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दैनिक भास्कर की सीरीज स्पाई फाइल्स में आप पढ़ रहे हैं- ऑपरेशन हॉरनेट। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारत की खुफिया एजेंसी को एक मिशन दिया गया- खालिस्तानी नेटवर्क का खात्मा। निशाने पर दो लोग थे- ISI एजेंट अब्दुल खान और उसका खास प्यादा संधू। इस सीक्रेट ऑपरेशन की कमान RAW के दो धुरंधरों के हाथों में थी। पेरिस से संजीव जिंदल और दिल्ली दफ्तर से अनुज भारद्वाज। नारायणन, क्लार्क और सोफी उनके ऐसे मोहरे थे, जो मौत के मुहाने पर खड़े रहने के आदी थे। ISI वाले अलग-अलग देशों में पाकिस्तानी अफसर बनकर बैठे थे। लिहाजा ये मिशन बेहद खतरनाक था। कई बार शिकार हाथ आ गए, लेकिन फिर रेत की तरह फिसल भी गए। आगे की कहानी पार्ट-2 में पढ़िए… बात जनवरी 1985 की है। पेरिस का एक सेफ हाउस, यानी ऐसा गुप्त ठिकाना, जहां से भारतीय खुफिया एजेंसी RAW का ऑपरेशन चलता था। कमरे में हल्की पीली रोशनी फैली। हवा में सिगरेट का तैरता धुआं और खिड़की के शीशों पर बाहर गिरती बारिश की बूंदें। RAW के सीनियर अफसर संजीव जिंदल कागज पर लिखे नामों पर लाल पेन से घेरे बना रहे थे। उस पर लिखा था- ‘संधू, हरबख्श सिंह और अब्दुल खान…’ संजीव ने सिगरेट का एक कश खींचा, फोन का रिसीवर उठाया और डायल घुमाया। ‘मिस्टर नारायणन… गाड़ियों के नंबर और संधू-हरबख्श की इस्लामाबाद ट्रिप की खबर पक्की है?’ लंदन से नारायणन की आवाज आई, ‘यस बॉस। अब्दुल खान के नौकर तारिक को जैसे ही पैसे मिले, उसने पूरी लिस्ट दे दी। संधू और हरबख्श फरवरी के पहले हफ्ते में सीमा पार कर रहे हैं।’ संजीव ने पूछा, ‘क्या अब्दुल के साथ उन दोनों की तस्वीरें मंगवा सकते हो?’ ‘बॉस, तारिक नौकर है, जासूस नहीं। वह पाला बदल सकता है। फिर भी… मैं कोशिश करता हूं।’ कहकर नारायणन ने फोन रख दिया। हरबख्श और संधू दोनों ISI के मोहरे थे, जिन्हें अब्दुल खान भारत में खालिस्तानी चरमपंथ फैलाने के लिए ट्रेनिंग और फंड मुहैया करा रहा था। एक हफ्ते बाद… संजीव पेरिस के सेफ हाउस में बैठा चाय पी रहा था। तभी फोन की घंटी बजी। ‘सर, नारायणन बोल रहा हूं। अब्दुल का नौकर मुकर गया। फोटो खींचने के नाम पर डर गया।’ ‘फिर तो मामला अटक गया?’ संजीव ने पूछा। ‘नहीं बॉस। पांच हजार डॉलर की पेशकश की, तो इरादा बदल गया। फोटो तो नहीं मिली, लेकिन उसने अब्दुल के दफ्तर से कुछ लिफाफे पार कर दिए हैं।’ ‘कुछ काम का है?’ ‘हां, बैंक के डॉक्युमेंट हैं। अब्दुल लंदन के अलग-अलग बैंक खातों में छोटी-छोटी रकम जमा कर रहा है।’ संजीव तुरंत सीधा होकर बैठा, ‘क्या यह कट-मनी है?’ ‘ये खाते फर्जी नामों से हैं, लेकिन असली मालिक संधू और हरबख्श ही हैं।’ नारायणन ने बताया। संजीव कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला, ‘अब्दुल के नौकर को संभालकर रखना। जरा भी भनक लगी, तो खान उसे खत्म कर देगा। हमारा लिंक टूट जाएगा।’ नारायणन बोला, ‘मैं समझ गया सर। रिपोर्ट भेज रहा हूं।’ फोन कटने के बाद संजीव के दिमाग में एक नाम घूमने लगा- ‘सोफी।’ नीली आंखें, गोल फ्रेम वाला चश्मा और कंधे तक लंबे बाल। सोफी RAW की एक बेहद चतुर एसेट थी। संजीव को उससे मिले दो महीने बीत चुके थे। ‘तुम तो मेरा दिल जानती ही हो। मैंने तुम्हें माफ किया’ अप्रैल 1985 के अंत में संजीव का फोन बजा। ‘हाय सोफी! कहां गायब थी तुम? जिंदा भी हो या नहीं?’ संजीव ने पूछा। दूसरी तरफ से सोफी की हल्की हंसी गूंजी, ‘तुम्हें नाराज होने का पूरा हक है, लेकिन मेरे पास तुम्हें देने के लिए एक खास तोहफा है।’ ‘मैं कब आऊं?’ ‘इसी वीकेंड। वियना में।’ ‘ठीक है।’ ‘मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी।’ संजीव ने कहा, ‘तुम तो मेरा दिल जानती ही हो। मैंने तुम्हें माफ किया।’ सोफी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘आते वक्त अपना दिमाग भी साथ लाना, मिस्टर संजीव।’ उसी वीकेंड संजीव वियना पहुंचा। एक शांत कैफे में सोफी उसका इंतजार कर रही थी। कई शहरों में खाक छानने के बाद उसने आखिरकार हरप्रीत आहूजा को ढूंढ निकाला था। सोफी ने बताना शुरू किया, ‘जब मैंने उसे पहली बार देखा तो यकीन नहीं हुआ। जो आदमी कभी कैलिफोर्निया में बड़ी-बड़ी बातें करता था, वह वियना के एक मामूली होटल में बर्तन साफ कर रहा था।’ ‘फिर क्या हुआ?’ ‘मैंने उससे दोस्ती की और कहा कि एक भारतीय कारोबारी उसकी मदद कर सकता है।’ संजीव ने हैरान होकर पूछा, ‘अरे, ऐसा कौन भारतीय कारोबारी है?’ सोफी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसकी आंखों में देखते हुए कहा, ‘तुम… मिस्टर संजीव जिंदल, तुम ही वो कारोबारी बनोगे। अब आगे का खेल तुम्हें संभालना है।’ संजीव मुस्कुराया, ‘ये हुई ना बात। किसी भी कीमत पर मैं उसे हाथ से निकलने नहीं दूंगा।’ दरअसल, आहूजा ऑस्ट्रिया आने से पहले कैलिफोर्निया में अवतार सेठी नाम के एक अमीर भारतीय कारोबारी के साथ काम करता था। सेठी पर RAW की कड़ी नजर थी, क्योंकि वह संधू के नेटवर्क को फंड दे रहा था। किसी बात पर आहूजा और सेठी के बीच अनबन हो गई और आहूजा भागकर यूरोप आ गया। RAW को लगा कि आहूजा, सेठी के पूरे काले साम्राज्य को बेनकाब करने का जरिया बन सकता है। अगली सुबह दोनों ट्रेन में थे। सोफी ने आहूजा को समझा दिया था। वह संजीव से उसे मिलवाने वाली थी। अगली शाम वियना के उसी कैफे में तीनों मिले। संजीव ने पूछा, ‘तुम कैलिफोर्निया छोड़कर यहां पाई-पाई के लिए क्यों भटक रहे हो?’ आहूजा ने बताया, ‘सेठी के बंगले पर होने वाली बैठकें मुझसे बर्दाश्त नहीं हुईं। वह संधू और ISI के साथ मिलकर भारत के खिलाफ साजिशें रचता है। मैं उसका हिस्सा नहीं बनना चाहता था।’ संजीव ने एक के बाद एक सवाल पूछे और आहूजा परत-दर-परत खुलता चला गया। तभी संजीव ने अपनी चाल चली। उसने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘मुझसे क्या चाहते हो?’ आहूजा ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘कुछ पैसों की मदद… ताकि मैं नई जिंदगी शुरू कर सकूं।’ संजीव हंसा, ‘मैं कोई बिजनेसमैन नहीं हूं आहूजा। मैं RAW के लिए काम करता हूं।’ आहूजा के चेहरे का रंग उड़ गया। वह घबराकर भागने के लिए उठा, तभी सोफी ने उसका हाथ थाम लिया, ‘घबराओ नहीं आहूजा। तुम बिल्कुल सुरक्षित हो। बस सच का साथ दो।’ घंटों चली बातचीत के बाद आहूजा RAW का मुखबिर बनने को तैयार हो गया। उसका कोडनेम रखा गया- ‘इनसाइडर’। तय हुआ कि आहूजा दोबारा सेठी से संपर्क साधेगा और माफी मांगकर काम पर लौटेगा। सोफी उसकी मेन हैंडलर बनी। दोनों के बीच कोई सीधा संपर्क नहीं होना था; सारी जानकारी ‘डेड ड्रॉप’ के जरिए दी जानी थी। जासूसी की दुनिया में डेड ड्रॉप का मतलब होता है- एक एजेंट किसी डॉक्युमेंट को किसी सुरक्षित जगह रखता है और दूसरा एजेंट वहां से उठा लेता है, यानी बिना मिले काम हो जाता है। संजीव और सोफी ने आहूजा को डेड ड्रॉप के सारे तौर-तरीके समझा दिए। कुछ दिन ऑस्ट्रिया में सोफी के साथ गुजारने के बाद संजीव वापस पेरिस लौट आया। पीएम राजीव गांधी से समझौता, अगले महीने संत लोंगोवाल की हत्या जून 1985 में लंदन से नारायणन का मैसेज आया- ‘पाकिस्तानी दूतावास में तैनात एक ISI अफसर, हरबख्श और संधू को सीधे पैसे पहुंचा रहा है।’ RAW ने बिना देर किए हरबख्श और ISI अफसर की बैठकों और पैसों के लेन-देन की एक मजबूत फाइल तैयार की। यह सबूत ब्रिटिश गृह सचिव लियोन ब्रिटन को सौंपे गए। साथ ही दिल्ली में अमेरिकी, कनाडाई और ब्रिटिश राजनयिकों को भी इसकी कॉपियां दी गईं। संजीव को लगा कि अब हरबख्श काम तमाम, लेकिन तभी एक बड़ा झटका लगा। इससे पहले कि ब्रिटिश पुलिस उसे दबोचती, हरबख्श लंदन से गायब हो गया। संजीव ने तुरंत रावलपिंडी के अपने सोर्स को एक्टिव किया। दो दिन बाद खबर आई-‘हरबख्श परिवार के साथ इस्लामाबाद पहुंच चुका है। अपने साथ ISI के एक बेहद गुप्त प्लान की फाइल भी ले गया है।’ तभी संजीव को सोफी का एक डायलॉग याद आया- ‘शिकार हाथ से निकला है, खेल तो अभी बचा है। और इस खेल के उस्ताद तुम हो मिस्टर संजीव।’ संजीव समझ गया कि सरहद पार से कोई बहुत बड़ा धमाका होने वाला है… और वही हुआ। जुलाई 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच शांति समझौता हुआ, लेकिन अगले ही महीने संत लोंगोवाल की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई। पंजाब में हिंसा भड़क गई, जिसके पीछे ISI का हाथ साफ दिख रहा था। सेठी की नजर सोफी की खूबसूरती पर थी, और सोफी की नजर उसकी फाइलों पर अगस्त 1985 में संजीव दिल्ली पहुंचा और RAW के सीनियर अफसर अनुज भारद्वाज से मिला। दो रणनीतियां तय की गईं: अब्दुल खान और संधू का खात्मा। अवतार सेठी पर शिकंजा कसकर उसे भारत के पाले में लाना। ‘लेकिन सेठी को बेनकाब कौन करेगा?’ भारद्वाज ने पूछा। संजीव ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मेरी एजेंट सोफी।’ अक्टूबर 1985 में सोफी और आहूजा प्रेमी-प्रेमिका बनकर अमेरिका पहुंचे। आहूजा ने सेठी से माफी मांगी और दोबारा उसके पास नौकरी करने लगा। सेठी की नजर सोफी की खूबसूरती पर थी। सोफी ने इसी का फायदा उठाकर उसके दफ्तर और घर तक अपनी पहुंच बना ली। फरवरी 1986 तक सोफी और आहूजा ने सेठी के बैंक खातों, ISI बैठकों और हथियारों की सप्लाई से जुड़े सारे दस्तावेज हासिल कर लिए। काम पूरा होते ही वे वापस पेरिस लौट आए। अब असली दांव खेलने की बारी थी… अमेरिका में सेठी अपने दफ्तर में बैठा था, तभी भारतीय दूतावास का एक अफसर उसके केबिन में दाखिल हुआ। ‘मिस्टर सेठी, ISI की अगली हथियारों की खेप कब आ रही है?’ सेठी गुस्से में खड़ा हुआ, ‘क्या बकवास है!’ अफसर ने टेबल पर बैंक ट्रांसफर्स, फर्जी खातों और संधू के साथ उसकी तस्वीरों की भारी-भरकम फाइल पटक दी। सेठी का चेहरा पीला पड़ गया, ‘यह… यह सब झूठ है।’ ‘अगर यह फाइल अमेरिकी एजेंसी FBI को दे दी गई, तो तुम अपनी पूरी जिंदगी जेल में सड़ोगे,’ अफसर ने कहा। सेठी टूट गया। उसे अमेरिका के एक सेफ हाउस में ले जाया गया, जहां नारायणन ने उससे 6 घंटे तक पूछताछ की। इसके बाद उसे पेरिस लाया गया, जहां अनुज भारद्वाज और संजीव ने तीन दिनों तक उसका पूरा नेटवर्क खंगाला। सेठी ने उगल दिया, ‘लंदन में पाकिस्तानी दूतावास के भीतर 6 अफसर ISI सेल चला रहे हैं। पूरे यूरोप से फंड जुटाकर पंजाब में चरमपंथियों तक पहुंचाते हैं।’ उसने भारत में मौजूद 18 नए चरमपंथियों की लिस्ट भी दे दी। RAW और पंजाब पुलिस ने एक सीक्रेट ऑपरेशन चलाया। उस लिस्ट के आधार पर 9 खालिस्तानी चरमपंथी मुठभेड़ में मारे गए और 9 को गिरफ्तार कर लिया गया। जुलाई 1986 में सेठी ने RAW को एक ऑडियो टेप भी लाकर दिया, जिसमें अब्दुल खान और संधू भारत में बड़े धमाकों की योजना बना रहे थे। RAW ने यह टेप ब्रिटिश इंटेलिजेंस के सामने रख दिया। अगस्त 1986 तक ब्रिटेन सरकार ने एक्शन लेते हुए कई पाकिस्तानी अधिकारियों को देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया। कई पाकिस्तानी अफसर लंदन छोड़कर चले गए, लेकिन भारत विरोधी साजिशें जारी रखीं। तभी सितंबर 1986 में एक नया मोड़ आया। लंदन में नारायणन को एक कॉल आई। ‘मेरे पास संधू और उसके नेटवर्क का वो सच है, जो तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा। मैं RAW के बड़े अफसर से बात करूंगा और मुझे इसकी कीमत चाहिए।’ कॉल करने वाले का नाम था- बलवंत। RAW के रिकॉर्ड्स से पता चला कि बलवंत भारत का एक वॉन्टेड अपराधी था, जो ब्रिटेन भाग गया था। अनुज भारद्वाज और संजीव तुरंत उससे मिलने पेरिस पहुंचे। तीन दिनों की पूछताछ में भारद्वाज समझ गए कि बलवंत अब इस खूनी खेल से थक चुका है और अपने परिवार के पास पंजाब लौटना चाहता है। संजीव ने सीधे कहा, ‘घर लौटने का रास्ता सबूतों से होकर जाता है बलवंत।’ बलवंत ने कहा, ‘संधू लंदन में बैठकर ऐश कर रहा है और पंजाब के निर्दोष लड़कों को मरने के लिए भेज रहा है। अब्दुल खान अगले महीने नए लड़कों की भर्ती के लिए यूरोप आ रहा है। मुझे माफ कर दो, मैं तुम्हें सारे सबूत दूंगा।’ बलवंत के दिए सबूतों के आधार पर ब्रिटिश पुलिस ने लंदन में छापा मारकर संधू और उसके 5 मुख्य सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया। ‘गो अहेड एंड किल द बास्टर्ड’… जनवरी 1987 में संधू की गिरफ्तारी से बौखलाया अब्दुल खान नया नेटवर्क बनाने में जुट गया। इधर, संजीव एक बार फिर लंदन पहुंचा और अपने सबसे पुराने सोर्स- अब्दुल खान के माली ‘तारिक’ से मिला। ‘क्या खान पाकिस्तान भागने की फिराक में है?’ संजीव ने पूछा। तारिक ने धीरे से कहा, ‘हां साहब। जैसे ही तारीख तय होगी, मैं खबर भेज दूंगा।’ मई 1987 के पहले हफ्ते में तारिक का अर्जेंट मैसेज आया- ‘अब्दुल खान अगले महीने लाहौर जा रहा है। वह ISI के नए चीफ लेफ्टिनेंट जनरल हमीद गुल से मिलने वाला है।’ संजीव दिल्ली लौट आया। उसने भारद्वाज से कहा, ‘अब्दुल खान पाकिस्तान जाने वाला है। हम घर में घुसकर मारेंगे।’ भारद्वाज ने झुंझलाकर कहा- ‘बिल्कुल नहीं। हम अपने एजेंटों की जान पर जोखिम नहीं ले सकते।’ संजीव चुप रहा।… कुछ पल बाद भारद्वाज ने गहरी सांस लेते हुए कहा- ‘इसके लिए RAW चीफ से लिखित मंजूरी भी लेनी होगी।’ संजीव चुपचाप उठकर वहां से चला गया। भारद्वाज भी गुस्से में दूसरे कमरे में चले गए। कुछ देर बाद… संजीव फिर से अनुज भारद्वाज से मिला और पूरी बात बताई। भारद्वाज ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘गो अहेड एंड किल द बास्टर्ड।’ आखिरकार घर में घुसकर बदला ले ही लिया बात है जून 1987 की। उस दिन लाहौर में चमड़ी झुलसा देने वाली तेज धूप थी। घड़ी में दोपहर के 12 बज रहे थे। शहर के बीचों-बीच मेन रोड पर एक टैक्सी आकर रुकी। कोट पहने 40-45 साल का एक शख्स बाहर निकला। हाथ में चमड़े का बैग। वह रुमाल से पसीना पोछ रहा था। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखें पूरी तरह सतर्क। वह बार-बार मुड़कर चारों तरफ देख रहा था। वह तेजी से एक संकरी गली में मुड़ गया। कुछ ही मिनटों में एक हवेलीनुमा घर के सामने खड़ा था। दरवाजे पर ताला लटका था। उसने जेब से चाबी निकाली और बुदबुदाया- ‘गुल साहब से मिलने से पहले थोड़ा आराम कर लेता हूं।’ तभी एक मोटरसाइकिल गली में दाखिल हुई। उस पर दो लोग सवार थे। चेहरे काले कपड़ों से ढके हुए। बाइक हवेली के सामने आकर रुकी। पीछे बैठे शख्स ने पिस्टल निकाली और ट्रिगर दबा दिया। गोली दरवाजा खोल रहे शख्स की खोपड़ी को पार कर गई। वह गिर पड़ा। दरवाजा मांस के छोटे-छोटे टुकड़े और खून से लाल हो गया। तभी दूसरे हमलावर ने भी पिस्टल निकालकर गिरे हुए शख्स को एक के बाद एक 8 गोलियां मारीं। मरने वाले शख्स का नाम था-अब्दुल खान। और गोलियां चलाने वाले भारत की खुफिया एजेंसी RAW के दो अंडरकवर एजेंट थे। इससे पहले कि आसपास के लोग कुछ समझ पाते, मोटरसाइकिल की रेस गूंजी और दोनों अंडरकवर एजेंट लाहौर की संकरी गलियों में ओझल हो गए। इस तरह RAW के गुमनाम जासूसों ने भारत के खिलाफ रची गई एक और बड़ी साजिश का हिसाब बराबर कर दिया था। ऑपरेशन हॉरनेट की पहली कड़ी भी पढ़िए : इंदिरा की हत्या, 3 दिन बाद शुरू हुआ खतरनाक मिशन:घर में घुसकर पाकिस्तानी एजेंट को 9 गोलियां मारीं; विदेशी लेडी बनी भारतीय जासूस, पार्ट-1 रेफरेंस :
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प्रेमी-प्रेमिका बनकर लाहौर पहुंचे, ISI एजेंट को 9 गोलियां मारीं:भारतीय जासूसों ने कैसे लिया खालिस्तानियों से बदला; ऑपरेशन हॉरनेट पार्ट-2
