बिहार में डॉक्टर्स की फेक रिसर्च इंडस्ट्री चल रही है। यहां प्रोफेसर मेडिकल स्टूडेंट के लिए MD, DM, MS, Mch और DNB की डिग्री के लिए फर्जी रिसर्च तैयार करवा रहे हैं।
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देश के 12 से ज्यादा राज्यों के मेडिकल कॉलेजों की फेक रिसर्च बिहार के अलग-अलग जिलों में तैयार हो रही है। यानी मेडिकल स्टूडेंट रिसर्च किए बिना ही MD की डिग्री हासिल कर ले रहे हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा भास्कर की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग टीम ने किया है।
अंडर कवर रिपोर्टर्स मेडिकल स्टूडेंट्स बनकर 50 से अधिक ऐसे एजेंट्स और प्रोफेसर्स से मिले जिसमें 12 लोगों ने 50 या 100 मरीजों पर फर्जी रिसर्च और थीसिस देने का दावा कर दिया।
दावा ये भी है कि देश के 12 से अधिक राज्यों के मेडिकल कॉलेजों से मेडिकल स्टूडेंट्स की डिमांड बिहार में पूरी हो रही है।
भास्कर इन्वेस्टिगेशन में पढ़िए और देखिए डॉक्टर की सबसे बड़ी डिग्री के लिए कैसे हो रही फर्जी रिसर्च..।

भास्कर इन्वेस्टिगेशन टीम को इनपुट मिला कि बिहार में देश के 12 से अधिक राज्यों के मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए फर्जी रिसर्च बेची जा रही है। डॉक्टर और प्रोफेसर से लेकर एजेंट्स से कड़ी जोड़ते हुए रिपोटर्स ने पूरे नेटवर्क को खंगाला।
अंडर कवर रिपोर्टर्स की फर्जी रिसर्च पेपर्स बेचने वाले और इस नेटवर्क में शामिल लगभग 50 लोगों से डील हुई। इसमें 5 एजेंट्स, 2 प्रोफेसर ने बड़ा राज खोला।
पटना के अशोक राजपथ के रमना पथ से ऐसे कई एजेंट्स का इनपुट मिला। अंडरकवर रिपोटर्स की पहली डील एजेंट आदिल से हुई।
रिपोर्टर – मुझे MD की थीसिस लिखवानी है। आदिल- किस कॉलेज की है और टॉपिक क्या है?
रिपोर्टर- रिम्स, रांची की है फॉरेंसिक मेडिसिन डिपार्टमेंट का अन आईडेंटिफाई डेड बॉडी DNA टॉपिक है। आदिल- ठीक है, काम हो जाएगा।
रिपोर्टर- कितने पैसे लगेंगे? आदिल- MD की एक थीसिस के 50 हजार रुपए लगेंगे। सिनॉप्सिस दे दीजिए और कुछ पैसे एडवांस दे दीजिए हो जाएगा।
रिपोर्टर- सिनॉप्सिस भी आपको ही लिखना है। आदिल- उसके लिए अलग से 5 हजार रुपए लगेंगे।
रिपोर्टर- यह थीसिस कौन लिखेगा ? आदिल- इसको मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर लिखते हैं। उनके पास पूरी टीम है। वह बड़े पैमाने पर यही काम करते हैं।
रिपोर्टर- क्या आप मुझे प्रोफेसर से मिला देंगे? आदिल- वह लोग किसी से मिलते नहीं, पूरा काम हम ही देखते हैं, डील भी हम ही करते हैं।
रिपोर्टर- आपका क्या रोल रहता है? आदिल- मैं ही लोगों से डील करता हूं, हम एक टीम की तरह काम करते हैं।
रिपोर्टर – और कौन है आपकी टीम में? आदिल – प्रोफेसर लिखने का काम करते हैं, बाकी रिसर्च और डेटा का काम करते हैं। मैं टाइपिंग और बाइडिंग करता हूं।
रिपोर्टर- आपके पास किस कॉलेज के प्रोफेसर हैं? आदिल- दर्जनों कॉलेज के प्रोफेसर हैं, हर सब्जेक्ट के एक्सपर्ट हैं। जैसी जरूरत वैसा काम देते हैं।
रिपोर्टर- मेरी थीसिस किससे लिखवाएंगे? आदिल- सासाराम में मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर से लिखवाएंगे।
रिपोर्टर- आपके पास कहां-कहां के लोग थीसिस लिखवाने के लिए आते हैं? आदिल- बिहार, झारखंड, यूपी, हिमाचल, एमपी, नेपाल, उत्तराखंड, असम, बंगाल से लेकर कई राज्य के लोग आते हैं।
रिपोर्टर – ऑनलाइन भी ऑर्डर मिलता है क्या? आदिल – कई राज्यों से ऑनलाइन ही काम आता है, यहां से पेपर कुरियर हो जाता है।
रिपोर्टर- आपके पास बिहार के किस-किस मेडिकल कॉलेज से स्टूडेंट आते हैं थीसिस लिखवाने के लिए? आदिल- सारे मेडिकल कॉलेज के आते हैं, PMCH के तो कितने स्टूडेंट्स ऐसे ही MD करके डॉक्टर बन गए हैं।

एजेंट आदिल से हमें कई प्रोफेसर का इनपुट मिल चुका था। हम एजेंट्स से आगे उस प्रोफेसर तक पहुंचना चाहते थे जो इस नेटवर्क के बड़े खिलाड़ी हैं। 10 बार की मीटिंग के बाद आदिल प्रोफेसर तक पहुंचाने के लिए तैयार हो गया।
पहले आदिल ने प्रोफेसर से फोन पर बात की, लेकिन वह किसी भी बाहरी व्यक्ति या स्टूडेंट्स से मिलने को राजी नहीं हुआ। रिपोटर्स के दबाव के बाद आदिल ने भी प्रोफेसर को पैसे का लालच दिया तो वह राजी हो गया।
रिपोर्टर – मुझे MD की थीसिस लिखवानी है। सज्जाद जहीर- हो जाएगा, टॉपिक और सिनॉप्सिस मुझे दे दीजिए।
रिपोर्टर- सिनॉप्सिस भी नहीं है, मैं टॉपिक दे देता हूं, आपको सिनॉप्सिस और थीसिस दोनों लिखना है। सज्जाद जहीर – ठीक है, आप मुझे टॉपिक दे दीजिए।
रिपोर्टर- सिनॉप्सिस और थीसिस जमा करने का प्रोसेस क्या है? मुझे इसका पूरा प्रोसेस बताइए। सज्जाद जहीर- MBBS के बाद MD और MS की पढ़ाई होती है।
प्रोफेसर बोला- रिसर्च की पढ़ाई में रिसर्च ही फेक होती है
प्रोफेसर सज्जाद ने बताया कि यह एक शोध की पढ़ाई है। इसके लिए पहले सिनॉप्सिस जमा होता है। इसके बाद 6-7 महीने का गैप होता है। इस बीच आपको चैप्टर वाइज थीसिस देनी होती है। एक-एक चैप्टर कर सारा अप्रूव हो जाएगा। फिर फाइनल पब्लिकेशन होगा।
आपको प्लेगरिज्म टेस्ट के साथ थीसिस लिखकर दे देंगे। थीसिस मैं खुद लिखता हूं, इसके अलावा मेरे पास पूरी टीम है जो रिसर्च और डेटा जुटाने का काम करती है।
जैसे किसी हॉस्पिटल में जाकर किसी बीमार व्यक्ति का नाम, उसका पता, उसकी बीमारी के बारे में डिटेल्स इकट्ठा करना होता है। हम दिखाएंगे कि हमने 100 पेशेंट पर रिसर्च किया है।

प्रोफेसर सज्जाद ने दावा किया कि उनकी थीसिस को कॉलेज का कोई सॉफ्टवेयर नहीं पकड़ पाएगा।
प्रोफेसर का दावा- पूरा डेटा का खेल है
पूरा खेल डेटा का है। किसी बीमार व्यक्ति की जरूरत नहीं है। हम डेटा से दिखा देंगे कि किसी व्यक्ति को दवा दे रहे हैं। कितने mg की दवा कितने दिन में कितना असर किया। उसके बाद हाइपोथेसिस फ्रेम करेंगे कि जो दवाई दी है वह दवाई असर कर रही है या नहीं।
असर किया तो कितना असर किया। यह ऐसा नहीं होता है कि हम डेड बॉडी लेकर उसपर कोई रिसर्च कर रहे हैं। यह एक सर्वे टाइप होता है। दिखाया जाता है कि हम किसी हॉस्पिटल में जाकर डेली 50 मरीजों पर रिचर्स कर रहे हैं।
हमने किसी मरीज को केमिकल दिया तो उसका असर क्या हुआ। वहीं दूसरे व्यक्ति ने ठीक उसी बीमारी के लिए केमिकल दिया तो उसका असर क्या हुआ।
इसका एक डेटा बनाकर लिखेंगे और दिखाएंगे कि दूसरे ने जो दवाई दी उसका असर कुछ नहीं था और मैंने जो केमिकल दिया उसका असर 50% से ज्यादा रहा।
रिपोर्टर ने सवाल किया कि इसका मतलब यह एक बीमारी पर रिसर्च है? प्रोफेसर सज्जाद जहीर बोले- हां, जैसे कोई डायबिटीज का पेशेंट है, उसको दवा दी। दवाई देने के बाद उसके ऊपर क्या असर हुआ।
उसे चक्कर आया, उसको डिहाइड्रेशन होने लगा, हार्ट अटैक की समस्या आने लगी, या उसकी बीमारी ठीक हो गई। डिस्कशन में लिखना होता है कि पहले 50 लोगों ने इस बीमारी पर रिसर्च की और अलग-अलग दवा दी, उसका असर क्या था और हमने दवा दी तो उसका असर क्या हुआ।
जिसमें दिखाया जाता है कि अब तक 50 लोगों ने डायबिटीज की बीमारी पर एक्सपेरिमेंट किया है, लेकिन उनका सक्सेस रेट 10-15 फीसदी है, लेकिन हमने जो एक्सपेरिमेंट किया है उसमें सक्सेस रेट 50 फीसदी से ज्यादा है।
मेरे एक्सपेरिमेंट से बीमारी ठीक हो गई। रिपोर्टर ने सवाल किया कि ऐसा तो नहीं है कि कॉलेज के प्रोफेसर सामने प्रैक्टिकल करने के लिए कहेंगे? प्रोफेसर सज्जाद जहीर ने दावा किया कि ऐसा कुछ नहीं होता है।
प्रोफेसर वायवा में पूछेगे, तो जो थीसिस लिखकर दिया है उसको एक बार कैंडिडेट पढ़ लेगा। फिर उसी से प्रोफेसर सवाल पूछते हैं। वायवा में बता देगा कि बाकी लोगों ने प्रैक्टिकल किया तो उनका सक्सेस रेट 5% था लेकिन मेरा 50% कामयाब है। हम अपनी फाइंडिंग ज्यादा दिखाएंगे।
रिपोर्टर- कितने पैसे लेते हैं? सज्जाद जहीर- हम लोग 40-50 हजार लेते हैं। पहले तो MD के लिए 1 लाख रुपए लेते थे।
रिपोर्टर- आप लिखकर देंगे, इसमें कोई दिक्कत तो नहीं है न? ऐसा तो नहीं है न कि कहीं पकड़ा जाए। सज्जाद जहीर- कोई दिक्कत नहीं है, 100 प्रतिशत श्योरिटी है मेरी।
रिपोर्टर- ऐसा तो नहीं है न कि यह काम इलीगल है? सज्जाद जहीर- नहीं, इलीगल कैसे है? वहां चेक होगा न। कॉलेज में कोई ऐसी मशीन तो है नहीं कि वह चेक करके बता दे कि यह कॉपी कैंडिडेट ने खुद लिखी या किसी दूसरे ने लिखा है।
रिपोर्टर- आप MS की भी थीसिस लिखते हैं क्या? सज्जाद जहीर- हां,वह भी लिख देंगे।
रिपोर्टर- MS में क्या होता है? सज्जाद जहीर- MD मेडिसिन में रिसर्च होता है ठीक वैसे ही MS सर्जरी की रिसर्च होती है।
रिपोर्टर- इसमें क्या फाइंडिंग दिखानी होती है? सज्जाद जहीर- इसमें दिखाते हैं कि बाकी लोगों ने जो सर्जरी की उनका सक्सेस रेट कितना है, और हमने जो सर्जरी की उसका सक्सेस रेट बाकी लोगों से ज्यादा है।
रिपोर्टर- इसके लिए तो मरीज चाहिए न? सज्जाद जहीर- मेरे पास टीम है, वही टीम डेटा का पूरा काम कर देती है।
रिपोर्टर- सर, इन सब काम के लिए तो मरीज चाहिए ही। सज्जाद जहीर- हम लोग सब सेट कर देते हैं। कोई नहीं पकड़ पाएगा कि किसने लिखा है। हम ऐसा लिखते हैं कि किसी भी प्लेगरिज्म टेस्ट में नहीं पकड़ा जाएगा।
रिपोर्टर- सर आप कहां पोस्टेड हैं? सज्जाद जहीर- सासाराम मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हैं अभी।
रिपोर्टर- आपके पास कहां-कहां के लड़के आते हैं थीसिस लिखवाने के लिए? PMCH के भी स्टूडेंट होंगे। सज्जाद जहीर- मेरे पास पूरे बिहार, झारखंड, यूपी सहित 10 से 12 राज्यों के लड़के आते हैं।
रिपोर्टर- लेकिन यह तो गलत है न कि बिना कोई रिसर्च के पैसे के बल पर दूसरे से थीसिस लिखवा लेना। सज्जाद जहीर- हां, यह तो है, लेकिन जो भी MD के स्टूडेंट होते हैं वह MBBS के बाद अपनी प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। वह लोग बताते हैं कि उनके पास समय नहीं होता है। इसलिए हमारे जैसे लोगों से लिखवा लेते हैं।
रिपोर्टर- आपके पास जो टीम है हमें उनसे एक बार मिलवा दीजिए, ताकि हमें विश्वास हो जाए। सज्जाद जहीर- आप मुझसे मिल लिए, आपका सब काम हो जाएगा। हम लोग किसी से नहीं मिलते हैं।

आदिल और प्रोफेसर से डील के बाद यह क्लीयर हो गया कि इस पूरे इलाके में MD-MS की थीसिस फर्जी रिसर्च और डेटा बनाकर बेचा जा रहा है। इस काम को प्रोफेसर कर रहे हैं। रिपोर्टर ‘S2M फोटो कॉपी’ की दुकान पर पहुंचे। वहां नीतीश नाम का एक एजेंट मिला।
रिपोर्टर ने MD की थीसिस लिखवाने की बात कही तो नीतीश ने बताया कि रमना रोड में स्वीटी कुमारी का साइबर कैफे चलता है, जहां थीसिस लिखने का काम हो जाएगा। वह खुद पटना कॉलेज की पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर हैं। अंडर कवर रिपोर्टर से स्वीटी की डील हुई।
रिपोर्टर- MD की सिनॉप्सिस और थीसिस लिखवानी है। स्वीटी कुमारी – डिपार्टमेंट और टॉपिक क्या है?
रिपोर्टर- फॉरेंसिक मेडिसिन डिपार्टमेंट का अन आईडेंटिफाई डेड बॉडी DNA टॉपिक है। स्वीटी कुमारी- आपके पास गाइडलाइन है?
रिपोर्टर- हां है। स्वीटी कुमारी- आप गाइडलाइन दीजिए। हम उसको स्कॉलर के पास भेजेंगे। जब स्कॉलर उस टॉपिक को अपने तरफ से हामी भर देगा तो फिर आपको पैसे बता देंगे।
रिपोर्टर- एक अंदाजा बता दीजिए कि कितना लगेगा? स्वीटी कुमारी- हर व्यक्ति का अलग-अलग रहता है। किसी का 30 पेज का रहता है तो किसी का 70 पेज का। यह सब कुछ गाइडलाइन में लिखा होता है।
रिपोर्टर- दूसरे से लिखवाएंगे तो कोई दिक्कत तो नहीं न होगी? स्वीटी कुमारी- नहीं, हम देंगे तो प्लेगरिज्म टेस्ट के साथ देंगे। जिस सॉफ्टवेयर से कॉलेज में चेक होता है, उसी सॉफ्टवेयर से चेक कर आपको देंगे।
रिपोर्टर- आप किस कॉलेज में हैं और किस डिपार्टमेंट में हैं? स्वीटी कुमारी- मैं पटना कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर हूं।
रिपोर्टर- आपके पास कहां-कहां से लोग आते हैं लिखवाने के लिए? स्वीटी कुमारी- पूरे बिहार और बिहार के बाहर के भी मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट लिखवाने के लिए आते हैं।
रिपोर्टर- आप खुद भी लिखती हैं? स्वीटी कुमारी- हां, पॉलिटिकल साइंस का मैं लिखती हूं।

आदिल, प्रोफेसर और स्वीटी से डील में यह पता चल गया कि बिहार से पूरे देश में यह खेल चल रहा है। पटना के रमना रोड, अशोक राजपथ, एनी बेसेंट राेड से लेकर कई इलाकों में MD-MS की थीसिस फर्जी रिसर्च और डेटा बनाकर बेचा जा रहा है।
देश के अधिकतर डॉक्टर यहां से थीसिस लिखवा रहे हैं। रिपोर्टर एनी बेसेंट रोड में आरव डिजिटल साइबर कैफे के संचालक अमित सिन्हा का इनपुट मिला।
अंडर कवर रिपोर्टर जब वहां पहुंचे तो अमित ने दावा किया कि पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के प्रोफेसर उसका काम करते हैं।
रिपोर्टर- MD की थीसिस लिखवानी है। अमित सिन्हा- हो जाएगा। किस डिपार्टमेंट की है और टॉपिक क्या है?
रिपोर्टर- फॉरेंसिक मेडिसिन डिपार्टमेंट का अन आईडेंटिफाई डेड बॉडी NDA टॉपिक है। अमित सिन्हा- कॉलेज कौन सा है?
रिपोर्टर- रिम्स रांची, MD कर रहे हैं। अमित सिन्हा- दे दीजिए, हो जाएगा।
रिपोर्टर- कैसे-कैसे क्या करना होगा? पूरी प्रोसेस बता दीजिए और कौन लिखेगा? अमित सिन्हा- मेरे पास हर सब्जेक्ट के एक्सपर्ट हैं। सारे किसी न किसी मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर हैं। हमारे पास पूरी टीम है।
रिपोर्टर- कोई दिक्कत नहीं होगा न? अमित सिन्हा- आप काम कराइए, 100% सही काम करके देंगे।
रिपोर्टर- सिनॉप्सिस और थीसिस के लिए कितने पैसे लेंगे? अमित सिन्हा- सिनॉप्सिस के 10 हजार रुपए लगेंगे और थीसिस का 60 हजार रुपए देना होगा।
रिपोर्टर- क्या हम उस टीम और प्रोफेसर से मिल सकते हैं? अमित सिन्हा- नहीं, वो लोग किसी से मिलते नहीं है, जो भी डील होती है हम ही करते हैं। हम लोग भागने वाले नहीं हैं क्योंकि यह मेरी दुकान है, जो भी काम होता है, यहीं से होता है।
रिपोर्टर- पहले भी हम पैसे देकर फंस चुके हैं। इसलिए विश्वास के लिए एक बार आप मिलवा देते तो अच्छा रहता। अमित सिन्हा- ठीक है मिलवा देंगे, उसके लिए हम एक बार प्रोफेसर से बात कर लेते हैं।
रिपोर्टर- आप जिस प्रोफेसर से मिलवाएंगे, वह किस कॉलेज के प्रोफेसर हैं? अमित सिन्हा- PMCH के एनेस्थीसिया डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉक्टर कुणाल हैं।
रिपोर्टर- तो क्या, PMCH के ही सारे प्रोफेसर हैं? अमित सिन्हा- प्रोफेसर PMCH के हैं, बाकी उन लोगों के पास पूरी टीम है।

कड़ी से कड़ी जोड़ने के बाद एजेंट संजय का इनपुट मिला। संजय बुक स्टॉल चलाता है, लेकिन वह इस धंधे में काफी दिनों से लगा है। सेटिंग कर फर्जी रिसर्च बेचने का धंधा काफी पुराना है।
रिपोर्टर मेडिकल स्टूडेंट बनकर जब अशोक राजपथ स्थित रिया बुक सेंटर पहुंचा। वहां दुकान के संचालक संजय ने प्रोफेसर से फर्जी रिसर्च पेपर लिखवाने का दावा किया।
रिपोर्टर- हमें MD के लिए रिसर्च पेपर चाहिए। संजय- लिखा जाएगा, किस कॉलेज का है और क्या टॉपिक है?
रिपोर्टर- रिम्स कॉलेज का है, फॉरेंसिक मेडिसिन में कर रहे हैं। संजय- हो जाएगा।
रिपोर्टर- आप लोग खुद लिखते हैं या कोई और लिखेगा? संजय- इसके लिए अलग लोग हैं, हम उनको टॉपिक दे देते हैं वही लोग लिख कर देते हैं।
रिपोर्टर- जो लोग लिखते हैं, वह कौन है? कोई आम आदमी है या किसी मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर से लिखवाएंगे? संजय- अलग-अलग मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर होते हैं, उनकी पूरी टीम है। वह लिखने और रिसर्च करने का पूरा काम करती है।

एजेंट संजय ने दावा किया कि उसके पास अलग-अलग मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर्स की पूरी टीम है।
अब 5 पॉइंट में जानिए क्या हैं नियम
मेडिकल एजुकेशन के यूनिवर्सिटी के नियमों के तहत MD (मास्टर ऑफ मेडिसिन) और MS (मास्टर ऑफ सर्जरी) में थीसिस तैयार करने, जमा करने और कॉलेज और यूनिवर्सिटी लेवल पर अप्रूवल कराने की पूरी प्रोसेस 5 स्टेप में पूरी होती है।
- 1. टॉपिक सिलेक्शन और गाइड: पीजी में एडमिशन लेने के बाद विभाग द्वारा छात्र को एक मुख्य गाइड के तौर पर प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर दिए जाते हैं। टॉपिक का सिलेक्शन छात्र और गाइड मिलकर करते हैं जो नया हो और जिसकी केस स्टडीज अस्पताल में की जी सके।
- 2. सिनॉप्सिस तैयार करना और एथिकल क्लीयरेंस : थीसिस शुरू करने से पहले उसका सिनॉप्सिस तैयार किया जाता है। मरीजों पर आधारित किसी भी शोध के लिए अस्पताल या कॉलेज की एथिक्स कमेटी से अनुमति लेनी होती है। कमेटी यह जांचती है कि शोध से मरीज को कोई नुकसान तो नहीं होगा। एथिकल क्लीयरेंस मिलने के बाद सिनॉप्सिस कॉलेज की रिसर्च काउंसिल या एकेडमिक काउंसिल के सामने रखती है। मंजूरी मिलने के बाद इसे विश्वविद्यालय रजिस्ट्रेशन के लिए भेज दिया जाता है।
- 3. डेटा कलेक्शन और प्रैक्टिकल क्लिनिकल ट्रायल: सिनॉप्सिस अप्रूव होने के बाद लगभग 1.5 से 2 साल की स्टूडेंट क्लिनिकल काम करता है। इस दौरान 50-100 मरीजों का डेटा, केस हिस्ट्री, पैथोलॉजिकल टेस्ट, दवाइयों का असर, या सर्जिकल रिजल्ट्स दर्ज किए जाते हैं। एकत्र किए गए डेटा का स्टैटिकल एनालिसिस किया जाता है, जिससे शोध के रिजल्ट निकाले जाते हैं।
- 4. थीसिस लेखन और प्लेगरिज्म (चोरी) जांच: थीसिस किसी दूसरे थीसिस से चोरी तो नहीं किया गया है। इसके लिए यूनिवर्सिटी में जमा करने से पहले थीसिस को Turnitin या DrillBit जैसे अधिकृत प्लेगरिज्म चेकिंग सॉफ्टवेयर से पास कराया जाता है।
- 5. सबमिशन, एक्सटर्नल इवैल्यूएशन और वायवा: अंतिम परीक्षा से 6 महीने पहले थीसिस की 4-5 हार्ड कॉपी और सॉफ्ट कॉपी यूनिवर्सिटी में जमा की जाती हैं। यूनिवर्सिटी इस थीसिस को 2 या 3 बाहरी एक्सटर्नल इवैल्युएटर्स (अन्य मेडिकल कॉलेजों के वरिष्ठ प्रोफेसरों) के पास गोपनीय रूप से भेजता है। जब एक्सटर्नल प्रोफेसर थीसिस को Accepted मार्क कर देते हैं, तभी छात्र को अंतिम प्रैक्टिकल और वायवा में बैठने की अनुमति मिलती है। प्रैक्टिकल परीक्षा के दिन एक्सटर्नल और इंटरनल एग्जामिनर्स स्टूडेंट से उसकी थीसिस, डेटा, केस स्टडी और शोध प्रक्रिया से संबंधित सीधे सवाल-जवाब करते हैं। वायवा में सफल होने के बाद ही MD-MS की डिग्री को अंतिम रूप से मान्यता मिलती है।

फेक रिसर्च पर कैंसिल हो सकता है रिजिस्ट्रेशन

