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Operation Meghdoot Part 2 | Siachen Glacier War Indian Army Pakistan


दैनिक भास्कर की ‘स्पाई फाइल्स’ सीरीज में आप पढ़ रहे हैं- ‘ऑपरेशन मेघदूत।’ पार्ट-1 में आपने पढ़ा- पाकिस्तान भारत का नक्शा बदलकर सियाचिन पर कब्जा जमाना चाहता था। उसकी फौज चुपचाप इलाके की रेकी कर चुकी थी और अब वहां पक्के बंकर बनाने की तैयारी में थी। तार

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उधर, भारत उस तारीख को डिकोड करने की जद्दोजहद में दिन-रात एक किए हुए था। हालात की नजाकत को देखते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘ऑपरेशन मेघदूत’ को हरी झंडी दे दी थी।

तभी खुफिया एजेंसी RAW को ऐसा इनपुट मिला, जिससे दुनिया के सबसे खतरनाक मैदान में दोनों मुल्कों के बीच खूनी जंग तय हो गई। पार्ट-2 में आगे की कहानी…

फरवरी 1984 की एक सर्द रात। दिल्ली के लोधी रोड में RAW का दफ्तर। घड़ी में रात के 11 बज रहे थे। अचानक मॉनिटर स्क्रीन जल उठी। बीप-बीप की आवाजें गूंजने लगीं। ड्यूटी अफसर ने तुरंत हेडफोन कान में लगाया।

दूसरी तरफ से कोड वर्ड में मैसेज आया- ‘अबाबील… अबाबील… 62 ब्रिगेड हेडक्वार्टर से सभी यूनिट्स। परिंदे उड़ने के लिए तैयार हैं। टाइमलाइन- अप्रैल का दूसरा-तीसरा हफ्ता। रिपीट, अप्रैल का दूसरा-तीसरा हफ्ता। टारगेट- सियाचिन।’

अफसर ने रिकॉर्डिंग रील पीछे घुमाई, मैसेज री-कन्फर्म किया। इनपुट 100% पक्का था। उसने हॉटलाइन का रिसीवर उठाया।

‘सर, पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन अबाबील’ लॉन्च कर दिया है। अप्रैल के तीसरे हफ्ते में सियाचिन पर उनकी मूवमेंट तय है।’

साउथ ब्लॉक एक्शन में आया। तुरंत इमरजेंसी ब्रीफिंग बुलाई गई।

आर्मी चीफ ने मैप पर हाथ रखते हुए कहा, ‘पाकिस्तानी फौज अगर वहां जम गई, तो हमारी फारवर्ड पोस्ट्स सीधे उनकी फायरिंग रेंज में होंगी। वी कैन नॉट अफोर्ड दिस रिस्क।’

DGMO ने कहा, ‘लेकिन सर, ग्राउंड सिचुएशन बहुत खराब है। बर्फबारी रुकी नहीं है। तापमान माइनस 50 डिग्री है।’

‘मौसम जो भी हो, हमें फर्स्ट मूवर एडवांटेज चाहिए,’ आर्मी चीफ का लहजा सख्त था।

‘तारीख क्या तय करें सर?’ DGMO ने पूछा।

‘आप अपनी यूनिट्स को मूव करने के लिए तैयार रखिए। D-Day की तारीख सही वक्त पर दी जाएगी।’

दिल्ली के साउथ ब्लॉक में आर्मी चीफ और अफसरों की मीटिंग। AI इमेज

दिल्ली के साउथ ब्लॉक में आर्मी चीफ और अफसरों की मीटिंग। AI इमेज

31 मार्च 1984…उधमपुर का नॉर्दन कमांड सेंटर।

मेज पर फैले नक्शों के बीच तीन बड़े फौजी अफसर गहरी सोच में डूबे थे। लेफ्टिनेंट जनरल एमएल छिब्बर, उनके चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल एनएस चीमा और मेजर जनरल अमरजीत सिंह।

तभी हॉटलाइन की घंटी बजी।

जनरल छिब्बर ने रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ से सीधे आर्मी चीफ की आवाज गूंजी- ‘13 अप्रैल 1984, बैसाखी का दिन। जब पूरा देश त्योहार मना रहा होगा, हमारे जांबाज सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर तिरंगा फहराएंगे।’

आदेश साफ था। टारगेट सियाचिन की दो सबसे रणनीतिक चोटियां थीं- बिलाफोंड ला और सिया ला।

कमांड सेंटर से तुरंत ऑपरेशन का हुक्म जारी हुआ। कैप्टन संजय कुलकर्णी को ‘4 कुमाऊं’ की एक प्लाटून के साथ ‘बिलाफोंड ला’ पर कब्जा करने का जिम्मा मिला। जबकि मेजर बहुगुणा की टुकड़ी को ‘सिया ला’ की ओर बढ़ने का आदेश दे दिया गया।

13 अप्रैल 1984…

घड़ी में सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे। लेह के सासोमा बेस कैंप के रनवे पर चीता हेलिकॉप्टर के पंखे तेजी से घूमने लगे। हेलिकॉप्टर ने कैप्टन संजय कुलकर्णी और एक जवान को लेकर उड़ान भरी। कुछ ही पलों में दो और हेलिकॉप्टर उनके पीछे आसमान में आ गए।

सुबह के करीब छह बजे का वक्त। दोनों हेलिकॉप्टर सियाचिन की बर्फीली सतह से महज कुछ फीट ऊपर मंडराने लगे।

तभी कैप्टन कुलकर्णी ने 25 किलो आटे की एक बोरी नीचे फेंक दी। बोरी बिना धंसे सख्त बर्फ पर टिक गई। अंदाजा सही निकला- बर्फ जवानों के कूदने लायक जमी हुई थी।

दो हेलिकॉप्टरों से कैप्टन संजय कुलकर्णी समेत चार सैनिक नीचे कूद पड़े।

जमीन पर उतरते ही जवानों ने फुर्ती दिखाई और एक अस्थायी हैलिपैड तैयार कर दिया, ताकि पीछे से आ रहे हेलिकॉप्टर बिना देर किए लैंड करें, जवानों को उतारें और फौरन बेस कैंप के लिए लौट जाएं।

ऑपरेशन पूरी रफ्तार में था। दोपहर होते-होते दोनों हेलिकॉप्टरों ने 17 उड़ानें पूरी कर लीं। कैप्टन कुलकर्णी, एक जीओसी और 27 जवान बिलाफोंड ला पर अपने जमा चुके थे।

लेकिन कुदरत का असली इम्तिहान अभी बाकी था।

साल 1984, चीता हेलिकॉप्टर से सियाचिन में उतरते हिंदुस्तानी फौजी।

साल 1984, चीता हेलिकॉप्टर से सियाचिन में उतरते हिंदुस्तानी फौजी।

अचानक मौसम बिगड़ गया। विजिबिलिटी गिरकर जीरो पर पहुंच गई। तापमान माइनस 40 डिग्री तक लुढ़क चुका था। इतनी सर्दी की अगर आंसू निकले तो गालों पर जम जाए और खौलता पानी हवा में उछालो तो फर्श पर गिरने से पहले बर्फ बन जाए।

इसी बीच कैप्टन कुलकर्णी और उनकी टीम का आर्मी हेडक्वार्टर से रेडियो संपर्क पूरी तरह टूट गया। अगले दो दिनों तक बर्फीले तूफान की वजह से वहां कोई मूवमेंट नहीं हो सका।

उधर, ‘सिया ला’ चोटी पर कब्जा करने के लिए निकली टीम तो बेस कैंप से उड़ान तक नहीं भर पाई।

अब तक पाकिस्तान इस मिशन से बेखबर था। वह अपनी तय तारीख यानी 17 अप्रैल के हिसाब से ही तैयारी में जुटा था।

ब्रिगेडियर परवेज मुशर्रफ SSG कमांडोज की टीम लेकर सियाचिन के लिए निकल चुके थे। पीछे-पीछे नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री की टुकड़ी भी आ रही थी।

रास्ते में एक पाकिस्तानी जवान ने अपनी रेडियो फ्रीक्वेंसी ट्यून की। तभी सेट पर कैप्टन कुलकर्णी की आवाज गूंजी- ‘वी हैव लॉस्ट आवर सोल्जर…’

रेडियो ऑपरेटर ने तुरंत मुशर्रफ को इत्तला दी, ‘सर, लगता है हिंदुस्तानी सियाचिन पहुंच चुके हैं।’

मुशर्रफ ने हड़बड़ाकर पूछा, ‘तुम्हें कैसे पता?’

‘सर, अभी उनके कैप्टन का मैसेज डिकोड हुआ है। उनका एक जवान बर्फ में दफन हो गया है।’

इधर, उसी रोज खराब मौसम से लड़ते हुए मेजर बहुगुणा की टीम भी सिया ला चोटी पर कब्जा जमा चुकी थी। अब सियाचिन के दोनों सबसे अहम चोटियों पर भारत का झंडा फहरा रहा था।

तभी आसमान में पाकिस्तानी हेलिकॉप्टरों की गड़गड़ाहट गूंजी। वे भारतीय पोजिशन के ऊपर मंडराने लगे।

कैप्टन ने फौरन ऑर्डर दिया- ‘किल द बास्टर्ड!’

सैनिकों की उंगलियां ट्रिगर पर कस गईं, लेकिन इससे पहले कि गोली चलती, हेलिकॉप्टर धुंध गायब हो गया।

भारतीय फौज को लगा कि पाकिस्तानी वापस लौट चुके हैं, लेकिन कहानी में अभी एक खूनी मोड़ बाकी था…

सियाचिन पर कब्जा करने के बाद भारतीय सैनिक और शहीद जवान का शव। AI इमेज

सियाचिन पर कब्जा करने के बाद भारतीय सैनिक और शहीद जवान का शव। AI इमेज

24 अप्रैल की रात…

अचानक पाकिस्तान ने ऊपर से हैवी शेलिंग शुरू कर दी। एक के बाद एक धमाकों से पूरा ग्लेशियर दहल उठा। इस अंधाधुंध गोलाबारी की आड़ में पाकिस्तानी SSG कमांडोज चुपचाप ऊपर की ओर चढ़ने लगे।

अगली सुबह। बर्फ की खामोशी में भारी जूतों की आहट गूंजी। भारतीय जवानों के कान खड़े हो गए। कैप्टन कुलकर्णी ने हमला करने का इशारा किया और एलएमजी के मुंह खोल दिए। SSG कमांडोज पर अंधाधुंध गोलियों और ग्रेनेड्स की बौछार शुरू हो गई।

तभी दोनों सेनाओं के बीच कुदरत का कहर टूटा। एक भयानक बर्फीला तूफान आ गया। विजिबिलिटी इतनी गिर गई कि आंखें खोल पाना भी नामुमकिन था।

शून्य से नीचे के तापमान में हथियार जमने लगे, तो दोनों मुल्कों के सैनिक राइफलें छोड़ सीधे एक-दूसरे पर झपट पड़े।

हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट शुरू हो गया। संगीनों और चाकुओं से पेट छलनी किए जाने लगे। सफेद बर्फ पर लाशें बिछने लगीं और बहता हुआ खून देखते ही देखते जमने लगा।

घंटों चले इस खूनी मुकाबले के बाद पाकिस्तानी सैनिक टिक नहीं सके और उल्टे पांव नीचे की तरफ भाग खड़े हुए। भारत ने सियाचिन पर अपना कब्जा बरकरार रखा, लेकिन इस जीत की कीमत रोंगटे खड़े कर देने वाली थी।

भारत के कई जवान शहीद हो चुके थे। इन शहीदों के शवों को नीचे पहुंचाना किसी डरावने सपने जैसा था।

चेतक हेलिकॉप्टर इतने छोटे थे कि उनमें एक शव रख पाना भी मुश्किल होता था। ठंड के मारे शव इतने अकड़ जाते कि उनकी हड्डियां तक तोड़नी पड़तीं, तब जाकर उन्हें स्लीपिंग बैग में कसकर बांधा जाता था।

एक गोरखा जवान की लाश हफ्तों बर्फ में पड़ी रही। हर दिन उसके साथी शव को उठाकर हैलिपैड तक लाते, लेकिन हेलिकॉप्टर में जगह न होने पर आंखों में आंसू लिए उसे वापस बंकर में लेकर चले जाते।

लगातार 20 दिनों तक ऐसा ही होता रहा। हर रोज शव को ले जाना और वापस लाना… जवानों के दिमाग पर इसका गहरा असर पड़ा। उन्हें मतिभ्रम होने लगा। वे उस मृत साथी को जिंदा मानकर हर दिन उसके हिस्से का खाना निकालने लगे।

ये कोई सुनी-सुनाई बात नहीं है। सच में ऐसा ही हुआ था।

जब बड़े अफसरों तक बात पहुंची, तो उस शव को फौरन ‘पी-1’ यानी प्रिफरेंस वन कैटेगरी में डाला गया। तब जाकर उस शहीद जवान का शव नीचे बेस कैंप भेजा जा सका और उसे आखिरी विदाई मिल सकी।

कई सैनिकों की लाशें महीने भर सियाचिन में पड़ी रहीं। AI इमेज

कई सैनिकों की लाशें महीने भर सियाचिन में पड़ी रहीं। AI इमेज

तब तक भारतीय सेना सियाचिन में अपना पहला अस्थाई हैलिपैड तैयार कर चुकी थी। ‘सोनम पोस्ट’ के नाम से अपना फॉरवर्ड बेस भी बना लिया था।

भारत को लगा कि उसने सियाचिन का युद्ध जीत लिया है, लेकिन पाकिस्तान इतनी आसानी से पीछे हटने वाला नहीं था…

2 साल बाद…

1986 की एक शाम। रावलपिंडी हेडक्वार्टर में जनरलों और खुफिया अफसरों की मीटिंग हुई। तय हुआ कि इस बार हेलिकॉप्टरों के बजाय पैदल और रस्सियों के सहारे चढ़ाई की जाएगी।

टारगेट था-सियाचिन की सबसे ऊंची चोटी पर फतह। एक ऐसी चोटी, जहां से हिंदुस्तानी फौज की हर हलचल पर सीधी नजर रखी जा सके। यह चोटी 22,153 फीट की ऊंची थी।

सर्दियों में सियाचिन का पारा माइनस 50 डिग्री से भी नीचे चला जाता था। भयानक बर्फीले तूफानों के चलते भारतीय जवान गश्त पूरी करके अस्थायी तौर पर नीचे बने कैंपों में लौट आते थे। पाकिस्तानियों तक यह खुफिया खबर पहुंच चुकी थी।

1986 की एक रात, पाकिस्तान की स्पेशल टीम ने अपने कब्जे वाले कश्मीर की तरफ से चढ़ाई शुरू की। वे सिर्फ रात के घुप अंधेरे में आगे बढ़ते और दिन भर बर्फ की ऊंची दीवारों के पीछे छिपकर वक्त गुजारते।

यह खतरनाक सिलसिला कई हफ्तों तक चला। साल के अंत तक पाकिस्तानी फौज चुपचाप सियाचिन की उस ऊंची चोटी पर काबिज हो गई।

उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर उस जगह का नाम रख दिया- ‘कायद पोस्ट’।

इस चोटी के तीन तरफ सीधी बर्फीली दीवारें थीं। ऊपर पहुंचने का अकेला रास्ता इतना संकरा था कि एक बार में सिर्फ एक ही सैनिक निकल सकता था।

अब पाकिस्तानी आसानी से भारतीय चौकियों को निशाने पर ले सकते थे। इतना ही नहीं, अगर भारत हेलिकॉप्टर से राशन भेजने की कोशिश करता, तो वे उसे भी मार गिराने की स्थिति में थे।

जिस सियाचिन को भारत ने इतनी मशक्कत से हासिल किया था, अब उसे गंवाने का खतरा मंडराने लगा था।

तभी भारत की खुफिया एजेंसी RAW की एंट्री हुई… इसी RAW ने 1971 में पाकिस्तान के टुकड़े किए थे। खैर, कहानी में आगे बढ़ते हैं।

सोनम पोस्ट से 1553 फीट ऊंचा था पाकिस्तानी कायद पोस्ट।

सोनम पोस्ट से 1553 फीट ऊंचा था पाकिस्तानी कायद पोस्ट।

फरवरी 1987 की बात है। RAW के वायरलेस मॉनिटरिंग स्टेशन ने पाकिस्तानी फौज के कुछ कोडवर्ड्स पकड़े। उसमें सियाचिन के उत्तरी इलाके में नए गश्ती दलों और रसद पहुंचाने की बातें हो रही थीं।

RAW ने आर्मी हेडक्वार्टर और उधमपुर के नॉर्दर्न कमान को सीक्रेट रिपोर्ट भेजी।

इंडियन आर्मी फौरन हरकत में आई। टोह लेने के लिए अप्रैल 1987 में 27 राजपूत और लद्दाख स्काउट्स की एक टीम को जिम्मेदारी दी गई।

एक बर्फीली रात, भारतीय जवानों की टीम सोनम पोस्ट से धीरे-धीरे आगे बढ़ी। तभी सन्नाटे को चीरती हुई मशीन गन की गोलियां बरसने लगीं। दो सैनिक वहीं शहीद हो गए और कई जख्मी।

ये शहादत इस बात की गवाह थी कि पाकिस्तानी सियाचिन की सबसे ऊंची चोटी पर काबिज हो चुके हैं।

अब भारत को हर हाल में पाकिस्तान को वहां से खदेड़ना था…

29 मई 1987 की रात…

सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे की अगुआई में 13 जवानों की टोली ‘कायद पोस्ट’ की तरफ बढ़ी। मिशन साफ था-रात के घुप अंधेरे में बर्फीली दीवार पर रस्सियां बांधना और रास्ता बनाना, ताकि पीछे आ रही बाकी प्लाटून ऊपर चढ़ सके।

माइनस 40 डिग्री तापमान और बर्फीला तूफान बदन को चीर रहा था। राजीव पांडे और उनके जवान बर्फ में कुल्हाड़ियां गाड़-गाड़कर एक-एक इंच ऊपर खिसक रहे थे। सोनम पोस्ट से कायद पोस्ट की ऊंचाई करीब 1,553 फीट थी।

30 मई को तड़के, उनकी टीम पाकिस्तानी पोस्ट से महज 50 मीटर नीचे पहुंच चुकी थी। जवानों ने गहरी सांस ली और हमला बोलने के लिए पोजिशन संभालनी चाही, तभी बर्फ में दबा पाकिस्तानी सेंसर ट्रिगर हो गया।

पलक झपकते ही ऊपर से पाकिस्तानी SSG कमांडोज की मशीन गनों ने आग उगलना शुरू कर दिया। राजीव पांडे और उनके चार साथी वहीं शहीद हो गए।

कायद पोस्ट की तरफ चढ़ाई करते हुए भारतीय सैनिक। AI इमेज

कायद पोस्ट की तरफ चढ़ाई करते हुए भारतीय सैनिक। AI इमेज

लगातार दूसरा मिशन नाकाम रहा, लेकिन हिंदुस्तानी फौज ने हौसला नहीं हारा…

जून 1987 में एक बार फिर चढ़ाई की तैयारी शुरू हुई। मिशन का नाम रखा गया- ‘ऑपरेशन राजीव’। शहीद सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे के सम्मान में।

पाकिस्तानियों को चकमा देने के लिए इस बार दो तरफ से एक साथ हमला बोलने का प्लान तैयार हुआ।

पहला दल- मेजर बरिंदर सिंह की कमान में सीधे ‘आइस वॉल’ के रास्ते ऊपर चढ़ेगा।

दूसरा दल- कैप्टन ए.बी. देव की अगुआई में दाहिनी तरफ के बर्फीले दर्रे से चक्कर काटकर ऊपर की ओर बढ़ेगा।

हमले की तारीख तय हुई- 22 जून 1987…

घुप्प अंधेरी रात में मेजर बरिंदर सिंह की टीम ने चढ़ाई शुरू की। कुछ देर बाद वे लगभग उसी जगह पहुंच गए, जहां सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे शहीद हुए थे।

तभी पाकिस्तानियों को आहट मिल गई और उन्होंने ऊपर से मोर्टार के भारी गोले बरसाने शुरू कर दिए। भारतीय जवान एक बार फिर खुली ढलान पर फंस गए।

मेजर बरिंदर सिंह जख्मी हो गए और कई जवान मौके पर ही शहीद। रात ढलते-ढलते इस मिशन को भी रोकना पड़ा। बचे हुए जवान भारी मन से नीचे लौट आए।

भारतीय कैंप में सन्नाटा छा गया। लगातार तीसरी कोशिश नाकाम हो चुकी थी। कई बहादुर जवान अपनी शहादत दे चुके थे। मौसम इतना भयावह था कि न तो हेलिकॉप्टर से घायलों को निकाला जा सकता था, न राशन पहुंचना मुमकिन था।

कैंप के एक कोने में 38 साल का एक सूबेदार चुपचाप अपनी राइफल साफ कर रहा था। उसकी आंखों में साथियों के खोने का दर्द और बदले की आग जल रही थी। उसका नाम था- सूबेदार बाना सिंह।

कर्नल यूके शर्मा ने बचे हुए जवानों को इकट्ठा किया। उन्होंने भारी आवाज में पूछा, ‘अब कौन जाएगा ‘कायद पोस्ट’ पर तिरंगा फहराने?’

सूबेदार बाना सिंह बिनादौड़कर आगे आए। सैल्यूट ठोका और बोले, ‘साहब, मैं जाऊंगा।’

कर्नल ने गर्व से बाना सिंह का कंधा थपथपाया- ‘प्राउड ऑफ यू, माय बॉय।’

अब बाना सिंह पाकिस्तानियों के सपने में आने वाले थे…

पिछले तीनों हमलों में भारतीय जवानों ने सामने से चढ़ाई की थी, लेकिन बाना सिंह ने ऐसा रास्ता चुना, जिसे सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाएं।

उन्होंने तय किया कि वे सामने से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी पोस्ट के बिल्कुल पीछे से चढ़ेंगे। पीछे 90 डिग्री की सीधी बर्फीली दीवार थी, जहां कांच जैसी फिसलन थी। पाकिस्तानियों को पक्का यकीन था कि इस रास्ते से कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

इस मिशन के लिए बाना सिंह के साथ चार और जांबाज चुने गए- नायब सूबेदार चूनी लाल, राइफलमैन ओम राज, राइफलमैन मंजीत सिंह और राइफलमैन गनपत राज।

सूबेदार बाना सिंह अपने अफसर से बात करते हुए। AI इमेज

सूबेदार बाना सिंह अपने अफसर से बात करते हुए। AI इमेज

तारीख तय हुई- 25 जून 1987…

शाम के करीब 5 बज रहे थे। तापमान माइनस 50 डिग्री से भी नीचे गिर चुका था। 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बर्फीली हवाएं बदन को चीर रही थीं।

बाना सिंह और उनके चार साथियों ने अपनी राइफलें पीठ पर कसीं, हाथों में हैंड ग्रेनेड साधे और रात के अंधेरे में धीरे-धीरे ओझल हो गए।

वे बर्फ पर रेंग रहे थे। कभी घुटनों के बल, तो कभी पेट के बल। ऑक्सीजन इतनी कम थी कि हर दो कदम चलने पर लगता था मानो फेफड़े अभी फट पड़ेंगे।

रात के 12 बजे यह टीम ‘आइस वॉल’ के ठीक नीचे पहुंच गई। सामने 1,500 फीट ऊंची बर्फ की सीधी खड़ी दीवार थी।

बाना सिंह ने बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ी निकाली और पूरी ताकत से बर्फ में गाड़ दी- ठक! एक कदम ऊपर… फिर दूसरी कुल्हाड़ी- ठक!

वे एक-एक इंच जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए ऊपर खिसक रहे थे। एक भी कुल्हाड़ी फिसली, तो सीधे 2 हजार फीट नीचे गहरी खाई में मौत तय थी।

बाना सिंह के दिमाग में दो ही बातें घूम रही थीं- शहीद राजीव पांडे का चेहरा और सियाचिन की चोटी पर फहराता तिरंगा।

अब तक सुबह के 4 बज चुके थे। तारीख 25 जून से 26 जून हो गई थी।

चारों तरफ घना कोहरा और बर्फीली धुंध छाई हुई थी। दो कदम आगे भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यही धुंध जवानों के लिए बड़ा वरदान बन गई।

बाना सिंह और उनके साथी इस धुंध की ओट में धीरे-धीरे ऊपर खिसकते रहे। आखिरकार, दोपहर होते-होते बाना सिंह की टीम उस खौफनाक बर्फीली दीवार को लांघकर पाकिस्तानी बंकर के ठीक पीछे पहुंच गई।

दोपहर के करीब 1:30 बजे…

कायद पोस्ट पर तैनात पाकिस्तानी SSG कमांडो पूरी तरह बेफिक्र थे। कुछ जवान बंकर के अंदर आराम से गर्म चाय और सूप की चुस्कियां ले रहे थे।

तभी बर्फ पर हल्की-सी आहट हुई। बाहर खड़े पाकिस्तानी संतरी ने चौंककर पीछे देखा- सफेद स्नो सूट में ढके बाना सिंह उसके सामने खड़े थे।

संतरी अपनी राइफल उठा पाता, उससे पहले ही बाना सिंह की संगीन उसकी छाती के पार हो चुकी थी।

बाना सिंह ने दौड़कर पाकिस्तानी बंकर के भारी दरवाजे को बाहर से खींचा और कुंडी चढ़ा दी। इसके बाद हैंड ग्रेनेड की पिन खींची, पूरी जान लगाकर चिल्लाए- ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल!’ और ग्रेनेड को बंकर के छोटे से वेंटिलेशन होल में अंदर फेंक दिया।

जोरदार धमाका हुआ- धड़ाम!

सूबेदार बाना सिंह पाकिस्तानी बंकर का दरवाजा बंद करने के बाद ग्रेनेड फेंकते हुए। AI इमेज

सूबेदार बाना सिंह पाकिस्तानी बंकर का दरवाजा बंद करने के बाद ग्रेनेड फेंकते हुए। AI इमेज

बंकर के भीतर तबाही मच गई। ज्यादातर पाकिस्तानी सैनिक बंकर में ही जलकर भस्म हो गए। जो बाहर भागने में कामयाब हुए, उन पर नायब सूबेदार चूनी लाल की ऑटोमैटिक राइफलों ने गोलियों की बौछार कर दी।

बाना सिंह और उनके साथी काल बनकर दुश्मनों पर टूट पड़े। हिंदुस्तानी फौज के इस अचानक और घातक हमले के खौफ से पाकिस्तानी कमांडोज 22 हजार फीट की ऊंचाई से नीचे खाइयों में कूद गए।

महज आधे घंटे के भीतर बाना सिंह की जांबाज फौज दुश्मन को ढेर कर चुकी थी।

इधर, नीचे बेस कैंप में कर्नल यूके शर्मा और उनके साथी रेडियो सेट पर कान लगाए बैठे थे। वक्त थम सा गया था और दिल की धड़कनें बेकाबू हो रही थीं।

तभी रेडियो के स्पीकर की सरसराहट को चीरती हुई बाना सिंह की कड़क आवाज गूंजी- ‘सर… वी हैव कैप्चर्ड द पोस्ट।’

आवाज सुनते ही पूरे बेस कैंप में नारे गूंज उठे- ‘भारत माता की जय!’

सूबेदार बाना सिंह ने अपनी जेब से तिरंगा निकाला और कायद पोस्ट की उस बर्फीली छाती पर गाड़ दिया। अब पूरा सियाचिन ग्लेशियर भारत के कब्जे में था।

बाद में भारतीय सेना ने इस चोटी का नाम बदलकर ‘बाना टॉप’ रख दिया। यह पहली बार था, जब किसी जीवित सैनिक के साहस के सम्मान में किसी चोटी का नाम रखा गया हो।

अगले साल, यानी 26 जनवरी 1988 को राष्ट्रपति भवन में सूबेदार बाना सिंह को देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से नवाजा गया।

1987 से लेकर आज तक सियाचिन की इन सबसे अहम चोटियों पर भारतीय सेना का कब्जा कायम है, लेकिन इसे बरकरार रखने की कीमत भी बहुत बड़ी रही है।

अब तक 1 हजार से ज्यादा सैनिक शहादत दे चुके हैं। जिनमें से ज्यादातर की मौत दुश्मन की गोली से नहीं, बल्कि कुदरत के जानलेवा कहर से हुई है।

ऑपरेशन मेघदूत सीरीज की पहली कड़ी भी पढ़िए :

जनाब एक आइडिया है… बिना जंग के हार जाएगा हिंदुस्तान:नक्शा बदलकर सियाचिन कब्जाना चाहता था पाकिस्तान, जासूसों ने कैसे बिगाड़ा खेल; पार्ट-1

रेफरेंस :

  1. Beyond NJ 9842: The Siachen Saga : By Nitin A. Gokhale
  2. Full Spectrum: India’s Wars 1972–2020 : By Arjun Subramaniam
  3. In the Line of Fire: By Pervez Musharraf
  4. Soldier Mountaineer: The Colonel Who Got Siachen Glacier for India : By Colonel N. N. Bhatia, Colonel Narinder ‘Bull’ Kumar



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