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फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट में सैकड़ों नाम होते हैं, पर मुश्किल वक्त में सबसे पहले किसे फोन करेंगे? शायद अंगुलियां कुछ गिने-चुने नामों पर ही रुकेंगी। शायद इसीलिए अब दोस्ती में भी ‘ब्रेकअप’ का ट्रेंड दिख रहा है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ‘दोस्त से बिना बताए दूरी कैसे बनाएं’ और ‘दोस्ती कैसे खत्म करें’ जैसी खोजों में हाल के महीनों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ इसे दोस्ती को लेकर बदलती सोच का संकेत मान रहे हैं। दरअसल, हाल ही में हुए एक सर्वे में सामने आया है कि 67% लोग ऐसी दोस्तियां भी निभा रहे, जिनमें अब अपनापन नहीं बचा। वे सिर्फ इसलिए जुड़े हैं क्योंकि कभी साथ पढ़े थे, साथ काम किया था या जीवन का कोई दौर साथ गुजारा था। वहीं 54% लोगों ने माना कि उनकी दोस्ती का बड़ा आधार अब शिकायतें, ऑफिस की बातें, पारिवारिक तनाव या किसी तीसरे व्यक्ति की बुराई रह गया है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर बनने वाले रिश्तों की भूमिका भी बदलती रहती है। स्कूल, कॉलेज, नौकरी, जिम या किसी यात्रा में बनी दोस्तियां उस समय बेहद मजबूत लग सकती हैं, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर उनमें से कई रिश्ते केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। इसके बावजूद लोग उन्हें सिर्फ पुरानी यादों या अपराधबोध के कारण ढोते रहते हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रोफेसर रॉबिन डनबर के अनुसार, इंसान 150 सामाजिक रिश्ते ही प्रभावी ढंग से निभा सकता है। इससे ज्यादा लोगों के साथ समान स्तर का भरोसा, समय और जुड़ाव बनाए रखना व्यावहारिक नहीं होता। यानी रिश्तों की संख्या बढ़ने के साथ उनकी गहराई कम होने लगती है। सिर्फ शिकायतों और नकारात्मक बातों पर टिकी दोस्ती मानसिक थकान बढ़ा सकती है। इसलिए विशेषज्ञ अब रिश्तों की संख्या नहीं, उनकी गुणवत्ता पर जोर दे रहे हैं। चुगली-शिकायतों से बनी दोस्ती भारी पड़ती है यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ फ्लोरिडा की मनोविज्ञान प्रोफेसर जेनिफर बॉसन के अध्ययन में पाया गया कि किसी तीसरे व्यक्ति, संस्था या मुद्दे के प्रति साझा नाराजगी लोगों को जल्दी करीब ले आती है। यानी दो लोग किसी एक व्यक्ति या बात को नापसंद करते हैं, तो उनके बीच अपनापन जल्दी बन सकता है। लेकिन अगर दोस्ती का आधार सिर्फ शिकायतें, चुगली और नकारात्मक बातचीत बन जाए, तो समय के साथ वही रिश्ता तनाव और चिंता का कारण भी बनने लगता है।
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दोस्ती में ब्रेकअप का ट्रेंड,150 से अधिक रिश्ते संभालना अव्यवहारिक:हर फ्रेंड ज़रूरी नहीं; 67% लोग ढो रहे अनचाहे रिश्ते, कम दोस्त ही बेहतर
