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Madhya Pradesh Liquor Tender Case


एमपी में देशी शराब की थोक सप्लाई के टेंडरों में डिस्टिलरीज के बीच मिलीभगत और टेंडर फिक्सिंग की जांच अब भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) जारी रख सकेगा।

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हाईकोर्ट जबलपुर ने एसोसिएटेड अल्कोहल्स एंड बेवरेजेस लिमिटेड समेत अन्य डिस्टिलरीज की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इसके साथ ही CCI की जांच पर लगी अंतरिम रोक भी हटा दी गई है। अब आयोग जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाकर अंतिम आदेश जारी कर सकेगा।

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की पीठ ने गुरुवार को यह फैसला सुनाया। पूरा मामला भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वर्ष 2016-17 की ऑडिट रिपोर्ट के बाद सामने आया था।

रिपोर्ट में 2012-13 से 2016-17 के दौरान देशी शराब के सरकारी टेंडरों में अलग-अलग डिस्टिलरीज की बोलियों के बीच बेहद कम अंतर होने पर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद CCI ने वर्ष 2020 में मामले की जांच शुरू की। जांच के दौरान आबकारी विभाग के अधिकारियों के बयान दर्ज किए गए और संबंधित डिस्टिलरीज के परिसरों की तलाशी ली गई।

इस दौरान ‘एमपी डिस्टिलर्स एसोसिएशन’ नाम के वॉट्सऐप ग्रुप, ईमेल और अन्य डिजिटल सामग्री मिलने की बात सामने आई। महानिदेशक स्तर पर की गई जांच के बाद 1200 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट CCI को सौंपी गई।

डिस्टिलरीज ने कहा- पूरा कारोबार सरकार के नियंत्रण में

एसोसिएटेड अल्कोहल्स, ग्रेट गैलियन और ओएसिस डिस्टिलरीज समेत अन्य कंपनियों ने CCI की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कंपनियों का तर्क था कि प्रदेश में शराब के कारोबार का नियमन पूरी तरह राज्य सरकार और आबकारी विभाग के हाथ में है। लाइसेंस, उत्पादन, आपूर्ति, कीमत और कोटा तक सरकार तय करती है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा कानून के तहत CCI को जांच का अधिकार नहीं है।

आबकारी विभाग की ओर से भी इसी तरह का पक्ष रखा गया। विभाग ने बताया कि पूरी व्यवस्था सरकारी नियंत्रण में है और डिस्टिलरीज का मुनाफा भी करीब 10 से 15 प्रतिशत तक निर्धारित है। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।

कंपनियों की चार प्रमुख दलीलें, कोर्ट ने इस तरह दिया जवाब

  • शराब राज्य सरकार का विषय हैकोर्ट: आबकारी कानून के तहत लाइसेंस, निर्माण, बिक्री और राजस्व की व्यवस्था नियंत्रित होने से CCI का अधिकार समाप्त नहीं होता। प्रतिस्पर्धा कानून का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाली गतिविधियों की जांच करना भी है।
  • आबकारी विभाग ही पूरी व्यवस्था नियंत्रित करता हैकोर्ट: आबकारी विभाग की भूमिका मुख्य रूप से लाइसेंस और नियामकीय व्यवस्था तक सीमित है। कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधियों की जांच के लिए कोई स्वतंत्र नियामक संस्था नहीं है। इसलिए CCI की जांच के अधिकार को सिर्फ आबकारी नियंत्रण के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
  • CCI की कार्रवाई CAG रिपोर्ट के आधार पर शुरू हुईकोर्ट: CAG की रिपोर्ट को अंतिम सबूत नहीं माना गया है। यह जांच शुरू करने का आधार बनी। CCI ने केवल रिपोर्ट के आधार पर डिस्टिलरीज को दोषी नहीं माना, बल्कि उसके बाद महानिदेशक के माध्यम से स्वतंत्र जांच कर दस्तावेज और अन्य सामग्री जुटाई गई।
  • CCI की जांच को बाद में चुनौती दी गईकोर्ट: कंपनियों ने 4 अगस्त 2020 के शुरुआती आदेश को उसी समय चुनौती नहीं दी थी और जांच में सहयोग करती रहीं। महानिदेशक की रिपोर्ट आने और CCI में आगे की कार्यवाही शुरू होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

अब CCI की रिपोर्ट पर होगी आगे की कार्रवाई

हाईकोर्ट के आदेश का मतलब यह नहीं है कि डिस्टिलरीज को टेंडर फिक्सिंग या मिलीभगत का दोषी ठहरा दिया गया है। कोर्ट ने फिलहाल केवल यह तय किया है कि CCI को इस मामले की जांच करने का अधिकार है।

अब CCI महानिदेशक की जांच रिपोर्ट, उपलब्ध डिजिटल और दस्तावेजी सामग्री तथा संबंधित कंपनियों का पक्ष सुनकर मामले में अंतिम निर्णय करेगा। आयोग के आदेश से असहमति होने पर संबंधित कंपनियों के पास NCLAT में अपील का विकल्प रहेगा।

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