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Kishangarhs Bani Thani Painting | Raja Sawant Singh


राजस्थानी प्रेम कहानी के पार्ट-2 में आपने पढ़ा कि कैसे राजा और बणी-ठणी के प्रेम को चित्रकार ने अपनी पेंटिंग्स में उकेरा और बणी-ठणी क्यों भारत की मोनालिसा कहलाई।

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पार्ट-3 में पढ़िए आगे की कहानी…

राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी की कहानी में दोनों के श्रीकृष्ण और अध्यात्म की ओर झुकाव की विशेष भूमिका थी, जिसके चलते राजा ने बणी-ठणी में राधा की छवि को देखा था।

एक शाम राजा सावंत सिंह ने निहाल चंद को बुलाया और बोले – मुझे खास चित्र बनाना है निहाल चंद। ध्यान रहे चित्र में मन की निर्मलता और आत्मा की शीतलता भी झलके। राधा के स्वरूप को उकेरो, ठीक वैसा जैसा मैंने अपनी कविताओं में राधा को महसूस किया है।

राजा के आदेश ने निहाल चंद को सोच में डाल दिया। इस अनोखे सौंदर्य को कैनवास पर उतारना आसान नहीं था। दरबारी कलाकार ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जुट गया अपने काम में। कभी वो राजा की कविताओं में डूब जाता तो कभी उन्हीं भावों को कैनवास पर उतारने की कोशिश करता। उधेड़ बुन के बीच उसने स्केच बनाना शुरू किया। हर रेखा, हर रंग मानो एक भावना को आकार दे रहे थे।

ऐसा भी माना जाता है कि राजा ने बणी-ठणी से प्रेरित होकर निहाल चंद को राधा का चित्र बनाने का आदेश दिया था। बणी- ठणी के सौंदर्य को ध्यान में रखते हुए निहाल चंद ने धीरे-धीरे चित्र को पूरा किया और फिर एक पारदर्शी ओढ़नी के माध्यम से तस्वीर के सौंदर्य को और अधिक बढ़ा दिया।

अंततः चित्रकार के कैनवास पर उतर आया दिव्य प्रेम और आलौकिक सौंदर्य का अद्भुत संगम। एक ऐसी कृति जो समय से परे थी।

यही वो दौर था जब किशनगढ़ में जन्म हुआ उस कला शैली का जिसने खूबसूरती की परिभाषा बदल दी। किशनगढ़ कला शैली की सबसे बड़ी खासियत इसके पात्रों के चेहरे-मोहरे की खास बनावट थी। बणी-ठणी पेंटिंग किशनगढ़ कला शैली का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

बणी-ठणी बनाम ‘राधा’

राजा के कहने पर निहाल चंद ने बणी-ठणी को राधा के रूप में चित्रित किया था। हालांकि किशनगढ़ के कला इतिहासकार, आर्टिस्ट और पूर्व राजपरिवार इस चित्र को ‘राधा’ की पेंटिंग बताते हैं। किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार का कहना है कि निहाल चंद ने दरअसल राधा की पेंटिंग बनाई थी, जिसे राजा सावंत सिंह ने अपनी कविताओं में दर्शाया था।

किशनगढ़ शैली के वरिष्ठ चित्रकार शंकर सिंह राठौड़ कहते हैं – पक्का तो कोई बात कही नहीं जा सकती। मगर कहते हैं कार्ल खंडेलवाला और डिकिंसन ने जब यहां शोध कार्य किया तो उन्होंने ये सारा स्टडी कर के बताया कि किसी लेडी से प्रभावित होकर ये पोर्ट्रेट बनाया गया और वो लेडी बणी-ठणी हो सकती है। कई विद्वान इसे राधा भी कहते हैं।

श्री जयकृष्ण देवाचार्य, पीठाधीश्वर निम्बार्काचार्य,काचरिया पीठ, बणी-ठणी के चित्र में आध्यात्मिक भाव को विस्तार से समझाते हैं- राधिका जी के चित्र में उनका ललाट भव्य बताया गया है, बिंदी सौभाग्य का सूचक है। इस चित्र में कटाक्ष नयन हैं। श्रीनाथ जी के चित्र को देखेंगे तो उनके नेत्र भी इसी तरह के दिखाई देंगे।

‘बणी-ठणी’ या ‘राधा’! कौन जानता था कि निहाल चंद अपने राजा की अभिलाषा को पूरा करते हुए किशनगढ़ शैली को कला के इतिहास में अमर करने वाला था।

(कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। फोटो व पेंटिंग आभार : किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार, चित्रकार,शहज़ाद अली शेरानी )

ग्राफिक्स – भाविक जैन इनपुट सहयोग- रोहित पारीक

राजा सावंत सिंह और बणी ठणी कृष्ण प्रेम और भक्ति में एक समान थे। इस भक्ति रस के चलते ऐसा क्या हुआ कि राजा ने राज पाट छोड़ दिया?

जानेंगे कल के एपिसोड में…

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