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निकाय चुनाव में 'जेन-जी पॉलिटिक्स' की एंट्री:BJP के 51, कांग्रेस के 49 फीसदी कैंडिडेट युवा; जानिए-इनकी दावेदारी से कितना बदली लोकल राजनीति




राजस्थान के निकाय चुनाव में इस बार ‘जेन-जी’ पॉलिटिक्स की एंट्री हो गई है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों पार्टियों का दावा है कि करीब आधे उम्मीदवार 40 साल या उससे कम उम्र के उतारे हैं। निकाय चुनाव में बड़ी पार्टियों ने किस उम्र के उम्मीदवारों पर सबसे ज्यादा टिकट बांटे हैं? क्या यह जेन-जी और युवाओं को साधने की रणनीति है? जेन-जी के चुनाव में कूदने से इस बार प्रचार का तरीका कितना बदला? यही जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में… सवाल-1 : भाजपा-कांग्रेस ने जेन-जी या जेन-वाई, किस पर जताया ज्यादा भरोसा? जवाब : भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 40 वर्ष तक की उम्र के करीब 51% युवाओं को टिकट देकर मैदान में उतारा। वहीं कांग्रेस ने इसी उम्र के 49% चेहरों को टिकट देने का दावा किया है। भाजपा में 6% उम्मीदवार 25 साल तक के हैं, जबकि 45% उम्मीदवार 26 से 40 साल के हैं। कांग्रेस में 5% उम्मीदवार 25 साल तक और 44% उम्मीदवार 26 से 40 साल की उम्र के हैं। 41 से 50 साल के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी भाजपा में 27% और कांग्रेस में 29% है। 50 साल से ज्यादा उम्र वाले उम्मीदवार दोनों पार्टियों में 22% हैं। यानी दोनों पार्टियों ने इस चुनाव में लगभग हर दूसरा टिकट 40 साल तक की उम्र वाले चेहरे को दिया है। लेकिन इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बिल्कुल नए 20-25 साल के चेहरों का नहीं, बल्कि 26 से 40 साल की उम्र वाले उम्मीदवारों का है। साल 2021 में 91 नगर निकायों के कुल 3 हजार 60 वार्डों में से 25 साल तक की उम्र के 314 पार्षद चुने गए थे। यानी 10.26 प्रतिशत केवल जेन-जी की उम्र के पार्षद चुने गए थे। जबकि 36 से 50 साल तक की उम्र के जीतने वाले पार्षदों की संख्या 1 हजार 111 रही थी। सवाल-2 : पार्टियों ने युवाओं पर इतना बड़ा दांव क्यों लगाया? जवाब : इसके पीछे दो बड़े फैक्टर हैं… 1. जेन-जी फैक्टर : राजस्थान में 18 से 25 (‘जेन-जी’ वर्ग) के करीब 21.30 लाख वोटर हैं। पार्टी या केवल लुभावने वादों के बजाय सटीक मुद्दों, प्रत्याशी के जमीनी काम और प्रामाणिकता पर भरोसा करते हैं। इसी ‘जेन-जी’ फैक्टर को साधने के लिए कांग्रेस ने निकाय चुनाव से पहले 11-सदस्यीय ‘जेन-जी स्टेट विंग’ बनाई। वहीं, भाजपा ने वार्ड स्तर पर ‘डिजिटल यूथ वॉलंटियर्स’ और युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को सीधे मैदान में उतारा, ताकि वे इस वर्ग से सीधा संवाद बना सकें। 2. युवा वोटर्स की संख्या : 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों के लिए कुल करीब 1.44 करोड़ मतदाता हैं। जिनमें से 18 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के वोटर 57.90 लाख हैं। यानी लगभग 40.21% हिस्सा अकेले युवा वोटर्स का है। स्थानीय निकाय चुनावों जीत हार का अंतर मार्जिन बहुत कम होता है। यही कारण है कि इतने बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों दल प्रयास में जुटे हैं। दोनों पार्टी से प्रदेशाध्यक्षों के हाल ही में आए बयान से भी यही झलकता है… मदन राठौड़, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष : नई पीढ़ी के नौजवान आगे आएं, इस दिशा में पार्टी पिछले लंबे समय से प्रयास कर रही है और युवाओं को उचित अवसर उपलब्ध कराए हैं। गोविंद सिंह डोटासरा, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष : युवाओं पर हमारा पूरा फोकस रहा है। हमने जेन-जी और युवाओं को तवज्जो दी है। सवाल-4 : क्या जेन-जी, जेन-वाई के आने से चुनाव प्रचार का तरीका भी बदल गया है? जवाब : इस बार चुनाव प्रचार चाय की थड़ियों, नुक्कड़ सभाओं और पोस्टर-बैनर तक सीमित नहीं रहा। विधानसभा चुनाव की तर्ज पर सोशल मीडिया और डिजिटल मार्केटिंग एजेंसियां भी निकाय चुनाव में कूद गई हैं। कैम्पेनक्राफ्ट पीआर (बदला हुआ नाम) के मुताबिक, वे एक कैंडिडेट से इसके लिए 5 से 8 लाख रुपए तक चार्ज कर रहे हैं। उनकी टीमें कैंडिडेट के लिए वॉर रुम से लेकर ब्रांडिंग तक का कामकाज संभालती है। चुनाव प्रचार के तरीके को इन 3 अहम बातों से समझ सकते हैं…. 1. डिजिटल मार्केटिंग एजेंसियां और ‘वार रूम’ का कल्चर: वार्ड और निकाय स्तर के प्रत्याशियों ने भी जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसी जगहों पर चल रही डिजिटल मार्केटिंग एजेंसियों और पीआर फर्मों को हायर किया है। ये एजेंसियां उम्मीदवारों के लिए 30 से 60 सेकेंड की रील्स, वीडियो बाइट्स, इंफोग्राफिक्स और ‘कैम्पेन एंथम’ तैयार कर रही हैं। वार्ड वाइज और बूथ वाइज डेटा एनालिसिस करके सिर्फ उसी वार्ड या मोहल्ले के लोगों के बीच सोशल मीडिया के जरिए अपने कैंडिडेट का प्रमोशन भी कर रही हैं। उम्मीदवारों का पर्सनलाइज्ड वॉट्सएप ब्रॉडकास्ट सिस्टम और उनकी ही आवाज में ऑटोमेटेड वॉयस कॉल भेजे जा रहे हैं। 2. ‘पर्सनल ब्रांडिंग’ से लेकर नैरेटिव बिल्डिंग : पहले प्रत्याशी अपनी पार्टी और बड़े नेताओं के फोटो पोस्टर पर लगाकर वोट मांगते थे। अब डिजिटल तरीके से प्रत्याशी की ‘पर्सनल ब्रांडिंग’ पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। प्रत्याशी ने पिछले दिनों में क्या-क्या सामाजिक काम किए, जनता के बीच कितने एक्टिव रहे- इसके छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स बनाकर वॉट्सएप ग्रुप्स और लोकल सोशल मीडिया पेजों पर वायरल किए जा रहे हैं। वहीं, विरोधी प्रत्याशी की कमजोरियों या वार्ड के रुके हुए कामों का ग्राउंड सर्वे करके डिजिटल पोस्टर और रील्स के जरिए एक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। 3. ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क भी : डिजिटल के साथ-साथ पारंपरिक तरीके से भी कैंपेन चल रहा है। वार्ड स्तर के चुनाव में जीत-हार का फैसला बेहद कम वोटों से होता है। सोशल मीडिया जहां प्रत्याशी का माहौल बनाने का काम करता है, वहीं प्रत्याशी ने खुद घर-घर जाकर हाथ जोड़े या नहीं, वोटर इन बातों का भी ख्याल रखते हैं। इसलिए इस बार का सबसे सफल फॉर्मूला ‘डिजिटल से माहौल बनाओ और ग्राउंड पर हाथ जोड़कर वोट लाओ’ का रहा है। सवाल-5 : क्या युवा उम्मीदवारों को टिकट देना विधानसभा चुनाव- 2028 की तैयारी भी है? जवाब : राजनीतिक विश्लेषक महेश शर्मा के मुताबिक, सीधे तौर पर नहीं। इसकी बड़ी वजह है- दोनों चुनावों का गणित, दायरा और उम्मीदवार चुनने का पैमाना। निकाय चुनाव में जीत वार्ड स्तर की पहुंच, स्थानीय मुद्दों पर काम और पर्सनल कॉन्टैक्स्ट पर निर्भर करती है। जबकि विधानसभा चुनाव में जाति समीकरण, संगठन की ताकत, बड़े नेताओं का समर्थन और पूरे क्षेत्र की राजनीति मायने रखती है।



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