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कभी-कभी कोई फिल्म, फिल्म न रहकर एक देश बन जाती है, जहां हम चले जाते हैं अनजाने में, सुनते हुए, गुनगुनाते हुए। एक ऐसी ही यात्रा हो गई, जब यह गाना जेहन में बस सा गया- ‘न मिलता गम तो बर्बादी के अफसाने कहां जाते, अगर दुनिया चमन होती तो वीराने कहां जाते।’ अगर दु:ख न होते तो ट्रैजेडी का स्वरूप कैसे बनता? साहित्य की समृद्धि तो दु:ख भरी दास्तानों से हुई है। हालांकि, हम कैसे और क्यों दु:ख सहते हैं, इसकी समझ पुराने जमाने और आज के दौर में अलग-अलग है। आधुनिकता हमें हम पर थोपे गए दु:ख के प्रति नाराज होना सिखाती है, और हम जल्दी ही इसके पीछे किसी जिम्मेदार कारण या कर्ता को खोजने लगते हैं। गाने के बोल आगे जाते इस तरह से हैं- ‘मुबारक गैर को खुशियां, मुझे गम से मोहब्बत है।’ दु:ख का भी अपना औचित्य होता है; और हमें इसे एक गरिमा के साथ सहना होता है। दु:ख बहुत निजी होता है- वह पूरी तरह अपना होता है- लेकिन खुशी को बेगाना बनाकर दु:ख को एक डिग्निटी (गरिमा) मिलती है। फिल्मों के गाने अक्सर हमें पुराने जमाने की याद दिलाते हैं। जब दु:ख को एक ऐसी स्थिति के तौर पर देखा जाता था, जो हमें जिंदगी के बारे में गहरी बातें सिखाती थी। आज के दौर में, जब हम हर हाल में खुश रहने की कोशिश करते हैं, तो यह बात अजीब लगती है कि कोई दु:ख में भी मुक्ति देख सकता है। हम शायद इसे आत्मकरुणा समझकर नजरअंदाज कर दें। फिल्म ‘अमर’ (1954) न सिर्फ अपने कुछ गानों, बल्कि उसमें दिखाई नैतिक हिम्मत की वजह से भी अनोखी है। इसका शुरुआती गाना, ‘इंसाफ का मंदिर है ये, भगवान का घर है’, अदालत और मंदिर को एक ही स्तर पर रखता है। यह बताता है कि न्याय कानूनी ही नहीं, नैतिक मामला भी है। यह मंदिर को भी सिर्फ पवित्रता ही नहीं, न्याय की जगह के तौर पर भी दिखाता है। न्याय का सफर मुश्किल है और कहानी भारी कीमत चुकाकर इसे पूरा करने की कोशिश करती है। मुख्य किरदार अमरनाथ (दिलीप कुमार) न्याय पर जोर देने में कभी पीछे नहीं हटता। उसे अपनी सोच से मेल खाने वाली साथी अंजू (मधुबाला) मिलती है। दोनों अमीर, मजाकिया और अपने काम के प्रति समर्पित हैं, और उनके माता-पिता चाहते हैं वे शादी कर लें। पर इस आदर्श स्थिति के बीच अन्याय की एक छिपी हुई कहानी भी है। एक रात अमर, सोनिया (निम्मी) के साथ जबर्दस्ती करता है, जो किसी दूसरे दरिंदे से बचने के लिए उसके घर पनाह लेने आई थी। कहानी अपराधी को उसके कृत्य के लिए जिम्मेदार ठहराती है- अदालत और मंदिर दोनों जगह न्याय होता है, और नैतिक व्यवस्था फिर कायम होती है। अंजू की जगह सोनिया, अमरनाथ की पत्नी बनती है। हालांकि कहानी हमें न्याय मिलने का संतोष देती है, लेकिन सोनिया के दु:ख को बताने वाला गाना भी उतना ही जटिल है, जो फिल्म को एक परिष्कृत नजरिया देता है। नीचे लिखी पंक्तियां इस बात को बखूबी बयां करती हैं कि कैसे हमारे ‘अपने’ पराये हो जाते हैं : ‘चलो अच्छा हुआ अपनों में कोई गैर तो निकला, अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहां जाते…।’ शकील बदायूंनी के इस गाने में सिर्फ दु:ख-दर्द ही नहीं, रिश्तों का एक पूरा ताना-बाना है और यह भी दिखता है कि कोई व्यक्ति ‘अपना’ या ‘बाहरी’ (गैर) कैसे बनता है। यहां ‘गैर’ शब्द पर ध्यान देना जरूरी है। अंग्रेजी में ‘स्ट्रेंजर’ और ‘आउटसाइडर’ जैसे शब्दों का मतलब ‘गैर’ से अलग होता है। ‘स्ट्रेंजर’ (अजनबी) वह व्यक्ति है, जिसे हम नहीं जानते और कई गानों में ‘अजनबी’ का जिक्र मिलता है। इसी तरह, ‘आउटसाइडर’ (बाहरी व्यक्ति) का मतलब आम तौर पर किसी दूसरे देश या गांव के व्यक्ति से होता है। इसलिए ‘परदेसी’ शब्द का मतलब है किसी दूसरी जगह या दूसरी संस्कृति का व्यक्ति। हालांकि, ‘गैर’ का मतलब है ‘अपना न होना’। ‘गैर’ के बारे में हम ऐसे व्यक्ति के तौर पर सोच सकते हैं, जिसे हम सच में नहीं जानते, या फिर ऐसा व्यक्ति जो ‘अपना’ नहीं रहा। हम किसी के साथ बनी नजदीकी को अचानक खत्म नहीं कर सकते; यानी हम अचानक किसी ऐसे व्यक्ति को ‘अनजान’ नहीं मान सकते, जिसे हम बहुत अच्छी तरह जानते रहे हैं, लेकिन हम यह सोच सकते हैं कि क्या हम सच में उन्हें जानते थे। जब कोई ‘अपना’ ही ‘गैर’ बन जाता है, तो उलझन पैदा होती है कि आखिर एक भरोसेमंद इंसान कैसे कोई और बन गया। कभी-कभी दु:ख और उलझन में ज्यादा फर्क नहीं होता और गैर भी दहलीज पर खड़ा होता है, जो न अनजाना है न पूरी तरह से अपना है। बहरहाल, हम उस गैर के शुक्रगुजार हैं- ‘तुम्हीं ने गम की दौलत दी, बड़ा एहसान फरमाया, जमाने भर के आगे हाथ फैलाने कहां जाते?’ पहले दु:ख को ऐसी स्थिति के तौर पर देखा जाता था, जो हमें जिंदगी के बारे में गहरी बातें सिखाती थी। आज जब हम हर हाल में खुश रहने की कोशिश करते हैं, तो यह बात अजीब लगती है कि कोई दु:ख में भी मुक्ति देख सकता है। हम इसे आत्मकरुणा भी समझ सकते हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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रीटा कोठारी का कॉलम:दु:ख को लेकर हमारी समझ भी समय के साथ बदलती गई है
