हाईकोर्ट ने लुधियाना में दर्ज तीन FIR की जांच की निगरानी के लिए वरिष्ठ IPS अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए हैं।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाबी सिंगर मूसेवाला के मैनेजर रहे शगनप्रीत के माता-पिता पर लुधियाना में दर्ज तीन FIR की जांच की निगरानी के लिए वरिष्ठ IPS अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस मनीषा बत्रा ने दिए आदेश में कहा कि पुलिस कमिश्नर, लु
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कोर्ट ने फिलहाल जांच को CBI को सौंपने या अलग SIT गठित करने की मांग स्वीकार नहीं की। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाए गए पुलिस पर अवैध हिरासत, पैसे की मांग, घर में प्रवेश करने और CCTV/DVR समेत अन्य सामान ले जाने के आरोपों को भी सीधे खारिज नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों की कानून के अनुसार जांच होनी चाहिए।
माता-पिता का बेटे से संबंध खत्म करने हवाला
यह याचिका दलजीत कौर और उनके पति सौदागर सिंह की और से एडवोकेट गौरव दत्ता और एडवोकेट मनीष मोदी ने दाखिल की थी। एडवोकेट गौरव दत्ता ने बताया दोनों गांव चारी, तहसील खमानों, जिला फतेहगढ़ साहिब के रहने वाले हैं। याचिका के अनुसार सौदागर सिंह करीब दो दशक तक गांव के नंबरदार रहे हैं। उनका कहना था कि उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वे कृषि परिवार से हैं।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उनके बेटे शगनप्रीत सिंह को उन्होंने वर्ष 2021 में सार्वजनिक नोटिस और सिविल कार्यवाही के जरिए परिवार से अलग और बेदखल कर दिया था। इसके बाद उनका बेटे से कोई संबंध नहीं रहा। उनका आरोप था कि शगनप्रीत विदेश में रह रहा है और आपराधिक मामलों में शामिल बताया जाता है, लेकिन पुलिस अधिकारी उसके बारे में दबाव बनाने के लिए उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं।
पहले FIR में नाम नहीं बाद में आरोपी बनाया
मामला FIR नंबर 67 से शुरू हुआ था। यह FIR 25 मार्च 2026 को थाना पायल में BNS की धारा 308 और 351(2) के तहत डोनी बाल के खिलाफ दर्ज हुई थी। शिकायत में धमकी भरे फोन और फिरौती की मांग का आरोप था।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, FIR दर्ज होने के समय उनका नाम आरोपी के तौर पर नहीं था। बाद में सौदागर सिंह को विकास मेनरो की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर मामले में नामजद किया गया। याचिका के अनुसार विकास इस FIR का शिकायतकर्ता नहीं था। उनकी पत्नी को एक आरोपी के बयान के आधार पर मामले में शामिल किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 29 और 30 मार्च की रात सादे कपड़ों में कुछ लोग उनके घर में आए और सौदागर सिंह को अपने साथ ले गए। उनका आरोप था कि गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए गए और न ही गिरफ्तारी मेमो दिया गया। बाद में रिकॉर्ड में उन्हें गुप्त सूचना के आधार पर बस स्टैंड माजरी से गिरफ्तार दिखाया गया।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान दिए आदेश।
कोर्ट ने जमानत आदेश का भी किया जिक्र
याचिकाकर्ताओं ने लुधियाना के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के 2 मई 2026 के जमानत आदेश का हवाला दिया। इसमें सौदागर सिंह को FIR नंबर 67 में नियमित जमानत दी गई थी। उस आदेश में यह दर्ज था कि उन्होंने शिकायतकर्ता को धमकी नहीं दी थी और उसे कोई वॉयस मैसेज नहीं भेजा था। वह FIR में नामजद भी नहीं थे और उन्हें ऐसे व्यक्ति की सूचना पर गिरफ्तार किया गया था, जो शिकायतकर्ता नहीं था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया था कि याचिकाकर्ताओं ने अपने बेटे को सार्वजनिक रूप से परिवार से अलग कर दिया था और सौदागर सिंह को आगे हिरासत में लेकर जांच करने की जरूरत नहीं थी।
दूसरी FIR में भी मिली जमानत
इसके बाद 24 अप्रैल 2026 को थाना दोराहा में FIR नंबर 90 दर्ज हुई। इसमें BNS की धारा 308(4), 351(2) और 61(2) लगाई गईं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार सौदागर सिंह को इस मामले में प्रोडक्शन वारंट के जरिए गिरफ्तार किया गया।
15 मई 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, लुधियाना ने उन्हें इस मामले में भी नियमित जमानत दे दी। कोर्ट ने उस समय नोट किया कि किसी शिकायतकर्ता ने उनका नाम नहीं लिया था और उनके गवाहों को प्रभावित करने या न्याय से भागने की संभावना नहीं थी।
ढाबे पर फायरिंग के मामले में तीसरी FIR
1 मई 2026 को थाना सिटी खन्ना में प्रेम वैष्णो ढाबे पर हुई कथित फायरिंग के मामले में FIR नंबर 101 दर्ज हुई। इसमें BNS की धारा 109, 308(4), 351(3), 61(2) और आर्म्स एक्ट की धाराएं लगाई गईं।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इस FIR में उनका नाम आरोपी के तौर पर नहीं था। हालांकि उनके बेटे शगनप्रीत सिंह का नाम आरोपी के तौर पर दर्ज था।
याचिका के अनुसार, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और पंजाब के DGP व विजिलेंस अधिकारियों को शिकायतें देने के बाद 19 और 20 मई की रात पुलिसकर्मी फिर उनके घर पहुंचे। आरोप लगाया गया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को जबरन साथ ले जाया गया। पुलिसकर्मियों ने दीवार फांदकर घर में प्रवेश किया और CCTV/DVR सिस्टम, नकदी और सोने के गहने ले गए।

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट।
करीब 20 लाख रुपए मांगने का भी आरोप
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने हाईकोर्ट में आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने परिवार पर दबाव बनाया और करीब 20 लाख रुपए की अवैध मांग की। आरोप था कि परिवार को झूठे मामलों में फंसाने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां भी दी गईं।
वकील ने कहा कि स्थानीय पुलिस पर ही आरोप लगे हैं, इसलिए उसी पुलिस व्यवस्था को जांच सौंपना निष्पक्ष जांच के लिए उचित नहीं होगा। इसी आधार पर स्वतंत्र SIT या जांच CBI को सौंपने की मांग की गई।
पंजाब सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त एडवोकेट जनरल ने इन आरोपों को गलत बताया। सरकार ने कहा कि सौदागर सिंह को FIR नंबर 67 में 30 मार्च को गिरफ्तार किया गया था और दोनों याचिकाकर्ताओं को FIR नंबर 101 में 19 मई को कानून के अनुसार गिरफ्तार किया गया।
सरकार ने आरोपों को गलत बताया
सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जबरन वसूली से जुड़े कई मामले हैं और जांच में उनकी कथित भूमिका सामने आई है। घर से DVR लेने के आरोप पर सरकार ने बताया कि DVR को FIR नंबर 101 में केस प्रॉपर्टी के तौर पर कब्जे में लिया गया और उसे FSL भेज दिया गया है। इसकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है। पुलिस ने करीब 20 लाख रुपए मांगने और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हटाने या नष्ट करने के आरोपों को भी निराधार बताया। सरकार के मुताबिक जांच संबंधित DSP की निगरानी में चल रही है।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होने मात्र से उनके लगाए आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान व्यक्ति को मिलने वाली सुरक्षा का जिक्र किया।
कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी केवल किसी आरोप के आधार पर सामान्य तरीके से नहीं की जा सकती। गिरफ्तारी करने वाले अधिकारियों की पहचान, गिरफ्तारी मेमो, परिजन या दोस्त को सूचना और गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देने जैसी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है।
CBI को जांच सौंपने के लिए अभी पर्याप्त आधार नहीं
कोर्ट ने कहा कि CBI को जांच सौंपना या अलग SIT बनाना असाधारण कदम है। इसे सामान्य तौर पर या केवल स्थानीय पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाए जाने के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए ठोस आधार होना जरूरी है। कोर्ट के मुताबिक, मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी राज्य पुलिस या उसकी वरिष्ठ व्यवस्था निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं है। इसलिए इस स्तर पर CBI जांच या अलग SIT गठित करने की जरूरत नहीं है।
हाईकोर्ट ने साथ ही कहा कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत को पूरी तरह निराधार भी नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि पुलिस ने याचिकाकर्ताओं के घर से DVR कब्जे में लिया है। वहीं 29/30 मार्च की रात सौदागर सिंह को घर से ले जाने के आरोप और FIR में उन्हें बस स्टैंड माजरी से गिरफ्तार दिखाए जाने को लेकर दोनों पक्षों के बयान अलग हैं।
कोर्ट ने कहा कि इन विवादों को गिरफ्तारी मेमो, गिरफ्तारी के आधार, जनरल डायरी एंट्री, मेडिकल जांच के रिकॉर्ड, मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने के रिकॉर्ड, संबंधित थानों और कार्यालयों की CCTV फुटेज तथा पुलिस अधिकारियों और याचिकाकर्ताओं के कॉल डिटेल रिकॉर्ड व लोकेशन डेटा जैसे दस्तावेजों से जांचा जा सकता है।
DIG रैंक के अधिकारी करेंगे जांच की निगरानी
कोर्ट ने कहा कि DVR पुलिस के कब्जे में होने की बात खुद राज्य सरकार ने स्वीकार की है। यह FIR नंबर 101 में केस प्रॉपर्टी है, लेकिन इसके साथ ही यह उस रात याचिकाकर्ताओं के घर में क्या हुआ, इसका महत्वपूर्ण रिकॉर्ड भी हो सकता है। इसमें घर में प्रवेश करने वाले लोगों की संख्या और पहचान, प्रवेश का तरीका और समय जैसी जानकारी हो सकती है। इसी वजह से कोर्ट ने DVR, FSL रिपोर्ट, CCTV फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सुरक्षित रखने और उनकी कानून के अनुसार जांच करने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि लुधियाना के पुलिस कमिश्नर यह सुनिश्चित करेंगे कि FIR नंबर 67, 90 और 101 की जांच की निगरानी DIG रैंक या उससे ऊपर के ऐसे वरिष्ठ IPS अधिकारी करें, जो इस जांच से सीधे जुड़े नहीं हैं।
यह अधिकारी जांच की प्रगति पर नजर रखेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि जांच निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ और कानून के अनुसार हो। साथ ही DVR, FSL रिपोर्ट, CCTV फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और उनकी जांच सुनिश्चित करेंगे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाए गए अवैध हिरासत, पैसे की मांग और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हटाने या नष्ट करने के आरोपों पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। हालांकि निगरानी अधिकारी जांच अधिकारी की स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का आकलन करने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और न ही जांच का नतीजा तय करने का निर्देश देंगे।
