ग्रुप की मीटिंग बुलाई गई। कमरे में पाकिस्तानी सेना के बड़े जनरल और खुफिया एजेंसी ISI के अफसर जुटे थे। मकसद साफ था- हिंदुस्तान से बदला लेना है।
ISI के एक अफसर ने कहा, ‘जनाब, हम बिना राइफल चलाए हिंदुस्तान को हरा सकते हैं।’
पाकिस्तानी जनरल ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए पूछा, ‘वो कैसे?’
ISI अफसर बोला- ‘1972 के शिमला समझौते में पॉइंट NJ9842 के आगे कोई लाइन तय नहीं है। हम इसका फायदा उठाएंगे।’
‘तो तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है?’ जनरल ने अपनी मूंछों पर ताव दिया।
‘हम एक नई लाइन खींचेंगे… NJ9842 से सीधे उत्तर-पूर्व की तरफ ‘कराकोरम दर्रे’ तक। एक झटके में पूरा सियाचिन हमारा।’
जनरल मुस्कुराया- ‘हिंदुस्तान इसे मानेगा?’
‘जनाब, हमें हिंदुस्तान से मनवाना ही नहीं है… दुनिया से मनवानी है,’ अफसर ने हंसते हुए कहा।
‘साफ-साफ कहो, क्या प्लान है?’ जनरल ने पूछा।
‘मिशन ‘ऑरोग्राफिक एग्रेशन’… यानी नक्शों के जरिए जमीन पर कब्जा’ अफसर ने बताया।

सियाचिन पर कब्जे को लेकर रणनीति बनाते पाकिस्तनी अफसर। AI इमेज
जल्द ही आर्मी चीफ और हुकूमत की मुहर इस फैसले पर लग गई। इसके बाद पाकिस्तान, यूरोप, अमेरिका और जापान के पर्वतारोहियों को सियाचिन की चोटियों पर चढ़ाई के लिए न्योता भेजने लगा।
विदेशी पर्वतारोही सियाचिन से लौटने के बाद इंटरनेशनल मैगजीनों में आर्टिकल लिखने लगे। रूट गाइड बताने लगे। उन नक्शों में सियाचिन को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया जाने लगा।
पाकिस्तानी हुक्मरान मान चुके थे कि जब तक दिल्ली को भनक लगेगी, तब तक सियाचिन पर उनकी फौज अपना बंकर बना चुकी होगी।
लेकिन उनकी यह गलतफहमी जल्द ही टूटने वाली थी… क्योंकि जाने-अनजाने में इसकी काट दो साल पहले ही लिखी जा चुकी थी।
बात साल 1975 की है…
दो जर्मन पर्वतारोही- जारोस्लाव पोंकार और वोल्कर स्टालबोहम भारत पहुंचे। आंखों में एक ही ख्वाब था- लद्दाख की उफनती सिंधु नदी में राफ्टिंग करना।
ये इलाका प्रतिबंधित था। कागजों और परमिशन लेटर के चक्कर में भटकते-भटकते दोनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला के पास पहुंचे।
शेख ने अपने सेक्रेटरी से कहा- ‘इन्हें गुलमर्ग भेजो। वहां ‘बुल’ से कहो कि इनकी पूरी मदद करें।’
‘बुल’, यानी भारतीय सेना के कर्नल नरेंद्र कुमार। वे गुलमर्ग में आर्मी के ‘हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल’ (HAWS) की कमान संभाल रहे थे। बर्फीले पहाड़ों पर चढ़ते वक्त उनके पैर की चार उंगलियां बर्फ में गल गई थीं, लेकिन उनके बेखौफ मिजाज में रत्ती भर कमी नहीं आई थी। तभी तो उनका नाम पड़ा था- ‘बुल’।
दोनों पर्वतारोही गुलमर्ग पहुंच गए। उन्होंने कर्नल बुल को प्लान बताया। कर्नल की आंखें चमक उठीं। कर्नल बुल ने कहा- ‘बिना फौज के सपोर्ट के तुम उस इलाके में जा नहीं पाओगे। अगर इस अभियान का लीडर मैं बन जाऊं, तो यह एक ऑफिशियल मिलिट्री-कम-सिविलियन एक्सपीडिशन बन जाएगा।’
जर्मन टीम खुशी से उछल पड़ी। जल्द ही वे लोग राफ्टिंग के लिए निकल गए। मिशन कामयाब रहा। इस दौरान कर्नल बुल और जर्मन पर्वतारोहियों के बीच दोस्ती हो गई।
आगे चलकर ये दोस्ती ही भारत और पाकिस्तान के बीच जंग की कड़ी बनने वाली थी…

कर्नल बुल और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू। 1960 के दशक में बुल की पैर की उंगलियां काटनी पड़ी थीं।
3 साल बाद… 1978 की एक सर्दभरी सुबह।
कर्नल बुल अपने दफ्तर में कुछ फाइलों में उलझे हुए थे। तभी संतरी अंदर आया और कहा- ‘जर्मनी से दो लोग आपसे मिलने आए हैं।’
कर्नल बुल- ‘उन्हें अंदर बुलाओ।’
उनके पुराने दोस्त, दोनों जर्मन पर्वतारोही अंदर दाखिल हुए। उनके कंधों पर भारी-भरकम बैग थे और हाथों में नए इंटरनेशनल मैप।
‘कर्नल साहब.., हम इस बार सियाचिन ग्लेशियर की बर्फीली चोटियों को नापना चाहते हैं। यह देखिए, हमारे पास अमेरिकन मैप है।’
कर्नल बुल मुस्कुराते हुए नक्शा देखने लगे। जैसे ही उंगली लद्दाख से उत्तर की तरफ बढ़ी, उनकी मुस्कान गायब हो गई। चेहरे की रंगत उड़ गई और माथे की नसें तन गईं।
नक्शे पर पॉइंट NJ9842 से उत्तर-पूर्व में कराकोरम तक सीधी लाइन खींची गई थी। उस लाइन के अंदर का पूरा इलाका यानी ‘सियाचिन ग्लेशियर’ को पाकिस्तान में दिखाया गया था।
कर्नल बुल तमतमा उठे, लेकिन खुद को संभालते हुए कहा- ‘यह नक्शा कहां से मिला?’
जर्मन पर्वतारोही ने कहा- ‘कर्नल, अमेरिका और यूरोप के बाजारों में ये मैप बिक रहा है।’
कर्नल ने भारी-भरकम रकम देकर वो नक्शा अपने पास रख लिया। दोनों पर्वतारोहियों से विदा लेने के बाद कर्नल ने नक्शे पर दोबारा निगाह डाली। मन ही मन बुदबुदाए- ‘यह कोई प्रिटिंग मिस्टेक नहीं है। पाकिस्तान हमारे पीठ में खंजर घोंपने की साजिश रच रहा है।’
उन्होंने फौरन दिल्ली की फ्लाइट पकड़ ली। कुछ ही घंटों में वे साउथ ब्लॉक में ‘डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस’ यानी DGMO के दफ्तर में थे।
उन्होंने वो नक्शा DGMO लेफ्टिनेंट जनरल एमएल छिब्बर की तरफ बढ़ाते हुए कहा- ‘सर, पाकिस्तान हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन निगल रहा है।’
DGMO ने बिना नक्शा देखे कर्नल बुल को एक दूसरे अफसर के पास भेज दिया। पर, बुल लौटने वाले नहीं थे। वे उस अफसर को लेकर दोबारा DGMO के पास पहुंच गए।
अब DGMO हरकत में आए। उन्होंने आर्मी चीफ से एक स्पेशल ऑपरेशन की मंजूरी ली और बुल को सियाचिन जाने की परमिशन दे दी।
1978 की गर्मियों में कर्नल बुल अपनी एक छोटी टीम लेकर सियाचिन के लिए निकल पड़े। सफर बेहद मुश्किलभरा था। तापमान माइनस 40 डिग्री से नीचे था। ऑक्सीजन का स्तर इतना कम था कि हर कदम पर फेफड़े फटने को होते थे। पैरों के नीचे हजारों फीट गहरी बर्फीली दरारें मुंह बाए खड़ी थीं। जरा भी चूके तो सीधे मौत।
हफ्तों तक मौत से लड़ने के बाद कर्नल बुल की टीम आखिरकार सियाचिन पहुंच गई। बर्फ की सफेद चादर में जापानी सिगरेट के खाली पैकेट, खाली डिब्बे और रैपर्स दबे हुए थे।
बड़ी मुश्किल से कर्नल बुल ने एक रैपर उठाया। उस पर उर्दू और अंग्रेजी में छपा था- ‘पाक आर्मी सप्लाई’।
उन्होंने दर्जनों तस्वीरें खींचीं, सैंपल्स जुटाए और वापस लौटकर एक रिपोर्ट तैयार की। यह रिपोर्ट सीधे आर्मी चीफ और प्रधानमंत्री दफ्तर पहुंची।
गंभीर खतरे को देखते हुए कर्नल बुल को 1978 के आखिर में फिर से सियाचिन भेजा गया। एक बार फिर से बुल को पाकिस्तानी रैपर्स और डस्टबिन के टुकड़े मिले।
अब तस्वीर एकदम साफ थी। खतरा सामने खड़ा था- ‘पाकिस्तानी फौज कभी भी सियाचिन पर कब्जा जमा लेगी।’

कर्नल बुल सियाचिन ग्लेशियर में पाकिस्तानी फौजियों की मौजूदगी के सबूत जुटाते हुए। AI इमेज
तभी इस मिशन में भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, यानी RAW की एंट्री हुई।
इधर, रावलपिंडी में भी हलचल तेज हो चुकी थी। आर्मी हेडक्वार्टर में सीक्रेट मीटिंग बुलाई गई। सिगार का लंबा कश खींचते हुए एक जनरल ने कहा- ‘जनाब, हिंदुस्तानियों की नाक बहुत तेज है। उन्हें हमारे नक्शों की भनक लग चुकी है।’
तभी कोने में खड़ा एक अफसर आगे आया। ब्रिगेडियर परवेज मुशर्रफ। वही मुशर्रफ, जो आगे चलकर पाकिस्तान के आर्मी चीफ और राष्ट्रपति बने।
मुशर्रफ ने नक्शे पर उंगली फेरते हुए कहा- ‘जनाब, हमें फौरन अपनी SSG कमांडो और 6th नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री को सियाचिन में उतार देना चाहिए।’
मुशर्रफ को टोकते हुए जनरल बोला- ‘बेटा, जल्दबाजी ठीक नहीं है। बिना तैयारी के गए तो सियाचिन के बर्फीले समंदर में दफन हो जाओगे।’
वक्त गुजरता रहा। दोनों मुल्कों में सियासी उलटफेर भी हुए। पाकिस्तान में मार्शल लॉ लागू हुआ। जनरल जिया आर्मी चीफ के साथ-साथ राष्ट्रपति भी बन बैठे। वहीं भारत में 1977 की करारी हार के बाद कांग्रेस ने 1980 में वापसी कर ली थी। इंदिरा फिर से प्रधानमंत्री बनी थीं।
साल 1983 का शुरुआती महीना…
पाकिस्तानी सेना ने अपने स्पेशल सर्विस ग्रुप यानी SSG कमांडोज का एक दस्ता रेकी के लिए सियाचिन भेजा। बर्फ के उस सफेद रेगिस्तान में जब SSG दस्ता आगे बढ़ा, तो एक जगह पहुंचकर उनके कदम ठिठक गए। बर्फ में दबा हुआ हिंदुस्तानी टेंट और राशन के कुछ खाली डिब्बे पड़े थे।
उनका कैप्टन चौंक गया- ‘तो हिंदुस्तानी काफिर यहां आ चुके हैं?’
SSG की रिपोर्ट के बाद रावलपिंडी में खतरे का सायरन बज उठा। राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक ने जनरलों को तलब किया, ‘पानी सिर से ऊपर जा चुका है। हिंदुस्तान हमसे पहले वहां पक्का ठिकाना बना ले, उससे पहले सियाचिन को अपने कब्जे में ले लो।’
उसी वक्त रावलपिंडी के वॉर रूम में जन्म हुआ- पाकिस्तान के सीक्रेट ‘ऑपरेशन अबाबील’ का।
अबाबील यानी इस्लामिक मान्यताओं के वे परिंदे, जिन्होंने काबा पर हमला करने आई हाथियों की फौज पर कंकड़ बरसाए थे।
पाकिस्तान बहुत जल्दी में था, लेकिन वह इस बात से बेखबर था कि उससे कहीं ज्यादा होशियार हिंदुस्तानी एजेंसियां हैं…

1980 का दशक। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया-उल-हक फौजी अफसरों के साथ मीटिंग करते हुए। AI इमेज
दिसंबर 1983 की एक ठंडी शाम। पेशावर में एक सेफ हाउस।
खिड़की पर भारी, गहरे पर्दे गिरे थे ताकि अंदर की रोशनी बाहर न जा सके। मेज पर जलती डिम लाइट में दो चेहरे आमने-सामने थे। एक RAW का अंडरकवर एजेंट और दूसरा उसका वफादार मुखबिर, जो गिलगित और बाल्टिस्तान के जानलेवा दर्रों की खाक छानकर लौटा था।
मुखबिर ने अपनी पश्मीना शॉल की ओट से एक डायरी निकालकर मेज पर सरका दी।
‘साहब… बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री और SSG कमांडोज को बर्फ के पहाड़ों पर लड़ने की ट्रेनिंग दी जा रही है। यूरोप से ऐसे दस्ताने, बूट और टेंट मंगाए गए हैं, जो माइनस 40 डिग्री की जानलेवा ठंड में काम आते हैं।’
RAW एजेंट ने डायरी के पन्ने पलटे। उसमें पाकिस्तानी फौज की गाड़ियों के नंबर, राशन डिपो की लोकेशन और बाल्टिस्तान में बने नए हाई-एल्टीट्यूड ट्रेनिंग कैंपों की डिटेल थी।
एजेंट ने कहा- ‘हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर ट्रेनिंग? इस हाड़ गला देने वाले मौसम में तो सियाचिन की चोटियों पर परिंदा भी पर नहीं मारता?’
‘वे इसी बात का फायदा उठाना चाहते हैं जनाब,’ मुखबिर थोड़ा आगे झुका।’
‘वे सियाचिन पर कब चढ़ाई करने वाले हैं? कोई पक्की तारीख?’ RAW एजेंट ने पूछा।
‘तारीख नहीं पता जनाब।’ मुखबिर ने कहा।
RAW एजेंट ने कोडवर्ड्स में रिपोर्ट तैयार की और उसे दुबई के एक सुरक्षित पते पर भेज दिया।
कुछ ही दिनों में वो सीक्रेट फाइल दिल्ली में RAW हेडक्वार्टर पहुंच चुकी थी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल था- पाकिस्तान कब सियाचिन के लिए निकलने वाला है?
अगर पाकिस्तान पहले पहुंच जाता, तो जंग शुरू होने से पहले ही भारत हार जाता। RAW को हर हाल में उस तारीख का पता लगाना था।
जनवरी 1984, लंदन का एक मशहूर माउंटेनियरिंग गियर स्टोर।
दुकान में बर्फ पर चढ़ने वाली कुल्हाड़ियां, विंड-प्रूफ जैकेट, स्नो-गॉगल्स और भारी-भरकम स्नो-बूट सजे थे। काउंटर पर बैठा मैनेजर फाइलों में उलझा था।
RAW का एक अफसर व्यापारी बनकर अंदर दाखिल हुआ। ‘गुड मॉर्निंग, रोनाल्ड! मैं अपनी रूटीन सप्लाई की डिलीवरी का स्टेटस चेक करने आया था।
स्टोर मैनेजर ने फाइल से नजर हटाई और मुस्कुराया, ‘अरे मिस्टर कपूर… आपके ऑर्डर्स तो तैयार रखे हैं, लेकिन एक मजे की बात बताऊं? इस बार आपके पड़ोसी भी अंधाधुंध खरीदारी कर रहे हैं।’
‘पड़ोसी’ शब्द सुनते ही RAW अफसर ठिठक गया। उसने खुद को संभालते हुए पूछा- ‘अच्छा? किस तरह की खरीदारी रोनाल्ड?’
मैनेजर थोड़ा आगे झुका, ‘पाकिस्तान आर्मी का बहुत बड़ा ऑर्डर आया है। 500 से ज्यादा सेट का अर्जेंट ऑर्डर। स्पेशल आर्कटिक गियर, स्नो-गॉगल्स, आइस-एक्स और एक्सट्रीम हाई-एल्टीट्यूड टेंट।’
RAW अफसर मुस्कुराया, ‘अरे भाई, पाकिस्तान के पहाड़ों में भी सर्दियां कम तो होती नहीं। शायद किसी नई पोस्ट के लिए मंगा रहे होंगे।’
मैनेजर ने सिर हिलाया।

यूरोप में सर्दियों के कपड़े खरीदने पहुंचा RAW एजेंट। AI इमेज
दुकान से निकलते ही RAW अफसर सीधे भारतीय दूतावास पहुंचा। उसने कोड वर्ड में मैसेज तैयार किया।
‘पाकिस्तानी फौज ने लंदन के सप्लायर को 500 से ज्यादा स्पेशल हाई-एल्टीट्यूड गियर्स का ऑर्डर दिया है। डिलीवरी डेट मार्च 1984 है।’
एक हफ्ते बाद… दिल्ली में आर्मी चीफ और RAW चीफ के बीच हाई-लेवल मीटिंग हुई। RAW चीफ ने कहा, ‘यूरोप से भारी तादाद में खरीदे जा रहे स्पेशल गियर इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि वे जल्द सियाचिन पर कब्जा करने वाले हैं।’
आर्मी चीफ के चेहरे पर सख्ती आ गई, ‘हम मई या अप्रैल के अंत तक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते। हमें उनसे पहले वहां पहुंचना होगा… किसी भी कीमत पर।’
साउथ ब्लॉक में प्रधानमंत्री दफ्तर…
बंद कमरे में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेना प्रमुख जनरल अरुण कुमार आमने-सामने बैठे थे। मेज पर सियाचिन का बड़ा सा नक्शा फैला था, जिसमें पॉइंट NJ9842 के पार का इलाका लाल स्याही से घेरा गया था।
आर्मी चीफ ने नक्शे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मैडम, खुफिया रिपोर्टों से साफ है कि पाकिस्तान सियाचिन के बिलाफोंड ला और सिया ला दर्रों पर कब्जे की पूरी तैयारी कर चुका है।’
इंदिरा ने कुछ पल सोचा, ‘हमें अपनी तैयारियां पुख्ता कर लेनी चाहिए। जल्दबाजी ठीक नहीं होगी… हम अपने सैनिकों को बिना साजो-सामान के मौत के मुंह में नहीं धकेल सकते।’
‘मैडम, अगर हमने जरा सी भी देर की, तो लद्दाख और काराकोरम दर्रे पर हमारी पकड़ हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। जब रेस शुरू हो ही चुकी है, तो हमें इंतजार नहीं करना चाहिए।’
कमरे में कुछ पल भारी सन्नाटा छाया रहा। फिर इंदिरा ने सेना प्रमुख की आंखों में देखते हुए कहा- ‘गो अहेड।’
हरी झंडी मिलते ही भारतीय सेना ने मिशन का कोडनेम रखा- ‘ऑपरेशन मेघदूत’… यानी बादलों का दूत।
तारीख अभी तय नहीं थी, लेकिन दुनिया के सबसे ऊंचे और जानलेवा मैदान में दो मुल्कों के बीच खूनी जंग तय हो चुकी थी…
पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए स्पाई फाइल्स: ‘ऑपरेशन मेघदूत’ के दूसरे एपिसोड में…
रेफरेंस :
- Beyond NJ 9842: The Siachen Saga : By Nitin A. Gokhale
- Full Spectrum: India’s Wars 1972–2020 : By Arjun Subramaniam
- In the Line of Fire: By Pervez Musharraf
- Soldier Mountaineer: The Colonel Who Got Siachen Glacier for India : By Colonel N. N. Bhatia, Colonel Narinder ‘Bull’ Kumar
