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धर्म कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल लुप्त होता है। और अधर्म भी नष्ट नहीं होता, थोड़े समय के लिए अनुपस्थित हो जाता है। यदि अधर्म नष्ट हो जाता हमेशा के लिए, तो महाभारत के बाद कलियुग में फिर वही सब न होता। लेकिन कृष्ण भी जानते थे कि ना धर्म नष्ट होगा, ना अधर्म। उस दौर में जो हमारी संवैधानिक भूमिका होगी, वही धर्म है। इसीलिए कृष्ण ने कहा था कि चूंकि धर्म समाप्त नहीं हुआ, इसलिए उसकी पुनर्स्थापना की जाए। अधर्म का विस्थापन किया जाए, उस पर नियंत्रण रखा जाए। पर उसे जड़ से मिटा देंगे, यह संभव नहीं है। राम आए तो रावण भी आया। कंस था तो कृष्ण थे। खलनायक वृत्ति कभी समाप्त नहीं होगी। तो जब-जब अधर्म का अंधेरा आए, हमें बहुत सावधानी से प्रकाश पर काम करना चाहिए। हमने धर्म का बहुत कम लाभ उठाया है। हमारी रुचि, हमारी जानकारी अधर्म को लेकर अत्यधिक रहती है। अधर्म को मिटाने के लिए ही श्रीराम और श्रीकृष्ण ने हमें आश्वस्त किया है कि अधर्म से डरो मत, हम हैं तो धर्म है।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:जब-जब अधर्म का अंधेरा आए, सावधानी से धर्म पर काम करें
