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Minhaj Merchant’s Column – Professionals and Technocrats Should Be Entrusted with Major Responsibilities


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3 घंटे पहले

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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक - Dainik Bhaskar

मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक

इसरो और डीआरडीओ में हाल में हुए बदलाव सरकार के दृष्टिकोण में परिवर्तन के संकेत देते हैं। इसरो निजी क्षेत्र की कंपनियों- जिनमें स्टार्टअप भी शामिल हैं- के साथ अपनी तकनीक और जिम्मेदारियां साझा कर रहा है। वो अब चंद्रमा पर भारतीय एस्ट्रोनॉट उतारने, मंगल ग्रह का अन्वेषण करने और 2035 तक भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने जैसे अभियानों पर ध्यान केंद्रित करेगा। भारत में स्पेस सेक्टर से जुड़े 440 से अधिक स्टार्टअप्स हैं।

वहीं, भारत का प्रमुख रक्षा अनुसंधान संगठन डीआरडीओ भी इसरो के मॉडल पर आगे बढ़ रहा है। वह मिसाइल, ड्रोन और वायु रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए एलएंडटी, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स और भारत फोर्ज जैसी निजी कंपनियों के साथ सहयोग करेगा। निजी कंपनियां पहले ही सेना के लिए टैंक और नौसेना के लिए जहाज बना रही हैं।

लेकिन जटिल रक्षा प्रणालियों के लिए डीआरडीओ द्वारा टेक्नोलॉजी और संसाधन साझा किए जाने से भारत की विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी। इसरो और डीआरडीओ- दोनों के ये कदम सही दिशा में हैं। भारत लंबे समय से लड़ाकू विमानों के निर्माण के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर निर्भर रहा है।

यह व्यवस्था तो आगे भी जारी रहेगी, लेकिन अत्याधुनिक रक्षा परियोजनाओं की विस्तृत शृंखला के लिए मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं स्थापित करने में निजी कंपनियों की भागीदारी लगातार बढ़ेगी। रक्षा मंत्रालय ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ाना, रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करना और आपूर्ति शृंखला में उद्यमों तथा अन्य टेक्नोलॉजी-पार्टनर्स की भागीदारी के अवसर पैदा करना है।

रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में तकनीकी रूप से सक्षम निजी कंपनियों को शामिल करने के अलावा सरकार को अब इससे भी अधिक साहसिक सुधार पर विचार करना चाहिए। पश्चिमी देशों में कॉर्पोरेट लीडर्स का सरकार में मंत्री बनना और सरकार से जुड़े लोगों का कॉर्पोरेट क्षेत्र में जाना एक प्रचलित परंपरा है।

उदाहरण के लिए, ब्रिटेन के पूर्व उप-प्रधानमंत्री निक क्लेग सरकार छोड़ने के बाद मार्क जकरबर्ग की कंपनी मेटा के वाइस-प्रेसिडेंट बने। इसके उलट, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन राजनीति में आने से पहले मीडिया कंपनी कार्लटन कम्युनिकेशंस में कार्यकारी पद पर काम कर चुके थे। भारत में भी इन्फोसिस चेयरमैन नंदन नीलेकणि कई सरकारी समितियों में काम कर चुके हैं और उन्हें ‘आधार’ की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

फिलहाल वे नीट परीक्षाओं की व्यवस्था में सुधार के लिए गठित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता कर रहे हैं। नीलेकणि एक बेहतरीन मंत्री भी साबित हो सकते थे। यही बात टाटा संस के चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन के बारे में भी कही जा सकती है, जिनका टाटा समूह में कार्यकाल अगले साल पूरा हो रहा है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में राजनीति के दूसरे फैक्टर्स आड़े आते हैं- क्षेत्र, जाति, धर्म और विचारधारा।

हालांकि कुछ टेक्नोक्रेट्स को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जैसे एस. जयशंकर और अश्विनी वैष्णव। वे दोनों पूर्व नौकरशाह हैं। जयशंकर भारतीय विदेश सेवा से आए हैं, जबकि वैष्णव भारतीय प्रशासनिक सेवा से। दोनों का कोई राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र नहीं है, लेकिन दोनों ही बेहतरीन मंत्री साबित हुए हैं। दरअसल, जयशंकर तो आईएफएस से सेवानिवृत्त होने के बाद और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने से पहले कुछ समय तक टाटा समूह के साथ भी काम कर चुके थे।

इस तरह की नियुक्तियों की ऐतिहासिक मिसालें भी मौजूद हैं। जवाहरलाल नेहरू का पहला केंद्रीय मंत्रिमंडल तो टेक्नोक्रेट्स से भरा हुआ था। अर्थशास्त्री, शिक्षाविद् और टाटा संस के कॉर्पोरेट अधिकारी डॉ. जॉन मथाई को नेहरू ने रेल और परिवहन मंत्री नियुक्त किया था और बाद में वे वित्त मंत्री भी बने। अर्थशास्त्री और उद्योगपति आर.के. षणमुखम चेट्टी ने भी नेहरू मंत्रिमंडल में वित्त मंत्रालय संभाला। जाने-माने कारोबारी और बैंकिंग विशेषज्ञ सी.एच. भाभा ने वाणिज्य मंत्री के रूप में काम किया।

पेशेवरों को मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए सोच में बदलाव की जरूरत होगी। महिंद्रा समूह के पूर्व सीईओ पवन गोयनका का ही उदाहरण लें। अंतरिक्ष विभाग के अधीन अंतरिक्ष क्षेत्र के नियामक इन-स्पेस के प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति एक निर्विवाद सफलता रही है। गोयनका ने भारत के अंतरिक्ष मिशन में पेशेवर दृष्टिकोण और नई ऊर्जा का संचार किया है।

  • एस. जयशंकर और अश्विनी वैष्णव पूर्व नौकरशाह हैं। जयशंकर भारतीय विदेश सेवा से आए हैं, जबकि वैष्णव भारतीय प्रशासनिक सेवा से। दोनों का कोई राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र नहीं है, लेकिन दोनों ही बेहतरीन मंत्री साबित हुए हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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