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टिकट नहीं मिला तो 'विचारधारा ने भिरतघात कर दिया':प्रत्याशियों की हालत 'अभ्यर्थियों' जैसी; चाय बनाने लगे विधायकजी




नमस्कार, राजस्थान में निकाय चुनाव के पहले चरण के नामांकन के दिन रोचक तस्वीरें सामने आईं। कहीं मन की बगिया खिल गई तो कहीं दिल के अरमान आसुंओं में बहे। कई जगह प्रत्याशियों की हालत अभ्यर्थियों जैसी नजर आई। इस बीच विधायकजी चाय बनाते नजर आए। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. चुनावी कॉम्पिटिशन में ‘परीक्षा की घड़ी’ जैसे कोई कॉम्पिटिशन एग्जाम का सेंटर हो, बांसवाड़ा का एसडीएम कार्यालय का माहौल ऐसा ही था। एक कारकून वहां बंधी रस्सी के पास आकर चिल्लाया- एक मिनट बचा है। इस दौरान जो रस्सी पार करके इधर आ जाएगा, उसका नामांकन हो जाएगा। 30 सेकेंड के बाद वही कारकून दोबारा रस्सी के पास आकर चिल्लाया- समय समाप्त। इस घटना के दो मिनट बाद मुंह लटका एक महाशय पहुंचे जिनका नाम अखिलेश था। वे लगभग रुआंसे होकर बोले- वार्ड 7 से भाजपा का टिकट मिलने की उम्मीद थी। टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय नामांकन भरने आया था। लेकिन लेट हो गया। वोटर लिस्ट में नाम ढूंढने में वक्त लग गया। बिना एग्जाम दिए फेल होना इसे कहते हैं। श्रीगंगानगर में वार्ड नंबर 26 से निर्दलीय महिला प्रत्याशी भी 14 मिनट लेट पहुंची। उनके लिए भी गेट नहीं नहीं खुला। दरवाजे के उस पार रिरियाती रहीं। गुहार लगाती रहीं। लेकिन जिला परिषद के पट नहीं खुले। जोधपुर में अकबर महाशय के साथ तो और भी बुरा हुआ। लेट हुए सो हुए, पुलिसकर्मी ने धक्का मारकर पीछे किया तो बिगड़ गए। बोले- एंट्री मत दो, लेकिन धक्का तो मत मारो। हमारी क्या इज्जत नहीं है? 2. टिकट नहीं मिला तो ‘विचारधारा ने भितरघात कर दिया’ जयपुर के वार्ड 149 ने कइयों के दिल तोड़े। सक्रिय महिला कार्यकर्ता अंजलि गौतम हंसते-खेलते पार्षद का नामांकन करने आईं थी। लेकिन पता चला कि टिकट युवा मोर्चा अध्यक्ष की श्रीमतीजी को दे दिया गया है। बस इसी बात पर अंजलि जी का दिल टूट गया। न तो वे अपने आंसू रोक सकीं और न शब्द। उन्होंने कहा- भाजपा कार्यकर्ताओं से कहना चाहूंगी कि मेहनत करने का कोई तुक नहीं है। बड़े नेताओं-विधायकों को निरंतर धोक लगाते रहो, भाईसाब-भाईसाब करते रहो, आपको टिकट मिल जाएगा। यहां हम 10 साल से अपना परिवार सब कुछ छोड़कर फील्ड में झख मरा रहे हैं और टिकट किसी और को दे दिया। फिर ये महिला सीट का नाटक भी मत करो। डायरेक्ट पुरुषों को दे दो, वे चाहें तो खुद चुनाव लड़ लें या अपनी पत्नियों को खड़ा कर दें। यहां हम भीड़ जुटा रहे हैं, फील्ड वर्क कर रहे हैं, सर्वे कर रहे हैं, सक्रिय सदस्य जोड़ रहे हैं। हम बेवकूफ हैं। क्योंकि नंबर तो उसका आएगा जिसे धोक लगानी आती है। इसी वार्ड से टिकट की उम्मीद पालकर बैठे विश्वास सैनी भी रो पड़े। बोले- बचपन से जिस विचारधारा को दिल में रखा। उसने भितरघात कर दिया। अब निर्दलीय लड़ूंगा। जनता के बीच रहकर काम करना आता है। उधर अजमेर में टिकट वितरण को लेकर भाजपा के सीनियर कार्यकर्ता महेंद्र सिंह भाटी खफा हो गए। उन्होंने कलेक्ट्रेट दफ्तर के बाहर ही सिर मुंडवा लिया। 3. चाय की दुकान पर विधायकजी का ‘सिंबल’ सियासी केतली गर्म है। इस वक्त सिंबल की ही चर्चा है। जिसे मिल गया और उसने गढ़ जीत लिया। जिसे हासिल नहीं हुआ उसके अरमान आंसुओं में बह गए। जोधपुर कलेक्ट्रेट के आस-पास गहमागहमी का माहौल था। माहौल का मुजाहिरा करने शहर विधायक अतुल भंसाली भी पहुंच गए। कलेक्ट्रेट के पास चाय की दुकान उन्हें स्टैंड लेने के लिए मुफीद जगह मालूम हुई। वे सरक कर दुकान में पहुंच गए। जब कोई बड़ा व्यक्ति किसी प्रतिष्ठान में पहुंचता है तो मालिक अपनी कुर्सी छोड़ देता है। यही काम चायवाले ने किया। विधायकजी को आया देख चायवाला दूर सरक गया। विधायकजी चायवाले की ‘सीट’ पर आए गए। वे चाय बनाने लगे। चाय बनाकर कपों में छान दी। बढ़िया फुटेज हासिल हो गई। खुश होकर विधायक जी ने जेब से ‘सिंबल’ निकाला। हालांकि यह वह सिंबल नहीं था जिसकी आरजू और जुस्तजू में कितने ही कार्यकर्ता दिन-रात एक कर देते हैं। यह तो छोटा सा कमल का फूल था जिसे विधायक जी जेब में लेकर घूम रहे थे। तो जेब से निकालकर विधायक जी ने फूल चायवाले की तरफ बढ़ाया। फूल का चायवाल क्या करता? न कूट कर चाय में डाल सकता है और न इस सिंबल पर चुनाव लड़ सकता है। तो उसने रुचि नहीं दिखाई। विधायकजी ने फूल को वापस कुर्ते की जेब में रखा और अपनी ही बनाई चाय की चुस्कियां लेने लगे। 4. चलते-चलते… वे बुआजी के नाम से मशहूर हैं। धर्म और अध्यात्म से जुड़ी हैं। समाज में उनका काफी मान सम्मान है। उन्हें रील बनाने की धुन रहती है। केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी से उनकी मुलाकात हुई तो वहीं सड़क पर उन्होंने कभी खुशी कभी गम के गीत पर रील बना दी। रील में भाव मंत्रीजी को दुआएं देने का था। गीत लगाया- तेरे साथ होंगी मेरी दुआएं, आएं कभी न तुझ पे कोई बलाएं। दुआ पाकर चौधरी साहब धन्य हुए। चौधरी जी ने रील की लपेट में ही 500 का नोट निकाला और बुआजी को दुआओं के बदले नेग देने का प्रयास किया। लेकिन बुआजी की रुचि नोट में कतई नहीं। उन्होंने मंत्रीजी की बलइयां लीं और निर्विकार भाव के साथ रील कंपलीट की। ऐसे लोग भी विरले ही होते हैं, जिन्हें नेता से अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार सुबह 7 बजे मुलाकात होगाी।



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