ब्लैकबोर्ड-तू हिजड़े का बच्चा, तेरी मां ताली पीटकर कमाती है:पड़ोसी कहते हैं- तुझे किन्नरों की टोली में शामिल करेंगी, कहानी किन्नर के बच्चों की




‘हिजड़े का बच्चा… हिजड़े का बच्चा।’ स्कूल का गेट खाली होने लगा था। बच्चे घरों की तरफ निकल चुके थे। सड़क पर बस कुछ कदमों की आहट और पीछे से आती हंसी बची थी। एक बच्चा तेजी से आगे बढ़ रहा था। तीन-चार बच्चे उसका पीछा कर रहे थे। उसे चिढ़ाते, फिर हंसते बच्चा कुछ नहीं कहता। बस बैग को कंधे पर ठीक करता और चलता जाता। फिर एक लड़के ने दोबारा कहा- ‘हिजड़े के बच्चे… आज तेरी मां, तुझे लेने नहीं आई क्या।’ बच्चा अचानक रुका और बोला- ‘वो मेरी मम्मी हैं।’ इस बच्चे का नाम है- रोहन। उम्र 12 साल। रोहन का जवाब सुनकर बच्चे फिर हंस पड़े। बोले- ‘तेरी मम्मी हिजड़ा है। ताली पीटकर पैसे कमाती है।’ रोहन की आंखें भर आईं। वो तेज कदमों से घर की तरफ चल पड़ा। घर पहुंचते ही सीधे कमरे में गया और चुपचाप बैठ गया। उसकी चुप्पी देखकर मम्मी उसके पास पहुंची। सिर पर हाथ फेरा और पूछा- ‘बेटा, क्या हुआ?’ रोहन कुछ बोला तो नहीं, लेकिन फूट-फूटकर रोने लगा। अपनी मम्मी के सीने से लिपट कर बोला-‘सब मुझे हिजड़े का बच्चा कहते हैं।’ राेहन जिसे अपनी मां कहता है, दरअसल वो किन्नर हैं। नाम है- गुड्‌डन। रोहन 9 साल का था, जब गुड्डन उसे अपने घर ले आईं थीं। उसकी पढ़ाई-लिखाई, खाना-कपड़ा, सबकुछ वही करती हैं। लेकिन दुनिया है कि मदद के बजाय रोहन को ताने देने लगी। रोहन जब पैदा हुआ उसी वक्त मां की मौत हो गई। पिता नशे में डूबा रहता था। एक दिन वो रोहन को जबरन उसके मामा-मामी के घर छोड़ आया। कुछ साल बाद मामा का भी लिवर फेल हो गया, वो भी नहीं रहे। मामा के जाने के बाद रोहन की पढ़ाई छूट गई। मामी को गठिया हुआ तो छोटी उम्र में घर की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। एक दिन मामी ने उसे दुकान पर काम करने भेज दिया। रोहन सुबह दुकान खोलता और शाम को कुछ रुपये लेकर घर लौट आता। एक दिन किन्नर गुड्‌डन उसी दुकान पर सामान लेने पहुंची। रोहन को देखते ही बोलीं- बेटा, दुकान पर कोई बड़ा नहीं है। वो बोला- ‘नहीं आंटी, ये दुकान मैं ही चलाता हूं।’ गुड्डन ने पूछा- ‘स्कूल कब जाते हो फिर।’ जवाब मिला- ‘दिनभर दुकान पर रहता हूं, स्कूल कैसे जाऊंगा। दुकान बंद हुई तो घर पर खाना नहीं बनेगा।’ गुड्डन कुछ सोचकर बोलीं- तुम्हारा घर कहां है, मुझे पता बताओ, शाम को आऊंगी तुम्हारी मां से मिलने। रोहन फौरन बोला-‘मां तो मर चुकी है, मामी के साथ रहता हूं। पता नोट कर लीजिए।’ गुड्डन शाम को उसके घर पहुंच गई। उसकी मामी को मदद का भरोसा देकर रोहन को अपने घर ले आईं। यहीं से रोहन की जिंदगी का एक नया रिश्ता शुरू हुआ। जिस बचपन के लिए वह तरस रहा था, गुड्डन ने उसे वो सब देने की कोशिश की। दोनों का रिश्ता मां-बेटे के रिश्ते में बदल गया। रोहन तो गुड्डन को मम्मी कहने लगा, लेकिन इस वजह से उसे स्कूल में परेशानी होने लगी। वो हर रोज स्कूल में किन्नर का बच्चा होने के ताने सुनता और चुपचाप घर लौट जाता। रोहन जैसी ही कहानी है 10 साल के गोकुल की। उसके पिता सब्जी की दुकान चलाते थे। एक दिन अचानक बीमार हुए और उनकी मौत हो गई। घर की जिम्मेदारी मां पर आ गई। वो दूसरों के घरों में बर्तन धोने लगी, झाड़ू-पोंछा करने लगी। जितना कमातीं, उसमें दो वक्त की रोटी मुश्किल से मिलती। गोकुल पढ़ना चाहता था। मां के पास फीस भरने के पैसे नहीं थे। स्कूल वालों ने गोकुल को स्कूल आने से मना कर दिया। उसकी मां रोती हुई गुड्डन के पास पहुंचीं। गुड्डन दोनों मां-बेटे के साथ स्कूल पहुंच गईं। स्कूल के गेट से अंदर कदम रखते ही सबकी निगाहें गुड्डन पर टिक गईं। लंबा कद। चौड़ा माथा। औरतों जैसा शृंगार। मर्दों जैसी आवाज। बच्चे उन्हें देखते रहे। फिर गोकुल से पूछने लगे- ‘तुम्हारे साथ ये क्यों आई हैं?’ गोकुल बोला- ‘मेरी फीस भरने।’ फिर सवाल- ‘ये तुम्हारी फीस क्यों भरेगी।’ गोकुल चुप रहा। गुड्डन फीस भरकर निकली और गोकुल के साथ घर लौट गईं। अगले दिन गोकुल स्कूल पहुंचा तो कोई उससे बात नहीं कर रहा था। छुट्टी के बाद उसका एक दोस्त पास आया और धीरे से बोला- ‘मेरे मम्मी-पापा ने तुमसे दूर रहने को कहा है।’ गोकुल ने पूछा- ‘क्यों?’ दोस्त बोला- ‘कहते हैं, तुम हिजड़ों के यहां रहते हो। इसलिए अब कोई तुमसे बात नहीं करेगा।’ गोकुल ने कहा- ‘वो तो अच्छी हैं। मेरी फीस भी उन्होंने ही भरी।’ दोस्त बोला- ‘फिर भी मैं तुमसे बात नहीं कर सकता।’ उसी दिन गोकुल की मां से उनके पड़ोसी ने कहा- ‘इस किन्नर से दूर रहो। ये तुम्हारे बेटे को अपने टोले में शामिल कर लेंगी। फिर ये भी लाली-लिपिस्टिक लगाकर, औरतों के कपड़े पहनकर ताली पीटता घूमेगा।’ गोकुल कहता है- ‘लोग आंटी को हिजड़ा कहते हैं, तो मुझे बुरा लगता है। लेकिन किसी से कुछ कहता नहीं हूं । यहीं रहता हूं। पढ़ता हूं। आंटी अक्सर 10-20 रुपये भी देती हैं। उससे आइसक्रीम और चॉकलेट खाता हूं।’ ऐसी ही कहानी अब्दुल्ला की है। फर्क इतना था कि उसके सामने समस्या फीस नहीं, स्कूल में दाखिले की थी। अब्दुल्ला पढ़ाई में तेज था। चार भाई-बहन थे। पिता टेलर थे। कमाई इतनी थी कि किसी तरह चूल्हा जल जाए। बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुड़ता तो पूरा हिसाब बिगड़ जाता। अब्दुल्ला का स्कूल में दाखिला नहीं हो रहा था। स्कूल ने कह दिया- ‘सीट नहीं है।’ अब्दुल्ला के पिता उसे लेकर गुड्डन के पास पहुंचे। कहा- बेटा पढ़ना चाहता है, लेकिन स्कूल वाले एडमिशन नहीं दे रहे। गुड्‌डन बोली- स्कूल चलो, देखते हैं। स्कूल पहुंचे तो एडमिशन देने से मना कर दिया। इसके बाद गुड्‌डन ने राइट टू एजुकेशन के तहत दाखिले का रास्ता चुना। इसके लिए काम करने वालों से जानकारी ली। जो कागज उन्होंने बताए, वो इकट्‌ठा किए। दोबारा स्कूल पहुंचे। बात हुई, थोड़ी बहस। आखिर अब्दुल्ला का दाखिला हो गया। अब्दुल्ला से स्कूल में टीचर ने पूछा- ‘ये तुम्हारी क्या लगती हैं?’ अब्दुल्ला का जवाब सीधा था- ‘मेरी मां हैं। हर मुसीबत में साथ खड़ी रहती हैं।’ अब अब्दुल्ला रोजाना स्कूल जाने लगा। गुड्डन उसकी पढ़ाई का खर्च उठाने लगीं। वह उनके घर जाता तो खाना भी खिलातीं। लेकिन पड़ोसी उसके पिता से कहते- ‘अब क्या तुम अपने बेटे को ताली पीटकर कमाने की ट्रेनिंग दोगे।’ अब्दुल्ला जब ये बातें सुनता पिता से कहता है- ‘न जाने मोहल्ले वाले इनके बारे में भला-बुरा क्यों कहते हैं।’ अब सवाल यह था कि आखिर गुड्‌डन के घर में ऐसा क्या था, जिसे बच्चे अपना घर मान बैठे थे? दोपहर का वक्त था। लखनऊ के डालीगंज की एक गली में तीन मंजिला मकान का दरवाजा खुला था। आवाज दी तो अंदर से कदमों की आहट आई। कुछ पल बाद गुड्‌डन बाहर आई। वो अपने घाघरे की सिलवटें ठीक करते हुए बोलीं-आइए, आइए। अंदर पहुंचे तो बगल वाले कमरे में कुछ बच्चे खेल रहे थे। गुड्डन ने पानदान खोला और पूछा- ‘आप पान खाएंगी?’ मैंने पानदान को गौर से देखा तो बोलीं- ‘ये 100 साल पुराना है।’ फिर गुड्डन अपनी कहानी सुनाने लगीं। गुड्डन बोलीं- ‘हम चार भाई-बहन थे। मुझे पढ़ने का बहुत शौक था। स्कूल जाना अच्छा लगता था। लेकिन मैं दूसरों से अलग थी। शायद यही बात पिता को पसंद नहीं थी। वह मुझे अक्सर मारते-पीटते थे।’ फिर कहती हैं- ‘9 साल की थी, जब तंग आकर घर छोड़ दिया। घर से निकली तो पता नहीं था कि दुनिया कैसी है। हर जगह शोषण हुआ। कोई अपना नहीं, कोई सहारा नहीं। फिर एक किन्नर मुझे अपने डेरे में ले आया। वहीं से ताली पीटने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है।’ बचपन की बात करते-करते उनकी आवाज में टीस उतर आती है। कहती हैं- ‘मैं पढ़ नहीं पाई। शायद यही बात आज तक मेरे मन में रह गई है। इसलिए जब किसी बच्चे को पढ़ने में परेशानी होती है तो मैं उसे देखकर चुप नहीं रह पाती।’ शायद इसी वजह से मेरे घर का दरवाजा बच्चों के लिए हमेशा खुला रहता है। लोग मुझे कितने भी ताने मारें, जहां तक बन पड़ता है, मैं मदद करती हूं। मैं सामने बैठे बच्चों को देखती हूं तो अपनी सारी तकलीफें भूल जाती हूं। मेरी कोशिश बस इतनी है कि किसी बच्चे का स्कूल न छूटे। ये बच्चे भी तो मजबूर हैं। किसी के पिता नहीं हैं। किसी के घर में कोई और परेशानी है। लोग मेरे बारे में न जाने कितना बुरा-भला कहते हैं, लेकिन ये बच्चे फिर भी मेरे पास रहते हैं। मैं बस इतना चाहती हूं कि दुनिया हमें भी देखे। समझे। हम भी उन्हीं की तरह हाड़-मांस के इंसान हैं। बाकी लोगों जैसे ही हैं। बस हममें कुछ अलग है। शुरुआत में तो लोग हमें देखकर रास्ता बदल लेते थे। कहते थे– ‘पड़ोस में हिजड़े आ गए हैं, अब मोहल्ले का क्या होगा।’ मुझे याद है, तब बहुत बुरा लगता था। आखिर हमसे ऐसी नफरत क्यों? लेकिन अब वही लोग हमारे घर के सामने से गुजरते हैं तो देखते हैं कि यहां ताली की आवाज से ज्यादा बच्चों की आवाज सुनाई देती है। कोई स्कूल जा रहा है। कोई किताब लेकर बैठा है। कोई पढ़ रहा है। मैं इन बच्चों के लिए हिजड़ा नहीं हूं। मैं इनकी मां हूं, आंटी हूं। लोगों को हमें समझने में वक्त लग गया। इन बच्चों ने तो हमें बहुत पहले ही समझ लिया था। इतने में रसोई से आवाज आती है- ‘खाना तैयार है।’ बच्चे एक-एक करके रसोई की तरफ आते हैं। कोई चपाती तो कोई खिचड़ी की फरमाइश करता है। सबको उनकी पसंद का खाना मिलता जाता है। गुड्‌डन बच्चों की ओर देखकर कहती हैं- मैं इन्हें देखती हूं तो लगता है, मेरा घर शायद इसी के लिए बना है। मेरा तो सीधा हिसाब है। बच्चे पढ़ लें और अपने पैरों पर खड़े हो जाएं। कुछ बन जाएं। मुझे और क्या चाहिए? जिन बच्चों की मैंने मदद की, उनमें से कुछ आज नौकरी कर रहे हैं। हाल ही में दो बच्चों की नोएडा में नौकरी लगी। एक दिन एक बच्चे का फोन आया। बोला- ‘मम्मी, आपके लिए क्या भेजें?’ मैंने कहा- ‘कुछ नहीं चाहिए। तू बस ठीक से नौकरी कर।’ कुछ दिन बाद वो अपनी पहली सैलरी में से 20 हजार रुपये लेकर मेरे सामने खड़ा था। मैंने पैसे लेने से मना कर दिया। आखिर वो मुझे मॉल ले गया। शॉपिंग कराई। तब जाकर उसका मन माना। आज भी कई बच्चे फोन पर मुझे ‘मां’ कहते हैं। नौकरी लगती है तो आशीर्वाद लेने के लिए फोन करते हैं। कोई नया काम शुरू करना हो तो सलाह लेते हैं। मुझे इससे ज्यादा और क्या चाहिए? मैंने जिंदगी में बहुत ताने सुने हैं। बहुत सहा है। लेकिन मुझे किसी को कोई सफाई नहीं देनी। ये बच्चे मुझे ‘मां’ कहकर लोगों को खुद-ब-खुद जवाब दे देते हैं। ——————————————— ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1-ब्लैकबोर्ड-पापा की चिता कब तक जलेगी, हमें खाना खाना है:अंतिम संस्कार के 5 हजार रुपए भेज दिए हैं, अस्थि विसर्जन भी किसी से करवा लेना तारीख- 4 अगस्त 2026। हरियाणा के सोनीपत का श्मशान घाट। दोपहर के करीब एक बजे का वक्त। एक चिता धधक रही थी। चारों तरफ भीड़ तो थी, लेकिन कोई अपना नहीं था। एक शख्स वीडियो कॉल पर था। पूरी खबर पढ़ें… 2-ब्लैकबोर्ड-नाचने से ज्यादा किसी के साथ सोकर कमा लेगी:बेटी को देखकर बोला- इसे भी साथ लाना; वो डांसर जो बिन शादी के मां बन गईं रात करीब डेढ़ बजे का वक्त था। तेज आवाज में गाने बज रहे थे। मैं घाघरा-चोली पहने स्टेज पर थी। 100 मर्दों के बीच नाच रही थी। तीन घंटे से नाचते-नाचते शरीर थक चुका था। भीड़ से एक मर्द स्टेज पर चढ़ आया। दुपट्टा खींचा और कमर में हाथ डाल दिया। मैं घबरा गई। पूरी खबर पढ़ें…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *