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JPSC 11th-13th: Agency changed after Mains, job given to tainted candidate


रांची4 घंटे पहले

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जेपीएससी और जेएसएससी सीजीएल परीक्षा में हुई धांधली की जांच कर रही सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंप दी है। इसमें बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। सीआईडी ने जांच रिपोर्ट में कहा है कि यह केवल कुछ छात्रों द्वारा की गई नकल का मामला नहीं है, बल्कि परीक्षा कराने वाले अधिकारियों, दागी आउटसोर्स एजे​ंसियों और सॉल्वर गैंग का एक संगठित संस्थागत भ्रष्टाचार था, जिसने पूरी परीक्षा प्रणाली को बंधक बना लिया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 11वीं-13वीं जेपीएससी सिविल सेवा पीटी और मुख्य परीक्षा औपचारिक रूप से केंद्र के उपक्रम आईटीआई लिमिटेड ने कराई थी। लेकिन खेल इसके बाद शुरू हुआ। मुख्य परीक्षा के बाद जब डेटा प्रोसेसिंग, मुख्य परीक्षा की मेरिट लिस्ट तैयार करने, इंटरव्यू कराने और अंतिम परिणाम प्रकाशन का सबसे संवेदनशील चरण आया तो अचानक एजेंसी बदल दी गई। जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष ने एजेंसी चयन की एसओपी को दरकिनार कर बिना टेंडर सिर्फ मनोनयन के आधार पर सारा संवेदनशील काम टीडीपीएल को सौंप दिया। जांच एजेंसी ने कहा है​ कि टीडीपीएल कोई बेदाग संस्था नहीं थी, बल्कि यह पहले से दागी और बदनाम एजेंसी रही है। इस एजेंसी के निदेशक सत्यपाल सिंह व रामबीर सिंह यूपी में लोकसेवा परीक्षा घोटाले के ऐसे ही एक गंभीर मामले में गिरफ्तार हो चुके थे।

यही नहीं, अनियमितता, लापरवाही और गैर जवाबदेही के चलते झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) ने वर्ष 2025 में ही टीडीपीएल को अपने पैनल से बाहर कर दिया था। इसके बावजूद जेपीएससी की बागडोर इस दागी एजेंसी के हाथों थमा दी गई।

मेन्स परीक्षा में कॉपी बदली गई, एक करोड़ तक में बेचे गए पद

सीआईडी ​​ने बताया कि जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा के नतीजे घोषित करने से लेकर मेंस और इंटरव्यू तक का जिम्मा इन्हीं दागी चेहरों के पास था। गिरफ्तार आरोपी रामबीर सिंह ने अपने बयान में कबूल किया है कि मुख्य परीक्षा में सेटिंग वाले चुनिंदा अभ्यर्थियों की उत्तर-पुस्तिकाओं को बदला गया। लिखित परीक्षा पास कराने के बाद इंटरव्यू में भी खुलेआम धांधली हुई। इंटरव्यू की शुचिता बनाए रखने के लिए अभ्यर्थियों को दिए जाने वाले गोपनीय कोड को तत्कालीन अध्यक्ष और टीडीपीएल के लोगों ने आपस में डिकोड कर लिया। इसके बाद इंटरव्यू बोर्ड के सामने सुनियोजित तरीके से अभ्यर्थियों को बिठाकर 50 लाख से 1 करोड़ रुपए तक की मोटी रकम के एवज में मनमाने नंबर दिलाए गए।

ओएमआर में हेरफेर व ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम से भी छेड़छाड़ हुई

रिपोर्ट के मुताबिक टीडीपीएल के आते ही परीक्षा की गोपनीयता पूरी तरह ध्वस्त हो गई। एजेंसी ने जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष और अंदरूनी तंत्र के साथ मिलकर एक समानांतर सिंडिकेट खड़ा कर लिया। विभिन्न परीक्षाओं के लिए कई सॉल्वर गिरोहों को लगाया गया था। ओएमआर शीट को सील नहीं किया गया और बाद में इसमें हेरफेर की गई। परीक्षा का क्लाउड सर्वर टीडीपीएल की सहयोगी कंपनी पिकर टेक्नोलॉजी के जरिए संपादन योग्य बना दिया गया था, जिससे नंबरों को कभी भी बदला जा सके। लिखित परीक्षा में मनचाहे नंबर दिलाने के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (ओएसएम) में भी छेड़छाड़ की गई। उप परीक्षा नियंत्रक स्तर से आंसर-की वॉट्सएप के जरिए बाहर भेजी जा रही थी। जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष ने अपना लैपटॉप तक से सबूत को मिटाने का प्रयास किया।

पीएसयू को दिया काम, पीछे से सिंडिकेट हो गया सक्रिय

रिपोर्ट में जेपीएससी में सक्रिय निजी वेंडरों के नेक्सस का भी पर्दाफाश किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जेपीएससी की। बिंसिस कंपनी का निदेशक अरुण शर्मा 2020 तक आईसीएन इंडिया का प्रमुख चेहरा था और बाद में उसने अलग काम शुरू किया। आईसीएन इंडिया का मौजूदा कर्ताधर्ता भी सीधे तौर पर अरुण शर्मा का करीबी सहयोगी है। चूंकि इन वेंडरों का आपराधिक इतिहास सीधे रास्ते से जेपीएससी में आने की राह में रोड़ा बन सकता था, इसलिए इन्होंने सरकारी उपक्रम आईटीआई लिमिटेड को मुखौटा बनाया। आईटीआई लिमिटेड ने वर्क ऑर्डर हासिल किया और फिर नियमों व समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए काम पर्दे के पीछे से टीडीपीएल व आईसीएन जैसी कंपनियों को आउटसोर्स कर दिया।

गारंटी के तौर पर रख लिए जाते थे सर्टिफिकेट

सीआईडी ​​ने बताया है कि जांच में पकड़े गए सह-आरोपी उमेश कुमार और बुधेश्वर भगत ने स्वीकारोक्ति बयान में बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि सेटिंग के पूरे पैसे मिलने तक गारंटी और सुरक्षा के रूप में उम्मीदवारों के मूल शैक्षणिक प्रमाण पत्र सिंडिकेट ने अपने पास गिरवी रख लिए थे। यानी जिस वक्त अभ्यर्थी आयोग में दस्तावेज सत्यापन का ढोंग कर रहे थे, उस वक्त घोटालेबाजों के पास उनके असली दस्तावेज बतौर अमानत जमा थे।



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