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नेपाल बाढ़ में बहे आनंद का 15 दिन बाद अंतिम-संस्कार:चिता पर लेटा कुश का पुतला, पिता ने दी मुखाग्नि; पत्नी अब भी कर रही इंतजार




चिता पर लेटा कुश का पुतला। आसपास खड़े लोगों की नम आंखें और गले से निकलती सिसकियां। कोई अंतिम विदाई दे रहा था तो कोई उस शख्स को याद कर रहा था, जिसका 15 दिन से कोई पता नहीं है। ये नजारा मोतिहारी के सुगौली प्रखंड के दक्षिणी मनसिंघा पंचायत के मुसवा गांव का है। 26 अगस्त को नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ में त्रिशूली नदी के बहाव में 40 साल के आनंद सहनी लापता हो गए थे। 15 दिन तक नेपाल से लेकर भारत तक तलाश करने के बाद भी जब उनका कोई सुराग नहीं मिला तो परिवार ने उन्हें मृत मानकर कुश का पुतला बनाया और अंतिम संस्कार कर दिया। जिस घर में आनंद के लौटने की राह देखी जा रही थी, वहां अब मातम है। पिता महेंद्र सहनी बिस्तर पर पड़े बेटे का इंतजार कर रहे हैं। पत्नी सविता देवी की आंखों से आंसू थम नहीं रहे। तीन बेटे और एक बेटी बार-बार पिता को याद कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच परिवार के मन में एक उम्मीद अभी भी जिंदा है कि आनंद कहीं से लौट आएंगे। ‘छठ में आएंगे… बच्चों और बाबूजी का ख्याल रखना’ दरवाजे पर बैठी आनंद की पत्नी सविता देवी रोते हुए कहती हैं कि 26 अगस्त की सुबह ही पति से आखिरी बार बात हुई थी। उस बातचीत को याद करते हुए उनकी आवाज भर आती है। उन्होंने बताया, “26 अगस्त की सुबह उनका फोन आया था। बड़े प्यार से बात की और बोले- बच्चे और बाबूजी का अच्छे से ख्याल रखना। हम छठ में आएंगे। किसी बात की चिंता मत करना, सब ठीक हो जाएगा। उसके बाद फोन कट गया। फिर फोन आया कि त्रिशूली नदी में बाढ़ आई है और सब कुछ बहाकर ले गई है।” सविता बताती हैं कि इसके बाद परिवार ने लगातार आनंद की तलाश शुरू की। नेपाल में रिश्तेदारों और परिचितों से संपर्क किया गया। जहां से भी कोई सूचना मिलती, परिवार के लोग वहां पहुंचने की कोशिश करते। लेकिन 15 दिन बीत जाने के बाद भी आनंद का कोई सुराग नहीं मिला। इसके बावजूद पत्नी को भरोसा है कि उनके पति जिंदा हैं और एक दिन अचानक घर के दरवाजे पर खड़े मिलेंगे। 5-6 साल से नेपाल में कबाड़ का काम करते थे आनंद आनंद सहनी पिछले करीब 5-6 सालों से नेपाल में रहकर कबाड़ का काम करते थे। इसी काम से मिलने वाली कमाई से परिवार का खर्च चलता था। गांव में परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। आनंद की कमाई से ही पिता की दवा, बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलता था। आनंद के पिता महेंद्र सहनी अब बिस्तर पर हैं। वे बताते हैं कि पहले वे भी मजदूरी कर बेटे की मदद करते थे, लेकिन लकवा मारने के बाद से चलने-फिरने में असमर्थ हैं। वह कहते हैं, “मेरे दो बेटे हैं। दोनों अलग रहते हैं। मैं छोटे बेटे आनंद के साथ रहता हूं। पहले मैं भी मजदूरी कर उसकी मदद करता था, लेकिन लकवा मारने के बाद से बेड पर पड़ा हूं। मेरी दवा, तीन बच्चों की पढ़ाई और परिवार की पूरी जिम्मेदारी आनंद के कंधे पर थी। उसके जाने से परिवार के सामने अंधेरा छा गया है। अब मेरी दवा कैसे चलेगी, बच्चे क्या खाएंगे?” पिता की आवाज में बेटे के खोने का दर्द ही नहीं, बल्कि आने वाले दिनों की चिंता भी साफ दिखाई देती है। चिता के सामने खड़ा 10 साल का बेटा… उसे अब भी पापा के लौटने का इंतजार आनंद सहनी के तीन बेटे और एक बेटी हैं। सबसे बड़ी बेटी अपनी मां के साथ घर के काम में हाथ बंटाती है। परिवार के लिए सबसे मुश्किल वक्त बच्चों के सामने पिता के नहीं होने का है। अंतिम संस्कार के दौरान आनंद का 10 साल का सबसे बड़ा बेटा चिता पर रखे कुश के पुतले को टकटकी लगाकर देखता रहा। आसपास मौजूद लोग रो रहे थे, लेकिन बच्चे के मन में अब भी यही सवाल था कि उसके पापा कहां हैं। परिवार के लोगों के मुताबिक, बच्चे को अभी भी पूरी तरह विश्वास नहीं हो रहा कि उसके पिता अब वापस नहीं आएंगे। उसे उम्मीद है कि उसके पापा कहीं से लौटकर जरूर आएंगे। ‘भारत एंबेसी से लेकर नेपाल तक ढूंढा, कहीं पता नहीं चला’ आनंद के साले सुकुल साहनी भी नेपाल में ही काम करते थे। उन्होंने बताया कि दोनों अलग-अलग जगहों पर काम करते थे और आनंद उनके काम करने की जगह से करीब 9 किलोमीटर आगे रहते थे। सुकुल ने बताया, “जैसे ही बाढ़ का पता चला, आनंद को फोन किया, लेकिन फोन नहीं लगा। घर पर फोन किया तो पता चला कि सुबह बात हुई थी। अगले दिन से उसकी तलाश शुरू कर दी। भारत एंबेसी से लेकर नेपाल तक हर जगह ढूंढा, लेकिन कहीं पता नहीं चला।” उन्होंने बताया कि लगातार तलाश के बाद भी आनंद का कोई सुराग नहीं मिला। परिवार के सामने अब कोई ठोस जानकारी नहीं थी। इसी वजह से आखिरकार परिजनों ने भारी मन से कुश का पुतला बनाकर उसका अंतिम संस्कार किया। लेकिन अंतिम संस्कार के बाद भी परिवार के मन से आनंद के लौटने की उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 15 दिन की तलाश के बाद उठाया अंतिम संस्कार का कदम परिवार के लिए सबसे मुश्किल फैसला यह था कि जिस व्यक्ति का शव तक नहीं मिला, उसका अंतिम संस्कार कैसे किया जाए। लेकिन 15 दिनों तक लगातार तलाश के बाद भी कोई जानकारी नहीं मिली तो परिजनों ने आनंद को मृत मानकर कुश का पुतला बनाया। अंतिम संस्कार के दौरान पूरा गांव भावुक हो गया। चिता के पास खड़े परिजन लगातार रोते रहे। किसी को आखिरी बार आनंद का चेहरा भी देखने को नहीं मिला। परिवार के लिए यह विदाई भी अधूरी है, क्योंकि उन्हें आज तक यह पता नहीं कि बाढ़ के बाद आनंद के साथ वास्तव में क्या हुआ। परिवार की मांग- आपदा पीड़ित घोषित कर मिले सरकारी सहायता परिजनों ने सरकार से मांग की है कि नेपाल की त्रासदी में लापता और मृत लोगों के मामलों को संवेदनशीलता से देखते हुए प्रभावित परिवारों को नियमानुसार आर्थिक सहायता दी जाए। परिजनों का कहना है कि आनंद परिवार के लिए अकेले कमाने वाले व्यक्ति थे। उनके लापता होने के बाद घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। पिता बीमार हैं, बच्चों की पढ़ाई है और परिवार की अन्य जरूरतें भी हैं। ऐसे में सरकार से मिलने वाली सहायता परिवार के लिए बड़ी मदद साबित हो सकती है। ‘आनंद ही परिवार का सहारा था, अब परिवार असहाय’ पंचायत समिति सदस्य विनोद सहनी ने कहा कि आनंद सहनी परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। नेपाल में काम कर वे अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके लापता होने से परिवार पूरी तरह असहाय हो गया है। उन्होंने राज्य सरकार से मामले को गंभीरता से लेते हुए परिवार को नियमानुसार आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है। मुसवा गांव में अब भी आनंद के घर का दरवाजा उनकी राह देख रहा है। पिता की आंखें बेटे के लौटने की उम्मीद में दरवाजे पर टिकी हैं। पत्नी उस आखिरी फोन कॉल को याद कर रही हैं, जिसमें आनंद ने कहा था- “छठ में आएंगे… किसी बात की चिंता मत करना।” छठ आने में अभी वक्त है, लेकिन परिवार को उस वादे का इंतजार आज भी है।



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