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N. Raghuraman’s Column – Dream differently, so that small settlements can shine like stars.


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36 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस शनिवार जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ की बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स से ‘एजेंट ऑफ चेंज’ बनने और ‘टीम इंडिया’ के लिए काम करने को कहा तो वे सिर्फ औपचारिक कॉन्वोकेशन स्पीच नहीं दे रहे थे।

वे युवा भारतीयों को याद दिला रहे थे कि राष्ट्र-निर्माण के लिए हमेशा किसी स्काई-स्क्रैपर के टॉप फ्लोर पर बने कॉर्नर ऑफिस, किसी ताकतवर पद या किसी ऐसे बड़े ऑर्गेनाइजेशन की जरूरत नहीं होती, जिसके बड़े शहरों में दफ्तर हों। कभी-कभी इसके लिए सिर्फ ऐसा व्यक्ति चाहिए, जो उस जगह के लिए कुछ सार्थक करने का फैसला करे, जहां से वह आता है। फिर चाहे वह जगह कितनी ही छोटी क्यों न हो।

विपुल खिराड़ी ऐसे ही एक युवा आदिवासी हैं। जिस गांव को वे दुनिया के नक्शे पर पहचान दिलाना चाहते थे, वह महाराष्ट्र में नासिक से 100 किमी दूर स्थित आदिवासी गांव ‘उदमल’ है। यह आधिकारिक रूप से प्रमाणित राज्य का पहला डार्क-स्काई कम्युनिटी बनने जा रहा है, जिससे महाराष्ट्र का आसमान थोड़ा और तारों भरा हो जाएगा।

जिला प्रशासन ने डिस्ट्रिक एनुअल ट्राइबल सब-प्लान (डीएटीएसपी) के तहत एक प्रोजेक्ट के लिए 42.1 लाख रुपए मंजूर किए हैं, जिसका उद्देश्य रात के मौलिक आसमान को बचाना और एस्ट्रो-टूरिज्म को विकसित करना है।

इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य सीधा है: लाइट पॉल्युशन कम करना, एस्ट्रोनॉमी टूरिज्म को बढ़ावा देना और स्थानीय आदिवासियों के लिए टिकाऊ रोजगार के अवसर पैदा करना। कम्युनिटी को लाइट पॉल्युशन कम करने और वैज्ञानिक तरीके से प्लान्ड आउटडोर लाइटिंग अपनाने के लिए समझाया गया।

इससे सुनिश्चित हुआ कि गांव की लाइटें स्मार्ट और सही दिशा में हों और रात के आसमान में कम खलल डालें। उदमल डार्क-स्काई इंटरनेशनल की ओर से महाराष्ट्र की पहली आधिकारिक डार्क-स्काई कम्युनिटी के रूप में सर्टिफाइड होने की प्रक्रिया में है।

यह सब विपुल से शुरू हुआ, जिन्होंने जब तारों को खोजा तो यह सपना नहीं देखा कि जीवन में अपने गांव को पीछे छोड़ दें। उन्होंने तारों की वजह से अपने गांव की पहचान बनाने का सपना देखा। 14 साल की उम्र में, एकलव्य आवासीय स्कूल में पढ़ाई के दौरान विपुल एक स्टारगेजिंग प्रोग्राम में शामिल हुए।

इस अनुभव ने गांव के आसपास फैले अंधेरे को देखने का उनका नजरिया बदल दिया। कई साल बाद मनाली में एक एस्ट्रोनॉमी इवेंट में जाते समय उनके मन में विचार आया कि उदमल गांव ग्लोबल एस्ट्रो-टूरिज्म की दुनिया का हिस्सा क्यों नहीं बन सकता?

एक अनजान आदिवासी गांव के युवा के लिए यह बेहद साहसिक विचार था। लेकिन उन्होंने इसे आगे बढ़ाया। उदमल के पास पहले से ही वह चीज थी, जिसे शहर तेजी से खो रहे थे- प्राकृतिक डार्क-स्काई। विपुल ने ग्रामीणों को समझाया कि डार्क-स्काई को बचाने का मतलब बिना रोशनी के रहना नहीं है।

इसका मतलब है जिम्मेदारी से रोशनी का इस्तेमाल करना और उस अंधेरे को बचाना, जो गांव की खास पहचान बन सकता है। आखिरकार ग्रामीणों ने विचार अपना लिया। प्रशासन भी साथ जुड़ा।

आज उदमल को महाराष्ट्र की पहली डार्क-स्काई कम्युनिटी बनने की महत्वाकांक्षा के साथ विकसित किया जा रहा है। सरकार टेलीस्कोप, स्काई-क्वालिटी मीटर और दूसरी सुविधाओं का पैसा दे रही है। इसमें खास बात सिर्फ एस्ट्रो-टूरिज्म प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि इसके पीछे की सोच है। विपुल अपने दूरदराज के गांव को अपनी मर्यादा मान सकते थे।

लेकिन उन्होंने इसे अवसर के तौर पर देखा। राजनाथ सिंह ठीक इसी भावना की बात कर रहे थे, जब उन्होंने स्टूडेंट्स से आग्रह किया कि समस्याओं को सिर्फ पहचानें नहीं, इसके समाधान खोजें। असर पैदा करें और नौकरी तलाशने वालों के बजाय जॉब-क्रिएटर बनें।

ये दोनों कहानियां अलग-अलग लग सकती हैं- यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स को संबोधित करते रक्षा मंत्री और अपने गांव को बदलने की कोशिश कर रहा एक युवा फिजिक्स स्टूडेंट, लेकिन दोनों का संदेश एक ही है।

भारत में ऐसे हजारों गांव, छोटी बस्तियां और छोटे समुदाय हैं, जो शायद ही कभी राष्ट्रीय पटल पर आ पाते हैं, जब तक कि वहां कुछ गलत न हो जाए। लेकिन उन सभी में कोई कहानी, कोई संसाधन, कोई परंपरा या कोई ऐसा व्यक्ति है, जो उसे खास बना सकता है। चमत्कार तब शुरू होता है, जब कोई उसे पहचान ले।

फंडा यह है कि शायद भारत का अगला बड़ा चमत्कार दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु से शुरू न हो। वह किसी अनजान गांव से भी हो सकता है- क्योंकि वहां किसी व्यक्ति ने अलग सपना देखने का फैसला कर लिया हो।

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