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पंजाब की पॉलिटिक्स में गैंगस्टर्स की कहानी:AAP में सेखों की एंट्री पर विपक्ष मुद्दा बना रहा; जानिए किन गैंगस्टरों ने रखा राजनीति में कदम




पंजाब की राजनीति में गैंगस्टरों का दबदबा लंबे समय से रहा है। गैंगस्टर्स को राजनीतिक दलों और नेताओं का सीधा संरक्षण मिलता रहा। जसविंदर सिंह भुल्लर जैसे कई गैंगस्टर राजनीति में आए, जबकि जग्गू भगवानपुरिया जैसों ने अपने परिवार को आगे किया। हालांकि, पंजाब की राजनीति में गैंगस्टर या उनके करीबी कोई बड़ा चुनाव नहीं जीते। गैंगस्टर पृष्ठभूमि के लोगों को पंजाब की जनता ने नकारा। उनमें से कोई भी विधानसभा तक नहीं पहुंच पाया। पंजाब की राजनीति में हाल ही में गैंगस्टर पृष्ठभूमि के गुरप्रीत सिंह सेखों ने आम आदमी पार्टी (AAP) में एंट्री की है। उसे मुख्यमंत्री भगवंत मान ने खुद भरे समारोह में पार्टी में शामिल किया। गुरप्रीत सिंह सेखों के खिलाफ 47 केस दर्ज हैं। उसके AAP में शामिल होने पर विरोधियों ने इसे मुद्दा बनाना शुरू कर दिया। अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों की तरफ से पंजाब में गैंगस्टरवाद को चुनावी मुद्दा बनाने की घोषणा भी की जा चुकी है। इसके बाजवूद गैंगस्टर पृष्ठभूमि के लोगों की पॉलिटिक्स में एंट्री हो रही है। 1. प्रभजिंदर सिंह बराड़ उर्फ डिंपी चंदभान पंजाब में गैंगस्टर और राजनीति के गठजोड़ की शुरुआती नींव पंजाब में अपराध और राजनीति के गठजोड़ को समझने के लिए सबसे पहला और अहम नाम प्रभजिंदर सिंह बराड़ उर्फ डिंपी चंदभान का आता है। फरीदकोट जिले के चंदभान गांव के रहने वाले डिंपी को राज्य के शुरुआती बड़े गैंगस्टरों में गिना जाता है। डिंपी का नाम सबसे पहले 1985 में पंजाब यूनिवर्सिटी के चर्चित स्टूडेंट लीडर मक्खन सिंह की हत्या के मामले में सामने आया था। कानूनी प्रक्रियाओं और सबूतों के अभाव में उसे इस मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सका, लेकिन इस घटना ने उसे अपराध जगत में एक बड़ी पहचान दे दी। राजनीतिक नेटवर्क और 1989 का दौर 1980 के दशक के आखिर में जब पंजाब आतंकवाद और उग्रवाद के दौर से गुजर रहा था, डिंपी चंदभान ने अपने संबंधों का विस्तार राजनीतिक गलियारों तक करना शुरू कर दिया। उसके सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के साथ बेहद घनिष्ठ संबंध बने। 1989 के लोकसभा चुनावों में जब मान की पार्टी ने पंजाब में बेहतरीन प्रदर्शन किया, उसके बाद ही डिंपी खुद को एक स्थापित राजनीतिक चेहरे के रूप में पेश करने की कोशिश में था, लेकिन इसके ठीक बाद पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता, चुनावों के रद्द होने और उग्रवाद के खिलाफ पुलिस की जबरदस्त कार्रवाई ने उसके इरादों पर पानी फेर दिया। पुलिस की बढ़ती सख्ती के कारण डिंपी को पंजाब छोड़ना पड़ा और उसने उत्तर प्रदेश में अपना नया ठिकाना बनाया। वहां जाकर उसने मुख्तार अंसारी जैसे पूर्वांचल के बाहुबलियों और अंतरराज्यीय आपराधिक गिरोहों के साथ संबंध मजबूत किए। 2. जसविंदर सिंह भुल्लर उर्फ रॉकी फाजिल्का सीधे चुनावी मैदान में उतरने वाला गैंगस्टर डिंपी चंदभान की मौत के बाद उसके नेटवर्क को संभालने और पंजाब में सीधे विधानसभा चुनाव लड़ने की दिशा में सबसे बड़ा कदम जसविंदर सिंह भुल्लर उर्फ रॉकी फाजिल्का ने उठाया। रॉकी कभी डिंपी का बेहद खास हुआ करता था, लेकिन डिंपी की हत्या के बाद उसने फाजिल्का और आसपास के इलाकों में अपना स्वतंत्र आपराधिक साम्राज्य और राजनीतिक रसूख कायम किया। 2012 का फाजिल्का विधानसभा चुनाव लड़ा रॉकी का सबसे चर्चित कदम 2012 के पंजाब विधानसभा चुनावों में देखने मिला। उसने फाजिल्का सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन किया। उस समय राज्य की राजनीति में यह चर्चा जोरों पर थी कि उसे शिरोमणि अकाली दल के स्थानीय नेताओं और अंदरूनी तंत्र का समर्थन था। रॉकी ने अपने चुनावी अभियान में भारी अमला-जमला, महंगी गाड़ियां और युवाओं की फौज उतारी थी। जब चुनाव परिणाम आए, तो पूरे पंजाब के राजनीतिक हलके हैरान रह गए। रॉकी को भाजपा के वरिष्ठ नेता सुरजीत कुमार ज्याणी के मुकाबले केवल 1,700 से भी कम वोटों से हार का सामना करना पड़ा। यह पंजाब के चुनावी इतिहास में पहला मौका था जब संगीन धाराओं में नामजद कोई एक्टिव गैंगस्टर न केवल मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में उतरा, बल्कि जीत के इतने करीब पहुंचकर पूरी स्थापित व्यवस्था को चुनौती दी। 3. रॉकी फाजिल्का की बहन राजदीप कौर रॉकी की मौत के बाद परिवार की राजनीतिक दावेदारी रॉकी फाजिल्का की हत्या से उसका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उसकी मौत के बाद उसके परिवार ने उस राजनीतिक जमीन को भुनाने की कोशिश की जो रॉकी ने 2012 के चुनावों में तैयार की थी। रॉकी की बहन राजदीप कौर ने राजनीति में एंट्री की। 2017 विधानसभा चुनाव और अकाली दल में शामिल 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में रॉकी की बहन राजदीप कौर ने फाजिल्का सीट से अपनी किस्मत आजमाई। कांग्रेस से टिकट न मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय पर्चा भरा। अपने भाई के प्रति स्थानीय लोगों में मौजूद सहानुभूति और पुराने नेटवर्क के दम पर राजदीप कौर ने 38,000 से अधिक वोट हासिल किए। इसके बावजूद वह चुनाव नहीं जीत सकीं, लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि रॉकी परिवार का वोट बैंक अभी भी फाजिल्का में मौजूद था। 4. गुरप्रीत सिंह सेखों उर्फ सोनू मुदकी इसी की वजह से विवाद खड़ा हुआ वर्तमान समय में पंजाब की राजनीति में गैंगस्टर और सत्ताधारी दल के संबंधों को लेकर जो सबसे बड़ा विवाद खड़ा हुआ है, उसके केंद्र में गुरप्रीत सिंह सेखों उर्फ सोनू मुदकी है। फिरोजपुर जिले के मुदकी गांव का रहने वाला 49 वर्षीय सेखों एक संपन्न किसान परिवार से ताल्लुक रखता है। उसने फ्लाइट अटेंडेंट बनने का कोर्स किया था, लेकिन 2010 के आसपास वह शेरा खुब्बन और जयपाल भुल्लर के आपराधिक गिरोह में शामिल हो गया। नाभा जेल ब्रेक कर आया सेखों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती और आर्म्स एक्ट के करीब 47 मामले दर्ज रहे हैं। जनवरी 2015 में फगवाड़ा में पुलिस हिरासत के दौरान गैंगस्टर सुक्खा काहलवां की हत्या में सेखों का नाम प्रमुखता से आया था। हालांकि, वह सबसे ज्यादा सुर्खियों में तब आया जब नवंबर 2016 में उसने चर्चित नाभा हाई-सिक्योरिटी जेलब्रेक कांड को अंजाम दिया। सेखों न केवल इस कांड में जेल से भागने वाले कैदियों में से एक था, बल्कि पुलिस जांच के अनुसार वह जेल के भीतर से इस पूरी साजिश को रचने वाला मुख्य मास्टरमाइंड भी था। फरवरी 2017 में उसे मोगा के ढुडीके से दोबारा गिरफ्तार किया गया। बाद में सुक्खा काहलवां मर्डर केस में सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया गया, जबकि नाभा जेलब्रेक मामले में पटियाला कोर्ट ने उसे 10 साल की सजा सुनाई। नवंबर 2023 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा सजा निलंबित किए जाने के बाद वह जेल से बाहर आया। जेल से बाहर आने के बाद सेखों ने अपनी छवि बदलने का व्यापक अभियान चलाया। उसने दाढ़ी बढ़ा ली, धार्मिक पहचान अपनाई और खुद को समाजसेवी घोषित कर दिया। उसने गरीबों की शादियां करवाने, राशन बांटने और सड़कों की मरम्मत जैसे काम शुरू किए। सितंबर 2026 में AAP में एंट्री हुई पंजाब की राजनीति में सबसे बड़ा भूचाल 6 सितंबर 2026 को आया, जब फिरोजपुर के जीरा में आयोजित एक विशाल रैली में सूबे के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने खुद गुरप्रीत सिंह सेखों को पटका पहनाकर AAP में शामिल किया। पार्टी ने उसे जीरा निर्वाचन क्षेत्र का हलका प्रभारी भी नियुक्त किया। सेखों के इस राजनीतिक प्रवेश के बाद से ही राज्य की विपक्षी पार्टियों- कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा ने AAP सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में गैंगस्टरों पर वार का नारा देने वाली सरकार अब खुद अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण देकर सत्ता में बनाए रखना चाहती है। वहीं, सेखों के समर्थकों का तर्क है कि वह अपना आपराधिक अतीत छोड़कर अब पूरी तरह सुधर चुका है और समाज सेवा कर रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव में उसके जीरा सीट से लड़ने की प्रबल संभावनाएं जताई जा रही हैं। 5. जग्गू भगवानपुरिया डेरा बाबा नानक बेल्ट में मजबूत पंजाब में गैंगस्टर-फैमिली पॉलिटिकल एंट्री का एक और उदाहरण गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया का परिवार है। जग्गू भगवानपुरिया खुद जेल में बंद है। उस पर सिंगर सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड सहित दर्जनों संगीन मामले दर्ज हैं। वह खुद सीधे चुनाव मैदान में नहीं उतरा, लेकिन उसके परिवार ने सीमावर्ती जिले गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक बेल्ट में अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ बना ली है। राजविंदर कौर उर्फ मासी का प्रभाव जग्गू भगवानपुरिया की मौसी को स्थानीय लोग मासी के नाम से जानते हैं। वह डेरा बाबा नानक क्षेत्र में एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती के रूप में उभरी हैं। वह डेरा बाबा नानक ब्लॉक समिति की चेयरपर्सन रह चुकी हैं। स्थानीय राजनीति में उनका प्रभाव इतना ज्यादा है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के स्थानीय नेता उनसे संपर्क बनाए रखते हैं। 6. जयपाल सिंह भुल्लर एनकाउंटर के बाद पिता की चुनावी राजनीति में एंट्री पंजाब का मोस्ट वांटेड गैंगस्टर जयपाल भुल्लर 40 से अधिक मामलों में नामजद था। जून 2021 में कोलकाता में वेस्ट बंगाल STF ने उसे एक एनकाउंटर में मार दिया। उसकी मौत के बाद उसके परिवार की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई। जयपाल भुल्लर के पिता भूपिंदर सिंह भुल्लर पंजाब पुलिस के सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर हैं। उन्होंने अपने बेटे की मौत के बाद मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा। पंजाब के वोटरों का मैसेज क्लियर पंजाब में डिंपी चंदभान से शुरू हुआ यह सिलसिला रॉकी फाजिल्का, जग्गू भगवानपुरिया के परिवार से होता हुआ अब गुरप्रीत सिंह सेखों तक पहुंच चुका है। कभी गुप्त संरक्षण देने वाले राजनीतिक दल अब सार्वजनिक मंचों पर इन चेहरों का स्वागत करने से भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। इन तमाम घटनाक्रमों के बीच पंजाब के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा सच यही रहा है कि राज्य की जनता ने कभी भी किसी सक्रिय या पूर्व गैंगस्टर को विधानसभा की चौखट नहीं लांघने दी। रॉकी फाजिल्का 2012 में बेहद करीब आकर हार गया, राजदीप कौर 2017 में विफल रहीं। हालांकि, AAP से जुड़े गुरप्रीत सेखों का रिजल्ट आना अभी बाकी है।



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