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Shekhar Gupta Column | China Russia India Global Perspective Analysis


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3 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

ब्रिक्स सम्मेलन में जो तीन ताकतवर नेता (शी, पुतिन, मोदी) इकट्ठे हुए, उनमें अतीत में तालमेल से ज्यादा अंतर्विरोध दिखता रहा है। दुनिया को देखने का उनमें से हर एक का अलग-अलग नजरिया है, और उनके प्रतिद्वंद्वी भी अलग-अलग हैं।

रूस चीन का साथी है, और कुछ हद तक उस पर निर्भर भी है। भारत चीन को अपने अस्तित्वगत प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। और चीन मानता है कि खेल के नियम खुद वह ही तय कर सकता है; और अम्पायर भी वही बन सकता है।

हमें मालूम है कि नाटो क्या है और किसलिए है। इसी तरह आप दूसरे समूहों को गिन सकते हैं। ब्रिक्स को ‘शांघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन’ (एससीओ) जैसा माना जा सकता है। लेकिन इस पर चीन का प्रभुत्व लगभग स्थापित है। यह चीन का एक बहुपक्षीय संगठन है।

यहां तक कि 57 देशों के बेमानी-से समूह ओआईसी (ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन) को जोड़ने वाली एक चीज तो है ही, और वह है इस्लाम। इसमें शक नहीं कि इस्लामी मुल्कों पर जो संकट आए, उनके बीच जितने युद्ध हुए, या आज अरब देशों और ईरान के बीच जो लड़ाई चल रही है, उन पर इस समूह को आपने अपना कोई दबदबा जताते नहीं देखा होगा।

सवाल उठाया जा सकता है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच क्या साझापन है? क्या यह ट्रम्प या अमेरिका के खिलाफ संयुक्त मोर्चा है? बिल्कुल नहीं। पुतिन और ट्रम्प तो एक-दूसरे की तारीफ करने वाली जोड़ी हैं। शी भी जल्द ही अमेरिका जाने वाले हैं और दोनों देशों के बीच जो भी खटास है, उसे दूर करने की कोशिश कर सकते हैं।

वे ट्रम्प को अपनी रणनीतिक मुहिम को अपने तक ही सीमित रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। वे उन्हें सलाह दे सकते हैं कि ताइवान को भूल जाइए। शी के लिए ट्रम्प सबसे बड़ा मौका हैं। वे अमेरिका के गठबंधनों को कमजोर कर रहे हैं।

इन गठबंधनों के कुछ देश अपने लिए खतरों को कम करने के लिए चीन की ओर मुड़ सकते हैं। तब चीन अपने लिए रियायतें बटोरेगा। दूसरे, कमजोर और छोटे देशों ने चीन को नए ‘दादा’ के रूप में देखना और सलाम करना शुरू कर दिया है।

शी कम-से-कम ट्रम्प की तरह खुलकर बेइज्जत तो नहीं करते। जहां तक रूस की बात है, वह शी की सीमा से सटी महाशक्ति है। दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार उसके पास ही हैं और पाइप से उपलब्ध एनर्जी के सुरक्षित स्रोत का वह मालिक है।

भारत की सीमाओं पर हमेशा तनाव और सेना की तैनाती रहती है। शी स्थिरता चाहते हैं ताकि व्यापार बढ़े। जैसा कि हमें मालूम है, भारत-चीन व्यापार एकतरफा मामला है। फिलहाल चीन का जो कुल व्यापार सरप्लस है, उसका करीब 10 फीसदी यानी 112 अरब डॉलर के बराबर भारत के हिस्से में है।

अमेरिका के साथ सरप्लस घट रहा है, इसलिए शी विकल्पों की तलाश में हैं। और भारत ने कदम आगे बढ़ा दिया है। चीन के जनसंख्या संबंधी संकट और घरेलू मांग में भारी गिरावट के कारण उसे उन व्यापार सरप्लस की ज्यादा जरूरत है। इसलिए शी ने भारत की सीमा से ध्यान हटा लिया है।

1988 में तंग श्याओपिंग ने बीजिंग में राजीव गांधी से कहा था कि हमारी पीढ़ी में सीमा विवाद को सुलझाने की बुद्धिमानी शायद नहीं है, सो हम इस मसले को भविष्य की ज्यादा बुद्धिमान पीढ़ी के लिए ही छोड़ दें। शी के लिए वह भविष्य शायद अभी नहीं आया है।

वे शायद और समय लेना चाहेंगे, जब तक चीन और भारत के बीच की खाई और चौड़ी हो जाए। इस बीच, पाकिस्तान तो उसके पाले में है ही, जो भारत का संतुलन बिगाड़ता रहेगा। शी की तरह पुतिन भी नाटो के कमजोर पड़ने से खुश हैं।

वे या तो यह उम्मीद कर रहे हैं कि यूक्रेन को लेकर कोई समझौता हो जाएगा और वे अपनी जीत का ऐलान कर देंगे, या तब तक लड़ते रहेंगे जब तक यूक्रेन को अमेरिकी मदद घटती जाएगी और यूरोप करवटें बदलने लगेगा। सार यह है कि न तो शी अमेरिका के खिलाफ दुनिया को एकजुट करने जा रहे हैं और न पुतिन ऐसे किसी दुस्साहस में शामिल होने जा रहे हैं।

शी के विपरीत, पुतिन को भारत से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन उनकी पहली ख्वाहिश शी की ख्वाहिश से भिन्न नहीं है, वे भी एकतरफा व्यापार संबंध चाहते हैं। भारत उनसे चीन को छोड़ बाकी सभी देशों के मुकाबले ज्यादा तेल खरीदने तथा इसके लिए उन्हें शुक्रिया कहने को तैयार है।

भारत रूस के हथियारों का सबसे बड़ा मौजूदा और भावी खरीदार बना रहने को तैयार है, खासकर तब जब प्रतिबंध खत्म कर दिए जाएंगे। तेल के बूते भी, भारत के साथ रूस का व्यापार सरप्लस 50 अरब डॉलर के बराबर है।

रूस एक उदार व्यापार साझीदार है और भारत को ऐसी डिफेंस टेक्नोलॉजी साझा करने को तैयार है, जो दूसरा कोई देश नहीं देना चाहेगा। लेकिन, अगर आप सोचते हैं कि पुतिन भारत को बराबरी की हैसियत वाला या रूस भारत को चीन के दर्जे वाला देश मानेगा तो अपना नजरिया बदल लीजिए।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इन्हीं समीकरणों के साये में हुआ। भारत इसमें सबसे शक्तिशाली पक्ष नहीं था। भारत आज भारी व्यापार घाटे को मंजूर करने को मजबूर है, क्योंकि उसे जिन चीजों की सख्त जरूरत है, उन्हें वह बाहर से खरीद रहा है।

उसका अधिकतर निर्यात थम जाएगा अगर चीन से कल-पुर्जे, सामग्री या थोक में रसायन नहीं आते हैं। चीनी आयातों का सबसे बड़ा पैरोकार भारतीय व्यवसाय व उद्योग जगत ही है। इसके अलावा, भारत को सीमा, ‘एलएसी’ पर शांति चाहिए।

चीन अमेरिका को दुश्मन नहीं, अपने बराबर मानना चाहता है। न ही अमेरिका भारत का दुश्मन है। एक के बाद एक, तीन भारतीय प्रधानमंत्रियों ने भारत-अमेरिका संबंधों को स्वाभाविक रणनीतिक साझीदारी बताकर उसका स्वागत किया है। और डॉलर के वर्चस्व के खात्मे की बात?

अमेरिकी डॉलर जब सिफर हो जाएगा तब क्या होगा? क्या ब्रिक्स नाम वाली करेंसी उसकी जगह लेगी? ब्रिक्स के 10 सदस्य देशों की कुल जीडीपी का योग 14.33 ट्रिलियन डॉलर है। चीन की अकेले की जीडीपी 20.85 ट्रिलियन डॉलर है।

मूल सदस्यों (भारत, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) की जीडीपी चीन के मुकाबले आधी (9.93 ट्रिलियन डॉलर) है। अगर आप अमेरिकी डॉलर का खात्मा चाहते हैं तो क्या आप चीनी मुद्रा युआन के युग में जीने को तैयार हैं?

शक्ति-संतुलनों में भारत कहां पर अपना मुकाम बनाएगा… चीन अमेरिका को दुश्मन नहीं, अपने बराबर मानना चाहता है। पुतिन को भी भारत से परेशानी नहीं है। लेकिन वे भी एकतरफा व्यापार संबंध ही चाहते हैं। अगर आप सोचते हैं कि पुतिन भारत को चीन के दर्जे वाला देश मानेंगे तो अपना नजरिया बदल लीजिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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