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- Jharkhand Manika Heroes | Niyamat Ansari & Shyama Singh Social Reform
4 घंटे पहले
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ज्यां द्रेज प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री व समाजशास्त्री
हम अक्सर चे ग्वेरा और महात्मा गांधी जैसे नायकों की प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने आराम की जिंदगी छोड़कर दूसरों की भलाई के लिए काम किया। लेकिन वैसे लोग भी नायक होते हैं, जिन्होंने खुद गरीबी में रहते हुए दूसरों की फिक्र की और उनकी मदद करने के जतन किए।
ऐसे लोग मुझे तो बहुत मिले हैं- मजदूर, रिक्शावाले, स्वास्थ्यकर्मी और अन्य। उनमें से बहुतों ने ज्यादा पढ़ाई नहीं की होती है। लेकिन मैंने उनमें सहानुभूति, शोषण की समझ और न्याय की गहरी भावना पाई है। आप उन्हें ‘सहज-क्रांतिकारी’ कह सकते हैं।
क्रांतिकारी से मेरा मतलब यह नहीं है कि वे व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे हैं। मेरा मतलब यह है कि उन्होंने रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ीं और अपने तरीके से एक नई दुनिया बनाने के लिए काम किया। उनमें से एक थे नियामत अंसारी, जो झारखंड के मणिका प्रखंड में रहते थे।
जब मैं उनसे करीब बीस साल पहले मिला था, तब वे अपने दोस्त भूखन के साथ मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे थे। नियामत मुसलमान थे और भूखन आदिवासी, लेकिन दोनों सगे भाइयों जैसे थे। दोनों नियामत की पुरानी, खटारा मोपेड पर बैठकर गांव-गांव जाते थे और मनरेगा के कामों की जांच करते थे।
भूखन और नियामत ने कई भ्रष्ट ठेकेदारों का भंडाफोड़ किया था। जाहिर है, वैसे ठेकेदार उनसे नाराज हो गए और उनसे बदला लेने में लग गए। नियामत और भूखन को झूठे केस में फंसा दिया गया। दोनों को कुछ समय जेल में भी बिताना पड़ा। जेल में उनके साथ जो हुआ, उसके बारे में उनकी बातें तो मैं कभी नहीं भूलूंगा। वहां रात में कैदियों को टॉयलेट जाने की भी सुविधा नहीं थी।
लेकिन जेल से छूटते ही नियामत और भूखन ने फिर से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया। ठेकेदार उनकी हत्या की साजिश में लग गए। 2 मार्च 2011 को ठेकेदारों के इशारे पर माओवादियों के एक दस्ते ने नियामत को पीट-पीटकर मार डाला। भूखन ने एक खेत में छिपकर अपनी जान बचाई।
ऐसे ‘सहज-क्रांतिकारियों’ में कई महिलाएं भी हैं। मणिका में ही मैं ऐसी कई महिलाओं को जानता हूं। उनमें से एक थीं श्यामा सिंह। नियामत की तरह श्यामा भी अत्याचार करने वालों के सामने खड़े होने से नहीं डरती थीं। उन्होंने मणिका की कई महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा दी।
2015 में इन महिलाओं ने बहुत कम पैसे खर्च करके ग्राम पंचायत के मुखिया का चुनाव जीतने में श्यामा की मदद की थी। लेकिन ज्यादातर मुखियाओं के विपरीत, श्यामा ने पद का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया। पांच साल बाद भी उनका घर लगभग वैसा ही रहा जैसा पहले था, और उनके पास सस्ती स्कूटी के अलावा कोई और वाहन नहीं था।
जब नियामत को आधी रात में पीटा गया था, तब मणिका थाना पुलिस घटनास्थल पर नहीं पहुंची थी। ऐसे में श्यामा ही हिम्मत करके 10 किलोमीटर दूर अपने घर से निकलकर नियामत को अस्पताल ले जाने के लिए वहां पहुंच गईं। जबकि उस समय श्यामा नियामत से नाराज थीं। लेकिन उन्होंने अपनी नाराजगी भुला दी और उनकी मदद के लिए दौड़ी चली आईं, क्योंकि नियामत उनके साथी थे।
18 जुलाई 2026 को घर में झाड़ू लगाते समय श्यामा को नाग ने काट लिया। कुछ दिन बाद बारिश में उनका अंतिम संस्कार हुआ। गांव के हर घर से कोई न कोई वहां आया। उनके पड़ोसियों, रिश्तेदारों और दोस्तों ने गांव के आदिवासियों की सरल और सच्ची भाषा में उनके बारे में बातें कीं। यहां तक कि नए मुखिया की आंखों में भी उनके बारे में बोलते समय आंसू थे, जबकि वे श्यामा के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे।
भूखन, नियामत और श्यामा जैसों का नाम इतिहास की किताबों में नहीं मिलता, लेकिन वे हमारे लिए प्रेरणा और उम्मीद हैं। आज की प्रचलित विचारधारा हमें उन लोगों की प्रशंसा करना सिखाती है, जो अपने लिए अच्छा करते हैं- करोड़पति, नेता, टॉपर, स्टार आदि। इससे हमें ऐसा लगता है कि सिर्फ अपने ही लिए जीना स्वाभाविक है। लेकिन बहुत-से आम लोगों के आदर्श इससे कहीं ऊंचे होते हैं। मैं उन्हें सलाम करता हूं।
आज हमें उन लोगों की प्रशंसा करना सिखाया जाता है, जो अपने लिए अच्छा करते हैं- करोड़पति, नेता, टॉपर, स्टार आदि। इससे ऐसा लगता है कि सिर्फ अपने लिए जीना चाहिए। लेकिन बहुत-से लोगों के आदर्श इससे कहीं ऊंचे होते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

