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पीट-पीटकर बेहोश किया, फिर पेशाब पिला दी:वो खतरनाक जासूस जो दुश्मनों का रक्षामंत्री बनने वाला था, लेकिन… पार्ट-1




दो हट्टे-कट्टे फौजी 40-42 साल के एक शख्स को घसीटते हुए ले जा रहे थे। वह बिल्कुल सुन्न पड़ चुका था। आधा किलोमीटर घसीटने के बाद फौजियों ने उसे एक अंधेरी कोठरी में ले जाकर पटक दिया। उसका सिर दीवार से टकराया, माथे की चमड़ी फट गई। फर्श पर खून बहने लगा। ‘सूअर कहीं का, मुंह कब खोलेगा यह?’ एक फौजी ने उस शख्स पर थूकते हुए कहा। दूसरा चिल्लाया- ‘चिंता मत करो लेफ्टिनेंट, बिजली के झटके लगेंगे, तो सब बक देगा।’ उसने पैरों से मारकर उसे पीठ के बल घुमा दिया। फिर जेब से शराब की बोतल निकाली और उसके शरीर पर उड़ेल दी। वह तड़प उठा। हाथ-पैर पटकने लगा। दोनों फौजी उसके ऊपर कूदने लगे। कोठरी चीखों से गूंज उठी। फिर एक फौजी ने अपने पैंट की जिप खोली और उसके ऊपर पेशाब कर दिया। इसके बाद दोनों फौजी दरवाजा बंद करके बाहर निकल गए। वह शख्स फर्श पर पड़ा रहा। उसके मुंह और नाक में पेशाब भर गया था। कुछ देर बाद उसने आंखें खोलीं। दर्द इतना मानो उसकी पुतलियों में करंट दौड़ गया हो। उसने पैर खींचने की कोशिश की, लेकिन वे बर्फ की सिल्लियों से बंधे थे। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। जैसे हर सांस के साथ पसलियों में कोई चाकू घोंप रहा हो। वह फेफड़ों को आधा भरकर छोटी-छोटी सांस लेने लगा। थोड़ी राहत मिली, तो उसके दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं। वो लम्हे और चेहरे आंखों में उतर आए, जो उसे इस मोड़ तक ले आए थे। इस शख्स का नाम था- ‘एली कोहेन’। दुनिया का सबसे खतरनाक जासूस। जो अपने फन में इतना माहिर था कि सीधे दुश्मन मुल्क के राष्ट्रपति से दोस्ती कर ली। यही नहीं, वह उस मुल्क का उप रक्षामंत्री भी बनने वाला था। बात 1960 की है। जगह- इजराइल का तेल अवीव। एक सुबह एली अपने दफ्तर में था। किसी ने दरवाजा खटखटाया, ‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’ ‘हां, आइए। बैठिए,’ उसने पास रखी कुर्सी की तरफ इशारा किया। ‘मेरा नाम जलमैन है। इंटेलिजेंस अफसर हूं।’ ‘इंटेलिजेंस अफसर?’ जलमैन ने सिर हिलाया, ‘हां, बहुत दिलचस्प काम है।’ ‘मुझसे क्या चाहते हैं?’ ‘हम आपको एक पद देना चाहते हैं।’ ‘कैसा पद?’ ‘दिलचस्प काम है। दुनिया घूमने का मौका मिलेगा।’ एली हंसने लगा- ‘मेरी अभी-अभी शादी हुई है। अभी तो ज्यादा से ज्यादा वक्त पत्नी को देना है। वैसे भी, मैं तीन जन्मों के बराबर घूम चुका हूं।’ ‘आपकी तनख्वाह दोगुनी कर दें तो?’ ‘तो भी नहीं।’ जलमैन उठा और जाते-जाते बोला- ‘इस मुलाकात का जिक्र किसी से मत करना… नादिया से भी नहीं।’ एली खिड़की की तरफ बढ़ा और बाहर झांका। सड़क पार कर रहे जलमैन ने एली की तरफ देखते हुए अपनी गर्दन पर ‘कट’ का इशारा किया। एली का दिल धड़का… ‘ये आदमी चाहता क्या है।’ एक महीने बाद…एली को तनख्वाह का चेक मिला। इस बार साथ में एक लिफाफा भी था। उसमें लिखा था- ‘कंपनी घाटे में है। आप कोई और नौकरी तलाश लीजिए। 20 दिन बाद आपकी सर्विस खत्म हो जाएगी।’ एक पल में एली बेरोजगार हो गया। वह खोया-खोया रहने लगा। पत्नी नादिया से भी बातचीत कम कर दी। एक रोज बालकनी में टहलते हुए उसे कागज का टुकड़ा मिला। उस पर लिखा था- ‘फैसला तुम्हारा है- या तो भुखमरी चुन लो, या हमारी दुनिया। तुम्हारे पास सिर्फ दो घंटे हैं।’ थोड़ी देर बाद एली पीले रंग की एक इमारत के सामने खड़ा था। एक आदमी आया और उसे लेकर दूसरी मंजिल पर चला गया। कमरे में पहले से एक शख्स बैठा था। गहरा नीला चश्मा पहने। उसने हाथ मिलाते हुए कहा- ‘यित्जाक… यही मेरा नाम है। इत्तेफाक से यह असली भी है।’ एली मुस्कुराया। यित्जाक उठा, पीछे रखी अलमारी के पास गया और उसमें से कुछ आम चीजें निकालीं। उन्हें मेज पर फेंकते हुए कहा, ‘इन्हें एक मिनट तक देखिए, फिर आंखें बंद करके याद करना कि आपने क्या देखा।’ मेज पर पेंसिल, इरेजर, पिन, पेपर-क्लिप और दफ्तर में इस्तेमाल होने वाले कुछ सामान बिखरे पड़े थे। एली ने गौर से देखा और आंखें बंद कर लीं। फिर एक-एक करके सब बता दिया। यित्जाक हैरान था, ‘आपकी याददाश्त तो कमाल की है!’ एली फिर मुस्कुरा दिया। कुछ हफ्तों तक एली की ट्रेनिंग चली। उसने जल्द ही जासूसी की तरकीबें सीख लीं। अब उसे नया नाम मिला- ‘मार्सेल कूबन।’ एली ने अपने हैंडलर से पूछा- ‘कब से काम करना है।’ जवाब मिला- ‘कल सुबह से।’ एली मुस्कुराया और जाने के लिए मुड़ा, लेकिन दरवाजे के पास जाकर वह रुक गया। धीरे से कहा- ‘मेरी पत्नी पेट से है। नौवां महीना चल रहा है। क्या हम कुछ दिन इंतजार नहीं कर सकते?’ हैंडलर ने कहा- ‘बच्चे के जन्म का समय तय नहीं होता। तुम्हें एक दिन, एक हफ्ता या एक महीना भी इंतजार करना पड़ सकता है। हम बच्चे के लिए अपना मिशन नहीं टाल सकते।’ एली चुपचाप बाहर निकल गया। वह उस रोज जल्दी घर पहुंच गया। नादिया रात का खाना बना रही थी। एली ने पीछे से आकर उसकी गर्दन पर किस किया, फिर उसे अपनी तरफ घुमाया। अपना सिर उसके उभरे हुए पेट पर टिका दिया। ‘नादिया, तुम्हें क्या लगता है, कब तक होगा?’ नादिया मुस्कुराई और अपने पेट पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘आप इस महीने के अंत तक पापा बन जाएंगे।’ ‘तुम दो हफ्तों से मुझे पापा बनाने वाली हो, लेकिन मैं अब भी सिर्फ एक पति ही हूं।’ उसने अपनी उंगलियां एली के घुंघराले बालों पर फेरते हुए कहा, ‘चिंता मत करो, एली। मैं भी चाहती हूं कि यह जल्दी हो जाए।’ एली हंसने लगा। ‘क्या तुमने कभी सोचा है कि अपने अंदर एक नन्ही सी जान लेकर घूमना कैसा लगता है?’ नादिया ने तंज कसा। एली बिना कुछ कहे बेडरूम में चला गया। उसने एक छोटे सूटकेस में कुछ कमीजें और दो जोड़ी अंडरवियर रखे, और फिर आकर खाने की टेबल पर बैठ गया। उसने धीरे से कहा, ‘कल मुझे यरूशलम जाना है।’ एली ने नादिया की भूरी आंखों में झांका, ‘मैं इस वक्त तुम्हारे साथ ही रहना चाहता था, लेकिन मेरे पास कोई रास्ता नहीं है।’ नादिया चुपचाप अपना काम करती रही। ‘तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही?’ ‘क्या तुम चाहते हो कि मैं रोऊं ताकि तुम्हें रोक सकूं?’ नादिया का गला दुख से भर्रा गया। ‘तुम बात को ज्यादा बढ़ा रही हो। बस एक हफ्ते या दस दिनों की बात है। मां तुम्हारी मदद के लिए आ जाएंगी। मैं हमारे बच्चे के जन्म से पहले लौट आऊंगा।’ ‘क्या तुम्हें कुछ दिनों की छुट्टी नहीं मिल सकती?’ नादिया ने कहा। ‘अभी तो नहीं,’ एली ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। नादिया चुपचाप दूसरे कमरे में चली गई। अगली सुबह एली चुपचाप उठा और टैक्सी स्टैंड की तरफ चल पड़ा। रास्ते में वह सोचते हुए जा रहा था- पता नहीं मैं कौन सी दुनिया में आ चुका हूं। यह भी नहीं पता कि मुझे कहां भेजा जाएगा। शायद कोई अरब मुल्क हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो मैं बदला जरूर लूंगा। उसके दिमाग में पुराना मंजर तैरने लगा- ‘बात 1954 की झुलसती गर्मियों के दिनों की है। जब लंदन में बैठे बुजुर्ग चर्चिल ने मिस्र से ब्रिटिश फौज हटाने का मन बनाया। इजराइल परेशान हो गया। ब्रिटिश सेना का हटना यानी अरब देशों की नफरत का सीधा रुख इजराइल की तरफ मुड़ जाना। इस तूफान को रोकने के लिए इजराइल ने एक खतरनाक दांव खेला- ‘ऑपरेशन इजिप्ट’। मकसद साफ था- मिस्र के अंदर बम धमाके और तोड़फोड़ करके माहौल इतना बिगाड़ देना कि अंग्रेज वहां से हटने के बारे में सोचे ही नहीं। इस खतरनाक खेल की कमान सीक्रेट एजेंटों और तीस साल से कम उम्र के यहूदी युवाओं के हाथों में थी। इन्हीं में एक नौजवान एली कोहेन भी शामिल था। जुलाई का महीना आया और ‘ऑपरेशन इजिप्ट’ से जमीन दहल उठी। साबुन के डिब्बों में छिपे बारूद से मिस्र की राजधानी काहिरा में कोहराम मच गया। आग की लपटें अमेरिकी दूतावास तक भी पहुंच गई। फिर आया 16 जुलाई का वह दिन। अलेक्जेंड्रिया के रियो सिनेमाघर के बाहर अफरा-तफरी मची थी। अचानक एक नौजवान तड़प कर जमीन पर गिर पड़ा। उसकी जेब से धुआं निकल रहा था। उसका बनाया चश्मे के डिब्बे वाला बम वक्त से पहले ही उसकी जेब में फट गया था। ‘तुम्हारा नाम क्या है, लड़के?’ मिस्र के एक खुफिया एजेंट ने उसकी जेब से सुलगता डिब्बा खींचते हुए पूछा। ‘फिलिप नथान्सन…’ उसने दर्द से कराहते हुए कहा। ‘चलो थाने फिलिप, काहिरा में तुम्हारे दोस्तों का इलाज भी अब हम ही करेंगे।’ एक-एक करके ग्यारह लोग दबोच लिए गए। जासूसी का उस्ताद डॉ. मैक्स बेनेट ने टॉर्चर से तंग आकर अपनी नसें काट लीं। वह मर गया। जब यह खबर एली कोहेन तक पहुंची तो वह फौरन अपने घर की ओर भागा। सांस फूल रही थी। वह बुरी तरह हांफ रहा था। उसने अलमारी में रखे सारे खुफिया दस्तावेज जलाकर राख कर दिए। अपनी रिवॉल्वर छिपा दी। अगली ही सुबह उसके दरवाजे पर पुलिस आ धमकी। एली ने हर सवाल को इस तरह झुठलाया कि सबूत न मिलने पर पुलिस को उसे छोड़ना पड़ा। 17 जनवरी 1955 को अदालत का फैसला आया- एली के दो करीबी दोस्तों को सजा-ए-मौत का हुक्म जारी हुआ। फिर आई 21 जनवरी की वह काली सुबह। जेल के अहाते में फांसी के दो फंदे लटक रहे थे। सन्नाटे को चीरते हुए मार्जोक और अजर के कदम आगे बढ़े। अगले ही पल वे दोनों फंदों पर झूल गए। अगले दिन अखबार में छपी लटकती लाशों की तस्वीरों ने पूरे इजराइल को हिलाकर रख दिया। अखबार हाथ में लिए एली की आंखों में आंसू थे और सीने में आग जल रही थी। उसने कसम खाई- ‘हिसाब बराबर करूंगा।’ फ्लैशबैक से निकलने के बाद यरूशलम जाने वाली टैक्सी में बैठा एली मन ही मन बुदबुदाया- ‘लगता है बदले का टाइम आने वाला है।’ कुछ देर बाद वो होटल पहुंच गया। यरूशलम का सबसे आलीशान होटल- ‘किंग डेविड होटल’। बड़े लोगों का ठिकाना। सियासत से लेकर बिजनेस तक, दुनिया भर के दिग्गज यहां ठहरते थे। एक हफ्ते तक एली यरुशलम में इधर-उधर घूमता रहा। कभी रात को सड़कों पर निकल जाता, तो कभी मूवी देखने चला जाता। ज्यादतर मूवी वो बीच में ही छोड़ देता था। कहीं टिक कर बैठना उसके बस की बात नहीं थी। एक रात वह जैसे ही होटल पहुंचा, मैनेजर ने मैसेज दिया- ‘तुरंत ऑफिस में कॉन्टैक्ट करो।’ उसने कमरे में जाकर रिसीवर उठाया और डायल घुमाया। दूसरी तरफ यित्जाक की आवाज आई- ‘तुम अब तक कहां थे? हम दो घंटे से तुम्हें ढूंढ़ रहे हैं।’ ‘एक पार्टी में था। बीच में कैसे भाग आता?’ ‘तुम अभी सोने नहीं जा रहे हो। तुरंत निकलने की तैयारी करो।’ ‘क्या आपको पता है कि अभी समय क्या हो रहा है?’ ‘सवाल मत पूछो, होटल के बाहर काली टोपी पहने ड्राइवर कार में तुम्हारा इंतजार कर रहा है।’ एली ने ओवरकोट पहना और बाहर निकल गया। कार सीधे एयरपोर्ट पहुंची। रनवे पर दो-सीटर विमान खड़ा था। एली अंदर बैठा और देखते ही देखते विमान आसमान में ओझल हो गया। ‘हम कहां जा रहे हैं?’ एली ने पायलट से पूछा। पायलट ने चिल्लाते हुए जवाब दिया- ‘हाइफा।’ चालीस मिनट की उड़ान के बाद विमान हाइफा पहुंच गया। दरवाजा खुलते ही भारी कोट और गहरे रंग की टोपी पहने दो आदमी विमान के अंदर घुसे। उन लोगों ने एली को दबोचा और नीचे खड़ी एक कार में जबरन बैठा दिया। कार चल पड़ी। रास्ते में एली ने कहा- ‘कहां ले जा रहे हो मुझे?’ बगल में बैठा आदमी चिल्लाया- ‘मुंह बंद रखो।’ ‘मुझे तो इस काम में मजा आने लगा है।’ एली ने मुस्कुराते हुए कहा। ड्राइविंग सीट पर बैठा आदमी बड़बड़ाया, ‘कल सुबह जेल में सड़ोगे।’ एली की धड़कन थम गई। ‘ क्या मकसद है आपका?’ ‘बेहतर होगा कि तुम न जानो।’ आदमी ने सिगरेट एली की तरफ बढ़ा दी। एली ने लंबा कश खींचा और अगली ही सांस में वह नींद में लुढ़क गया। जब उसकी आंख खुली, तो सिर के ठीक ऊपर तीखी रोशनी चुभ रही थी। गला सूखा था, होंठ रबड़ की तरह सख्त। हाथ-पैर बंधे हुए। वह घुटनों के बल रेंगते हुए कोने में रखे पानी के जग की ओर बढ़ा। तभी एक आदमी ने जग पर लात मार दी। पानी फर्श पर बह गया। ‘गुड मॉर्निंग, मार्सेल, तुम्हें मिस्र का व्यापारी बनाकर किसने यरुशलम भेजा? नकली पासपोर्ट के पीछे असली नाम क्या है?’ ‘मेरा नाम मार्सेल ही है। मैं एक टूरिस्ट हूं।’ ‘झूठ।’ यह कहकर पूछताछ करने वाला बाहर गया। थोड़ी देर बाद दो खूंखार चेहरों को लेकर लौटा- एक बाज जैसी आंखों वाला और दूसरा पहलवान। एली को नंगा करके बर्फीले पानी में धकेल दिया गया। उसके दांत किटकटाने लगे, शरीर नीला पड़ने लगा। ‘तुम्हारा असली नाम?’ ‘मार्सेल…’ एली के किटकटाते दांतों के बीच से वही जवाब निकला। फिर वह बेहोश हो गया। होश आया तो वह यरूशलम के उसी होटल में था। सब कुछ वैसा ही था। एली चौंका- ‘क्या मैं कोई बुरा सपना देख रहा था।’ दस दिन बाद, यित्जाक, एली से मिला। कहा- ‘दस दिनों की छुट्टी है- नादिया और बेटी के साथ बिताने के लिए।’ ‘बेटी?’ एली की आंखें चमक उठीं। यित्जाक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा- ‘अब से तुम्हारा नाम ‘कामेल अमीन ताबेथ’ है। परिवार सीरियाई और काम- अर्जेंटीना में कपड़ों का व्यापार।’ आगे चलकर कामेल ने शराब और लड़कियों की महफिल सजाना शुरू कर दिया। दुश्मन मुल्क में सबका फेवरेट बना और फिर सरेआम फांसी तक पहुंच गया… पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए पार्ट-2 में… ***** रेफरेंस :



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