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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की फाइल फोटो।
यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां अब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के स्तर तक पहुंच गई हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन 22 सितंबर को सहारनपुर पहुंचेंगे। पश्चिमी यूपी के इस दौरे को भाजपा की चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा
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पश्चिम की 71 सीटों से पूरे यूपी का रास्ता
भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संगठनात्मक रूप से इस क्षेत्र में 71 विधानसभा सीटें आती हैं। पार्टी ने 2027 की तैयारी का पहला बड़ा फोकस इसी क्षेत्र पर रखा है। नबीन 21 सितंबर को मेरठ और 22 सितंबर को सहारनपुर में रहेंगे। मेरठ में सांसदों, विधायकों और शक्ति केंद्र स्तर के पदाधिकारियों के साथ संवाद का कार्यक्रम है, जबकि सहारनपुर में पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों और पुराने पदाधिकारियों के साथ भी बैठकें प्रस्तावित हैं।
राजनीतिक संकेत साफ है कि भाजपा चुनाव को केवल लखनऊ के फैसलों से नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी के स्थानीय समीकरणों को साधते हुए बूथ तक ले जाने की तैयारी कर रही है।
2024 के अनुभव के बाद बूथ सबसे बड़ा फोकस
2027 के लिए भाजपा की रणनीति में बूथ प्रबंधन को खास महत्व दिया जा रहा है। जुलाई में पार्टी ने चार दिवसीय बूथ अभियान चलाकर बूथ प्रभारियों से फीडबैक लिया था। इसमें शक्ति केंद्र संयोजकों, एससी-एसटी कार्यकर्ताओं और युवाओं से संवाद पर भी जोर दिया गया था।
सितंबर में सामने आई संगठनात्मक तैयारियों से भी संकेत मिलता है कि पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान कमजोर हुए बूथों और बदले सामाजिक समीकरणों की पहचान कर उन्हें दोबारा मजबूत करने पर काम कर रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा करीब 18,900 ऐसे बूथों का विश्लेषण कर रही है जहां 2024 में उसका समर्थन कमजोर हुआ था।
सहारनपुर में नबीन की बैठक का महत्व इसी वजह से बढ़ जाता है। यहां संगठन के बड़े नेताओं की रिपोर्ट के साथ यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि बूथ स्तर पर पार्टी की मशीनरी कितनी सक्रिय है और स्थानीय कार्यकर्ता चुनावी मोर्चे के लिए कितने तैयार हैं।
पुराने नेताओं का अनुभव बनाम नई टीम की सक्रियता
नबीन के कार्यक्रम में पश्चिमी यूपी के पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद और पूर्व विधायक भी शामिल होंगे। इसके बाद वर्तमान जिलाध्यक्षों और क्षेत्रीय पदाधिकारियों के साथ बैठक प्रस्तावित है। यानी भाजपा एक ही मंच पर संगठन के पुराने अनुभव और मौजूदा टीम की सक्रियता को सामने रखने की स्थिति बना रही है।
राजनीतिक तौर पर इसका मतलब यह है कि पार्टी 2027 से पहले यह समझना चाहती है कि पुराने चुनावों से मिले अनुभव को नई संगठनात्मक व्यवस्था के साथ किस तरह जोड़ा जाए। स्थानीय समीकरणों, पुराने प्रभावशाली चेहरों, मौजूदा नेतृत्व और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल चुनावी मशीनरी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
जनप्रतिनिधियों की सक्रियता भी समीक्षा के दायरे में
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की हालिया संगठनात्मक बैठकों में सांसदों, विधायकों, जिला पदाधिकारियों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में 22 सितंबर की बैठक में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की जनता और संगठन के बीच पहुंच, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर उनकी सक्रियता से जुड़ा फीडबैक भी महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ नकारात्मक फीडबैक को लेकर कोई प्रमाणित सार्वजनिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
यही वजह है कि सहारनपुर की बैठकों से निकलने वाला फीडबैक सिर्फ संगठन की मजबूती का आकलन नहीं होगा, बल्कि यह भी बताएगा कि चुनावी मैदान में पार्टी के पास स्थानीय स्तर पर कितनी तैयार टीम है।
सामाजिक समीकरणों पर भी नजर
पश्चिमी यूपी में चुनावी राजनीति का बड़ा हिस्सा सामाजिक समीकरणों से जुड़ा है। भाजपा की बूथ रणनीति में अलग-अलग सामाजिक समूहों की भागीदारी बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। बूथ स्तर पर एससी-एसटी कार्यकर्ताओं और युवाओं के साथ संवाद की योजना इसी व्यापक संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा है।
2027 में भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ अपने परंपरागत समर्थक आधार को सक्रिय रखने की नहीं होगी, बल्कि उन इलाकों में संगठन को दोबारा मजबूत करने की भी होगी जहां पिछले चुनावों में राजनीतिक समीकरण बदले हैं। पश्चिमी यूपी में यही समीकरण सहारनपुर जैसे जिलों को चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण बनाते हैं।
सरकार के काम को संगठन के जरिए बूथ तक पहुंचाने की तैयारी
भाजपा की चुनावी रणनीति का दूसरा हिस्सा सरकार के काम को संगठन के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचाना है। पार्टी की हालिया बैठकों में सरकार की उपलब्धियों, संगठन की सक्रियता और बूथ स्तर के अभियान को एक साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिखाई दे रहा है। सितंबर में पार्टी ने ‘सेवा संकल्प’ जैसे अभियानों के जरिए सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी भी की है।
इसका मतलब यह है कि 2027 की तैयारी में भाजपा के लिए चुनावी मुद्दे और संगठनात्मक नेटवर्क अलग-अलग विषय नहीं रहेंगे। सरकार की उपलब्धियों को बूथ कार्यकर्ता तक पहुंचाना और वहां से स्थानीय मुद्दों का फीडबैक ऊपर तक लाना दोनों प्रक्रियाएं साथ चलेंगी।
सहारनपुर से निकलने वाला संदेश पूरे पश्चिम के लिए
भाजपा के चुनावी अभियानों में सहारनपुर और पश्चिमी यूपी का पहले भी विशेष महत्व रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव तथा 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी पश्चिमी क्षेत्र से अभियान शुरू करने की परंपरा का उल्लेख किया जाता रहा है। 2027 के लिए नबीन का पश्चिमी यूपी दौरा इसी राजनीतिक महत्व को फिर रेखांकित करता है।
22 सितंबर को सहारनपुर में होने वाली बैठकों को इसलिए सिर्फ एक दिन का संगठनात्मक कार्यक्रम मानना मुश्किल है। असली महत्व उन रिपोर्टों और फीडबैक का होगा जो बैठक के बाद केंद्रीय नेतृत्व के पास जाएंगे। कहां बूथ मजबूत है, कहां संगठन को और मेहनत करनी है, किन क्षेत्रों में सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं, कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय कैसा है और किन स्थानीय मुद्दों को चुनाव से पहले प्राथमिकता देनी होगी।
यानी नबीन का सहारनपुर दौरा भाजपा के लिए 2027 की उस तैयारी का हिस्सा है, जिसमें चुनाव की रणनीति लखनऊ से तय होने के बजाय बूथ और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों से फीडबैक लेकर तैयार करने की कोशिश दिखाई दे रही है।
