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एन. रघुरामन का कॉलम:भविष्य में ‘वीकेंड इकॉनमी’ लोगों का अधिक ध्यान खींच सकती है




मैं ऐसे शेफ को जानता हूं, जो सोमवार और मंगलवार को घर ही रहते हैं। बुधवार को दिन में अलग-अलग जगह जाकर रिसर्च करते हैं और शाम को रेस्तरां पहुंचते हैं, ताकि हफ्ते के बीच आने वाले ग्राहकों को सेवा दे सकें। फिर गुरुवार से रविवार तक देर रात तक काम करते हैं। मुंबई में लंबे समय से साउथ मुंबई के रेस्तरां और दादर जैसे इलाकों के छोटे आउटलेट्स हफ्ते में केवल चार रात ही खुलते हैं। इससे ग्राहकों में उत्सुकता और मांग हमेशा आपूर्ति से ज्यादा बनी रहती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि आंत्रप्रेन्योर्स ने मुंबईकरों का खरीदारी ट्रेंड भांप लिया है, जो वीकेंड पर या वीकेंड के आस-पास के दिनों में ज्यादा खर्च करते हैं। इसी सप्ताह डेटा आउटफिट ‘प्राइस’ और टाटा संस की ओर से देश के शीर्ष 100 शहरों में उपभोग पैटर्न पर एक अध्ययन में यही बात सामने आई है। इसके अनुसार शहरी उपभोक्ताओं के साप्ताहिक खर्च का दो-तिहाई हिस्सा शनिवार और रविवार को व्यय होता है। किराना और हेल्थकेयर जैसी जरूरी चीजों पर खर्च पूरे सप्ताह समान रहता है, लेकिन फैशन खर्च में स्पष्ट उछाल दिखता है। यह खर्च अन्य दिनों के औसत 529 रुपए से बढ़कर वीकेंड पर औसत 1075 रुपए तक पहुंच जाता है। यह रुझान देश के छह बड़े महानगरों- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद- में ज्यादा स्पष्ट है। बाकी 94 शहर भी बहुत पीछे नहीं हैं। सिर्फ धनबाद जैसे कुछ शहरों में यह स्तर थोड़ा कम है। लंबे समय से जैविक खेती करने वाले किसान न सिर्फ मुंबई और बेंगलुरु जैसे टियर-1 शहरों में, बल्कि इंदौर और जयपुर जैसे टियर-2 शहरों में भी यह काम बहुत अच्छे ढंग से कर रहे हैं। कई किसान केवल रविवार को कारोबार करते हैं, क्योंकि कॉर्पोरेट कर्मचारी अगले कुछ दिनों के लिए ताजा सब्जियों का स्टॉक फ्रिज में रखते हैं। ये किसान एक साथ, एक ही जगह जाकर अपनी साप्ताहिक उपज बेचते हैं। अमेरिका, कनाडा, जापान और यूरोप जैसे विकसित देशों में भी कई स्वतंत्र बुटीक, फैशन, एंटीक या क्राफ्ट स्टोर केवल गुरुवार से रविवार तक ही खुलते हैं। इनके मालिक दैनिक ग्राहकों के बजाय अपॉइंटमेंट, ऑनलाइन सेल्स या अधिक मार्जिन वाले कारोबार में भरोसा करते हैं। मैंने केरल जैसे राज्यों में कुछ प्राइवेट म्यूजियम देखे हैं, जो जनता के लिए केवल वीकेंड पर और अन्य दिनों में रिक्वेस्ट पर ही खोले जाते हैं। सोच रहे होंगे कि जब किराया और वेतन जैसे फिक्स खर्चे समान रहते हैं तो फिर ये व्यवसाय चार दिन ही क्यों खुलते हैं? इसके कई कारण हैं। हो सकता है यह उस जगह की खासियत के कारण हो, जैसे म्यूजियम। हो सकता है परिसर खुद का हो और कर्मचारी परिवार के सदस्य हों, जो तीन दिन काम करके कमाई करते हैं और बाकी चार दिन जीवन का आनंद लेते हैं। जो लोग किराए के परिसर में कारोबार कर रहे हैं, संभवत: वे इसे ओम्नी-चैनल रिटेल के तौर पर चला रहे हों, जहां वे फिजिकल शॉप के साथ ऑनलाइन बिक्री और ‘क्लिक-एंड-कलेक्ट’ जैसे ऑफर्स का मिश्रण करते हों। क्या भविष्य में थ्री-डे रिटेल मॉडल आम हो सकता है? कई कॉलेज अपने कोर्सेज में आंत्रप्रेन्योरशिप को बढ़ावा दे रहे हैं तो हो सकता चुनिंदा सेक्टरों में अगले कुछ वर्षों में ऐसा हो। इस मॉडल से जिन कारोबारों को फायदा हो सकता है, उनमें लग्जरी बुटीक, हस्तनिर्मित उत्पाद, डिजाइनर फर्नीचर, आर्ट एंड कलेक्टिबल्स, स्पेशियल्टी फूड और विंटेज क्लोदिंग शामिल हैं। भविष्य के ऐसे वीकेंड स्टोर ‘डेस्टिनेशन शॉपिंग’ के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, जो सोमवार से गुरुवार तक ऑनलाइन ऑर्डर लें और इस दौरान स्टाफ को इन्वेंट्री, प्रोडक्शन और ऑनलाइन ग्राहकों से जुड़ने के लिए इस्तेमाल करें। शुक्रवार, शनिवार और रविवार को खुलने के कारण ऐसे कारोबारों में श्रम लागत कम हो सकती है और वे अधिकतर डिमांड को भी पूरा कर सकते हैं। कुछ तो अपने सीमित समय तक खुले रहने को ही एक्सक्लूसिव ब्रांड एक्सपीरियंस के रूप में प्रचारित करते हैं। यदि आप फूड बिजनेस में उतरना चाहते हैं तो वीकेंड वेंचर शुरू कर कम से कम निवेश में बाजार को परख सकते हैं। फंडा यह है कि वर्क-लाइफ बैलेंस चाहने वाले हाइली-प्रोडक्टिव कर्मचारियों की कमी और वीकेंड पर होने वाले मनमर्जी के खर्च को देखते हुए कई आंत्रप्रेन्योर ‘वीकेंड इकॉनमी’ पर विचार कर सकते हैं। कुछ रिटेल कारोबारों में तो यह भविष्य का ट्रेंड बन सकता है।



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