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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:हमेशा ही नकारात्मक बातें करना तो ठीक बात नहीं




हर चीज में मीनमेख निकालने वाले लोगों को जब प्रधानमंत्री मोदी ने ‘नाराज फूफा’ कहकर पुकारा तो मानो उन्होंने ऐसे लोगों की नब्ज पकड़ ली। हर परिवार में ऐसे लोग होते हैं, जो हर चीज में शिकायत ढूंढ लेते हैं। जाहिर है, मोदी का यह तंज वायरल होना ही था। विपक्षी नेताओं ने भी इसे अपने लिए अपमानजनक मानते हुए इसकी निंदा करने में देर नहीं लगाई। लेकिन अंतत: वे वही करने लगे, जिस ओर संकेत किया गया था। उन्होंने हर चीज की शिकायत शुरू कर दी। मसलन, पी. चिदंबरम ने खिन्न अंदाज में कहा कि ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन समय की बर्बादी था। अर्थशास्त्री सुरजीत सिंह भल्ला भी उनकी बात से सहमत दिखे और सुझाव दिया कि भारत को ब्रिक्स को छोड़कर पश्चिमी गठबंधनों से जुड़ जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि भारत की 7.8 प्रतिशत की विकास दर इतनी अच्छी भी नहीं थी कि उससे खुश हुआ जा सके। इस विचार को प्रस्तुत करने वाले एक लेख में कहा गया कि 40% कामगार अब भी कम उत्पादकता वाले कृषि क्षेत्र में फंसे हुए हैं। लेखक यह बताना भूल गए कि आजादी के समय तो 80% से अधिक कामगार कृषि क्षेत्र में “फंसे’ थे। वास्तव में, तेजी से होता शहरीकरण कृषि क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या लगातार कम कर रहा है। लेकिन ऐसा कहना तो गिलास को आधा भरा हुआ बताना होगा, जबकि आलोचकों को सिर्फ वही गिलास दिखाई देते हैं, जो आधे खाली हों। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री पर हर साल एक नया विशेषण गढ़ने का आरोप लगाया। फिर उन्होंने उन विशेषणों की सूची भी गिना दी- नाराज फूफा, दिमागी नक्सल, अर्बन नक्सल, खान मार्केट गैंग, आंदोलनजीवी आदि। लेकिन इन सबमें बड़ी तस्वीर कहीं छूट जाती है। भारत में निश्चित रूप से बहुत-सी समस्याएं हैं : नगर-निकायों की व्यवस्था चरमरा चुकी है, स्थानीय निकायों के स्तर पर भ्रष्टाचार बेलगाम है, प्राथमिक शिक्षा की हालत खस्ता है और युवाओं में बेरोजगारी संकट के स्तर तक पहुंच चुकी है। लेकिन हमारी अनेक उपलब्धियां भी हैं। ऐसे में जब आलोचकगण भारत की उन वास्तविक समस्याओं को भी सामने रखते हैं, जिन्हें ठीक करने की जरूरत है, तो उनका पूर्वग्रह उनकी विश्वसनीयता को कमजोर कर देता है। वैश्विक निवेश बैंक जेफरीज की 9 सितंबर 2026 को जारी एक रिपोर्ट ने दिखाया कि भारत जिस नई औद्योगिक क्रांति के दौर से गुजर रहा है, वह 2030 तक उसे छह क्षेत्रों में बड़ी ताकत बना देगी : अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और एयरोस्पेस। भारत अब सिर्फ रॉकेट लॉन्च नहीं कर रहा है, वह एक अंतरिक्ष उद्योग खड़ा कर रहा है। पर यह रिपोर्ट दोषदर्शियों का मूड शायद ही बेहतर कर पाए। रिपोर्ट कहती है कि भारत पहले ही दुनिया के अधिकांश देशों से अधिक सोलर सेल बनाता है। 2030 तक पूरी सोलर वैल्यू चेन का 90% भारत में तैयार होगा। भारत पहले से ही दुनिया में दोपहिया वाहनों का सबसे बड़ा निर्माता, कारों का तीसरा सबसे बड़ा निर्माता, सीमेंट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक, स्टील का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक, बसों का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता और सॉफ्टवेयर सेवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है। रियल-टाइम डिजिटल भुगतान के मामले में तो वह सबसे आगे है। चिदंबरम, खरगे आदि भी इससे अनभिज्ञ नहीं हैं, लेकिन वे नकारात्मक तस्वीर देखने पर ही आमादा मालूम होते हैं। कांग्रेस के विवेकशील नेताओं में से एक शशि थरूर ने चिदंबरम की बात का खंडन करते हुए कहा कि ब्रिक्स की मेजबानी करना हमारे लिए बड़े गौरव की बात थी। हम ग्लोबल साउथ के लिए एक महत्वपूर्ण मंच उपलब्ध करा रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, थरूर ऐसी पार्टी में हैं, जिसने उनकी पूरी क्षमता का कभी इस्तेमाल नहीं किया। भारत में यकीनन बहुत समस्याएं हैं, लेकिन हमारी अनेक उपलब्धियां भी हैं। ऐसे में जब आलोचकगण भारत की उन वास्तविक समस्याओं को भी सामने रखते हैं, जिन्हें ठीक करने की जरूरत है, तो उनका पूर्वग्रह उनकी विश्वसनीयता को कमजोर कर देता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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