Headlines

Delhi HC Ruling: DNA Test Not Proof Of Consent In Rape Cases


नई दिल्ली32 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि DNA जांच से किसी व्यक्ति का बच्चे का जैविक पिता होना और यौन संबंध बनना साबित हो सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि संबंध सहमति से बने थे या जबरदस्ती। कोर्ट ने कहा कि DNA अपने आप में रेप का सबूत नहीं है।

जस्टिस मधु जैन ने यह टिप्पणी उस अपील को खारिज करते हुए की, जो महिला ने एक व्यक्ति के बरी होने के खिलाफ दायर की थी। उस व्यक्ति पर महिला से बार-बार रेप करने, नशीला पदार्थ देने, अप्राकृतिक यौन कृत्य करने और धमकी देने के आरोप थे।

हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2024 का फैसला बरकरार रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने द्वारका की कोर्ट का अक्टूबर 2024 का फैसला बरकरार रखा। द्वारका कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था।

महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी उसके परिवार को जानता था। उसने 2017 से धमकी देकर और बहला-फुसलाकर उसकी इच्छा के खिलाफ बार-बार शारीरिक संबंध बनाए।

एक बार आरोपी ने उसे नशीला पदार्थ दिया और उसके बाद उसका यौन शोषण किया। इसके बाद जून 2019 में उसने एक बच्चे को जन्म दिया।

DNA जांच से यह साबित हुआ कि आरोपी ही बच्चे का जैविक पिता है।

कोर्ट ने कहा,

QuoteImage

आरोप की गंभीरता आपराधिक मुकदमे में जरूरी सबूत की जगह नहीं ले सकती। अगर सबूत से बेगुनाही के पक्ष में भी जाता है, तो उसका लाभ आरोपी को देना होगा।

QuoteImage

हाईकोर्ट के मुताबिक, असली सवाल यह था कि क्या अभियोजन पक्ष ने बिना किसी उचित संदेह के यह साबित किया कि महिला की सहमति नहीं थी और रेप का अपराध हुआ था।

महिला की अकेली गवाही भरोसे लायक हो

हाईकोर्ट ने माना कि उचित मामले में महिला की अकेली गवाही के आधार पर भी दोषी ठहराया जा सकता है। लेकिन ऐसी गवाही भरोसा पैदा करने वाली होनी चाहिए और न्यायिक जांच में टिकनी चाहिए।

हाईकोर्ट के मुताबिक, ट्रायल कोर्ट ने महिला के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए। ये विरोधाभास नशीला पदार्थ दिए जाने, पहली वारदात के समय महिला के होश में होने, उसकी प्रेग्नेंसी की परिस्थितियों और उसके पति के बच्चे के पितृत्व पर शक से जुड़े थे।

महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी नग्न तस्वीरें और वीडियो बनाए थे और उन्हें प्रसारित करने की धमकी दी थी। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों को साबित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं दिए गए। तस्वीरें, वीडियो और चैट पेश नहीं किए गए। आरोपी के मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच के दौरान भी ये बरामद नहीं हुए।

—————————–

ये खबर भी पढ़ें:

दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश- वकील की ₹78 लाख फीस दें:कहा- कानूनी सेवाएं लेने के बाद फीस देने से मुकर नहीं सकती एमपी सरकार

मीडिया से बात करते एडवोकेट अनूप जॉर्ज चौधरी (फाइल)।

मीडिया से बात करते एडवोकेट अनूप जॉर्ज चौधरी (फाइल)।

QuoteImage

राज्य सरकार किसी वरिष्ठ वकील से अदालत में अपनी पैरवी कराने के बाद उनकी फीस चुकाने से पल्ला नहीं झाड़ सकती। किसी वकील को अपने हक की फीस पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, यह राज्य व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है।

QuoteImage

दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने यह तल्ख टिप्पणी करते हुए मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने एमपी सरकार को राज्य के पूर्व महाधिवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी को ₹78.65 लाख का बकाया भुगतान 9% वार्षिक ब्याज (वर्ष 2021 से) के साथ करने का निर्देश दिया है। पढ़ें पूरी खबर…

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *