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मैंने पिछले हफ्ते स्क्रीनप्ले राइटर सागर सरहदी साहब की बात की थी और बताया था कि उन्होंने कैसे ‘कभी-कभी’ से शुरुआत की और फिर ‘सिलसिला’, ‘नूरी’, ‘चांदनी’ तक उनके पास रोमांटिक फिल्मों की लाइन लग गई। आज इससे आगे की बात। बकौल सरहदी साहब, मैंने ‘कभी-कभी’ में एक डायलॉग लिखा था, जहां राखी की आंखों में देखकर अमिताभ कहते हैं, क्या आपने अपनी आंखों को गौर से देखा है?’ तो राखी पूछती हैं, ‘ऐसी क्या खास बात है मेरी आंखों में?’ तब अमिताभ कहते हैं, ‘ये जहां भी देखती हैं, एक रिश्ता कायम कर लेती हैं।’ यह डायलॉग लोगों को बहुत पसंद आया। फिर अगली पिक्चर में हीरोइन की आंखें थोड़ी नीली थीं तो डायरेक्टर ने मुझसे कहा कि ‘कभी-कभी’ की तरह इसकी आंखों पर भी एक डायलॉग लिखिए। तो मैंने उसकी आंखों के लिए भी डायलॉग लिख दिया, ‘तुम्हारी आंखों से आसमान झांकता है।’ मगर मुझे मजा नहीं आ रहा था। मुझे करना कुछ और था और मैं कर कुछ और रहा था। मैंने सोचा कि इस तरह से तो मैं सिर्फ रोमांटिक फिल्मों का डायलॉग राइटर बनकर रह जाऊंगा। मैं अपनी मर्जी का सिनेमा बनाना चाहता था, अपनी मर्जी की फिल्में लिखना चाहता था। तो मैंने खुद फिल्म प्रोड्यूस और डायरेक्ट की, जिसका नाम था ‘बाजार’। इससे मुझे क्रिएटिव सेटिस्फेक्शन मिला। उसके बाद मैं बहुत सिलेक्टिव हो गया। जो मन करता, वही करता। एक दिन मैंने सागर साहब से पूछा, “आपका नाम गंगासागर तलवार से सागर सरहदी कैसे हुआ?’ उन्होंने बताया, “मुझे अपना नाम बहुत बड़ा लगता था और मैं जिया सरहदी का बहुत बड़ा फैन था। उनकी फिल्मों और उनकी राइटिंग से मैं बहुत मुतासिर (प्रभावित) था, इसलिए मैंने जिया सरहदी की तर्ज पर अपना नाम ‘सागर सरहदी’ रख लिया।” “आपने शादी क्यों नहीं की?’ इस सवाल पर उन्होंने कहा, “शादी करता तो बीवी-बच्चों की जिम्मेदारी आ जाती। आदमी जिंदगी में जो भी समझौता करता है, वह अपने बीवी-बच्चों के लिए करता है। दिल गवारा न करे, तब भी फिल्म करनी पड़ती है क्योंकि आपके ऊपर जिम्मेदारियां हैं।’ फिर उन्होंने ठहाका लगाते हुए कहा, “मैं तो सबको बोलता हूं कि मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मुझे कोई धमकी नहीं दे सकता कि ‘मैं तुझे बेघर कर दूंगा’, क्योंकि मेरे पास तो घर ही नहीं है!’ खैर, काम तो मैं वही करुंगा, जो मुझे पसंद आएगा : इसी बात पर मुझे अंजुम लुधियानवी का एक शेर याद आता है… : दिल का क्या करूं यारो मानता नहीं मेरी
अपने दिल की सुनता है अपने मन की करता है
जब मैं पहली बार उनसे मिलने गया तो मेरे दिमाग में यही बात थी कि उनका हर लफ्ज शेर होगा, पोएट्री होगी। वे बात करेंगे तो मुंह से फूल झड़ेंगे। मगर जब मिला तो वे थोड़े अक्खड़ और गुस्से की टोन में बात कर रहे थे। मुझे लगा, शायद आज मूड ठीक नहीं होगा, इसलिए ऐसे हैं। लेकिन बाद में भी मैं जब भी उनसे मिलता तो उनका गुस्सा हमेशा उनकी नाक पर ही बैठा रहता। सबसे ज्यादा हैरानी तब हुई, जब हर दो-चार लाइनों में उनके मुंह से एक गाली सुनाई देती। तो एक दिन मैं यह पूछने से स्वयं को रोक नहीं पाया, “माफ करना सागर जी, पर मुझे ऐसा क्यों लगता है कि आप गुस्से में हैं?’
इस पर वे बोले, “हां, मैं गुस्से में हूं। चौबीसों घंटे गुस्से में रहता हूं। मेरे अंदर बहुत गुस्सा भरा पड़ा है।’
मैंने पूछा, “किस बात का?’ तो उन्होंने कहा, “पार्टीशन का! मैंने नहीं मांगा था पार्टीशन, न मैं चाहता था। कुछ लोगों ने किसी जगह बैठकर डिसाइड कर लिया और हमें अपना घर-बार छोड़ना पड़ा, अपना गांव छोड़ना पड़ा, अपना वतन छोड़ना पड़ा। मैं आज तक अपने गांव को मिस करता हूं। मैं आज तक अपने गांव से बाहर नहीं आया हूं। चाहे मैं कितना ही सक्सेसफुल हो जाऊं, मेरा दिल, मेरा जिस्म और मेरी रूह आज भी मेरे गांव में है। कितना खूबसूरत गांव था – पानी था, झरने थे, पहाड़ थे। हम लोग इतनी अच्छी जिंदगी जी रहे थे। ये कौन लोग थे, जिन्होंने हमें अच्छे-खासे घर और गांव से निकालकर रिफ्यूजी कैंप में डाल दिया? इतनी बुरी जिंदगी जीने के लिए अपने लोगों को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया!’
उन्होंने मुझे बताया, “मैंने जब ‘नूरी’ फिल्म लिखी तो इसमें अपने पूरे गांव को ही विजुअलाइज किया और वैसी ही लोकेशन्स ढूंढीं। समझ लो कि मेरा गांव भी नूरी के गांव जितना ही खूबसूरत था। जो लोग इस पार्टीशन के लिए जिम्मेदार हैं, मैं उन सबसे नफरत करता हूं और मैं उन्हें अपनी इस तकलीफ और गुस्से का जिम्मेदार मानता हूं। मैं उनको जिंदगी में कभी माफ नहीं करूंगा।’
तब मुझे समझ में आया कि हमने तो सिर्फ पढ़ा और सुना है, लेकिन जिस आदमी ने सचमुच पार्टीशन का दर्द झेला है, उसका दिल ही इस दर्द को जानता है। सागर साहब की वह आवाज, उनकी गुस्से से भरी आंखें और पार्टीशन का वह दर्द आज तक मेरी आंखों के सामने घूमता है। सागर साहब की याद में आज उनकी फिल्म ‘बाजार’ का यह गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए : दिखाई दिये यूं कि बेखुद किया…
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