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Dr. Ram Charan Column | Business Leadership Trust & Communication Tips


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3 घंटे पहले

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डॉ. राम चरण विश्व विख्यात लेखक और कई शीर्ष कम्पनियों के सलाहकार - Dainik Bhaskar

डॉ. राम चरण विश्व विख्यात लेखक और कई शीर्ष कम्पनियों के सलाहकार

हर सीईओ को आखिरकार यह सीखना ही पड़ता है कि बोर्ड के साथ संबंध महज एक औपचारिकता नहीं है। यह कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करता है। यही यह भी तय करता है कि लीडरशिप वास्तव में कितनी स्थिर है। विश्वास ही इसकी बुनियाद है। बोर्ड के साथ विश्वास अटूट होना चाहिए। इसका मतलब महज सहमति नहीं है। इसका मतलब है सम्मान और समय के साथ विकसित हुई वास्तविक, पारस्परिक समझ।

जब यह विश्वास टूटता है- चाहे वह बोर्ड के भीतर हो या बोर्ड और सीईओ के बीच या मैनेजमेंट टीम के भीतर- तो नुकसान शायद ही कभी छोटा होता है। अकसर यह बेहद गंभीर होता है और लंबे समय तक बना रहता है। इसीलिए, संवाद का रास्ता खुला रखें। बोर्ड को उन जानकारियों तक पहुंच होनी चाहिए, जो वास्तव में मायने रखती हैं।

इसका मतलब रोजमर्रा के कामकाज पर नियंत्रण नहीं, बल्कि कारोबार में वास्तव में क्या हो रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी होना है। पारदर्शिता ही शुरुआत में विश्वास पैदा करती है। और यही बोर्डरूम में बेहतर फैसलों की ओर ले जाती है। यह फैसले लेने की प्रक्रिया को धीमा नहीं करती।

बेहतरीन सीईओ अपने बोर्ड को जानकारी देने के लिए तिमाही बैठक का इंतजार नहीं करते। वे संक्षिप्त और सारगर्भित अपडेट देने की एक नियमित व्यवस्था बनाते हैं, ताकि कोई भी बात अचानक सामने न आए। यह दोनों तरफ से काम करता है। बोर्ड को प्रतिक्रिया देने, सवाल उठाने और अपना दृष्टिकोण रखने के लिए प्रोत्साहित करें। यही संवाद सीईओ को इस बात से वास्तविक रूप से जोड़े रखता है कि बोर्ड कंपनी को किस दिशा में ले जाना चाहता है।

आपके बोर्ड को कुछ ऐसी बातें पता होती हैं, जो आपको नहीं पता। बहुत से सीईओ बोर्ड को एक ऐसे समूह के रूप में देखते हैं, जिसे मैनेज करना है, जिसे रिपोर्ट देना है और जिससे एक सुविधाजनक दूरी बनाए रखनी है। लेकिन यह एक गलती है।

बोर्ड के सदस्यों के पास अलग-अलग उद्योगों और परिस्थितियों में काम करने का दशकों का अनुभव होता है, जिनमें से कई परिस्थितियों का सीईओ ने शायद कभी सीधे सामना न किया हो। इस अनुभव का सही इस्तेमाल किया जाए तो यह रणनीतिक योजना बनाने में एक बड़ी पूंजी बन सकता है और वास्तविक संकट के समय तो और मूल्यवान साबित हो सकता है।

यही कारण है कि बोर्ड सदस्यों की प्रतिक्रिया को गंभीरता से लें। इसका इस्तेमाल रणनीति को और धार देने तथा उसके क्रियान्वयन को और मजबूत करने में करें। सबसे बेहतर गवर्नेंस ऊपर से नीचे की ओर चलने वाली व्यवस्था नहीं होती। वह सहयोगात्मक होती है।

औपचारिक बोर्ड बैठकें वास्तविक समझ विकसित करने की जगह नहीं होतीं। यह समझ उन बातचीत में बनती है, जो बैठक से पहले और बाद में होती हैं- जहां किसी निदेशक की वास्तविक चिंताएं और प्राथमिकताएं सामने आती हैं।

समय निकालकर यह समझने की कोशिश करें कि बोर्ड का हर सदस्य किन बातों को महत्व देता है और क्यों। इससे आपको उन टकरावों से बचने में मदद मिलेगी, जिनका आपको पहले से कोई अंदाजा नहीं था और जब बड़े फैसलों का समय आएगा, तब आपसी सहमति कायम करना भी कहीं आसान होगा।

गवर्नेंस और उद्योग के रुझानों पर संयुक्त सत्र भी मददगार होते हैं। जो बोर्ड बदलते परिदृश्य से लगातार अपडेट रहता है, वह सिर्फ निगरानी करने वाला बोर्ड नहीं रहता, बल्कि वास्तविक मूल्य जोड़ता है। बोर्ड को कुशलता से संभालना यथास्थिति को बचाए रखने के बारे में नहीं है।

यह इस रिश्ते को वास्तविक रणनीतिक बढ़त में बदलने के बारे में है। यही कारण है कि विश्वास कायम करें। पूरी पारदर्शिता के साथ संवाद करें। बोर्ड को महज एक चेकपॉइंट नहीं, बल्कि साझेदार के रूप में साथ लेकर चलें। इसे सही ढंग से किया जाए तो यह केवल गवर्नेंस की एक जिम्मेदारी नहीं रह जाती। यह कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए सीईओ के पास मौजूद सबसे महत्वपूर्ण, लेकिन सबसे कम इस्तेमाल किए जाने वाले साधनों में से एक बन जाती है।

बोर्ड को उन जानकारियों तक पहुंच होनी चाहिए, जो वास्तव में मायने रखती हैं। इसका मतलब रोजमर्रा के कामकाज पर नियंत्रण नहीं, बल्कि कारोबार में वास्तव में क्या हो रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी होना है। पारदर्शिता ही शुरुआत में विश्वास पैदा करती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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