Tonk Farmer Navhind Chaudhary Herbal Garden


टोंक जिले के बांसखेड़िया निवासी किसान नवहिंद चौधरी ने सात हजार रुपए में 5 करोड़ रुपए की FD करवाई है। ये FD बैंक में नहीं, उनके खेत में खड़े सफेद चंदन के 50 पौधे हैं।

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इन पौधों को लगाए चार साल हो चुके हैं और मैच्योर होने में अभी 10 साल बाकी हैं। सफेद चंदन और बेकार समझे जाने वाले खरपतवार ‘अरणिया’ का सटीक तालमेल बैठाकर उन्होंने ‘ग्रीन FD’ की मिसाल रख दी है।

75 साल के किसान नवहिंद चौधरी की मानें तो अरणी के साथ चंदन की ग्रोथ अच्छी होती है। चंदन के साथ अरणिया का भी मेडिसन यूज है और बाजार में इसकी डिमांड रहती है।

1980 के दशक में जब सरकारी नौकरी आसानी से मिल जाती थी, तब नवहिंद ने पढ़ाई छोड़कर व्यापार के साथ खेती संभाली। लोग जिन पौधों को खरपतवार मानते हैं, नवहिंद पिछले 45 साल से उन्हीं पर रिसर्च कर रहे हैं। 60 बीघा जमीन में से एक हेक्टेयर को उन्होंने एग्रो फॉरेस्ट्री की लेबोरेट्री बना रखा है। वे यहां अलग-अलग पौधों और खेती के तरीकों पर प्रयोग करते हैं।

नवहिंद चौधरी कहते हैं – आज रोटी पैदा करने वाला किसान संकट से गुजर रहा है। ऐसे में खेती में मल्टीप्लाई और वैल्यू एड करना जरूरी है। इससे किसान की दूसरों पर निर्भरता कम होगी और वह अपने प्रोडक्ट की कीमत खुद तय कर पाएगा।

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पढ़ाई बीच में छोड़ी, नौकरी के बजाय कारोबार शुरू किया

दूनी क्षेत्र के बांसखेड़िया निवासी नवहिंद चौधरी (72) ने 1970 में 11वीं के बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। किसान बताते हैं- उस समय सरकारी नौकरी में करीब 150 रुपए तक महीने की सैलरी मिलती थी। नौकरी करने के बजाय किराना की दुकान शुरू की।

इसके बाद कपड़े का कारोबार किया और पावरलूम कपड़े की फैक्ट्री भी लगाई। बाद में एक्सप्लोसिव (विस्फोटक या बारूद) का कारोबार शुरू किया। पिता भी खेती करते थे, इसलिए कारोबार के साथ वे खेती से भी जुड़े रहे।

नवहिंद बताते हैं- उनके तीन बेटों में से एक का 34 साल की उम्र में निधन हो गया। दोनों बेटों को आयुष क्षेत्र में भेजना चाहते थे, लेकिन दोनों नौकरी करने लगे। अब वे अपने पोते को मेडिसिन की पढ़ाई करवा रहे हैं।

1984 में पटसन की खेती का किया प्रयोग

नवहिंद बताते हैं- 1984 में भूगोल से जुड़ा एक ब्लॉग पढ़ते हुए देखा कि टोंक करीब 26 डिग्री अक्षांश पर आता है और पश्चिम बंगाल भी इसी अक्षांश पर है। वहां पटसन की खेती होती है। इसी से पटसन (जूट) उगाने का विचार आया। पटसन का बीज हासिल करने में करीब चार साल लग गए।

आखिरकार जयपुर में सीड्स कॉरपोरेशन से 5 किलो बीज मिला। इसे एक हेक्टेयर में लगाया। जून में इसकी बुवाई की और अक्टूबर के आसपास फसल तैयार हो गई।

फसल काटने के बाद इसे बनास नदी के पानी में गलाने के लिए रखा गया। फिर इसके रेशे अलग किए गए। हालांकि, तैयार पटसन को बेचने के लिए उन्हें बाजार नहीं मिला। अच्छी कमाई नहीं हो पाई।

कुसुम की खेती की, लेकिन बाजार नहीं मिला

नवहिंद बताते हैं- पटसन के बाद कुसुम की खेती का प्रयोग किया। करीब पांच बीघा जमीन में कुसुम लगाया। इससे तेल निकलता है और इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है।

यह मेडिसिन प्लांट भी है, लेकिन बाजार नहीं मिलने के कारण इसका प्रयोग भी आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद उनका ध्यान औषधीय पौधों और खेती के नए प्रयोगों की ओर गया।

आयुष विभाग के कार्यक्रम में उठाया मेडिसिन प्लांट का मुद्दा

1994 में आयुष विभाग ने उन्हें दिल्ली बुलाया। वहां पित्त पापड़ा जैसे खरपतवार के बारे में चर्चा हुई। उन्हें लाल पगड़ी पहनने वाले किसान के रूप में मंच पर बुलाया गया।

नवहिंद ने वहां औषधीय पौधों के लिए बाजार तैयार करने की जरूरत का मुद्दा उठाया। मंच पर बताया कि खेतों में उगने वाले कई खरपतवार भी मेडिसिन प्लांट होते हैं, लेकिन किसानों को इनके उपयोग और बाजार की जानकारी नहीं है।

अरणिया को चंदन के पौधों के साथ उगाने पर शुरू की रिसर्च

नवहिंद के मुताबिक, किसान अरणिया के पौधे से परेशान रहते हैं और इसे जेसीबी से हटवाते हैं, लेकिन यह पौधा चंदन की खेती में उपयोगी पाया गया। उनका कहना है कि जिस खेत में अरणिया है, वहां चंदन के पौधे लगाए जाएं तो यह किसान के लिए फायदेमंद हो सकता है।

अरण्य का मतलब जंगल होता है और इसी से अरणिया नाम पड़ा। चंदन सेमी पैरासाइट यानी परजीवी पौधा है। इसकी जड़ें दूसरे पौधों की जड़ों से जुड़कर पोषण लेती हैं, इसलिए चंदन के साथ दूसरे पौधे लगाना जरूरी होता है।

2022 से चंदन के साथ दूसरे पौधों पर लगातार प्रयोग

नवहिंद बताते हैं- वन विभाग के अधिकारियों से जानकारी लेने के बाद उन्होंने 2022 में जोधपुर स्थित अफॉरेस्ट रिसर्च सेंटर से सफेद चंदन के 10 पौधे लाकर लगाए। एक पौधा 100 रुपए का पड़ा था।

क्लाइमेट में सेट होने के बाद असम के जोरहाट से अगरवुड के 10 पौधे भी लगाए। अगरवुड के पौधों पर अलग-अलग तरीके से प्रयोग किया, लेकिन सफल नहीं हुए।

चंदन के साथ दूसरी फसलों पर भी प्रयोग

नवहिंद बताते हैं- चंदन के चार पौधे रतनजोत के साथ लगाए थे, लेकिन सारे खराब हो गए। अरणिया के साथ चंदन की ग्रोथ अच्छी हुई। जिस पौधे से तेल या दूध निकलता हो, उसे चंदन के पास लगाने से बचना चाहिए। चंदन के साथ हेज घास और शुरुआत में अरहर के पौधे लगाए जा सकते हैं, जिससे उसे पोषण मिलता है। नीम, खेजड़ी, नींबू, अमरूद और केर जैसे पौधे भी इसके साथ लगाए जा सकते हैं।

चंदन करीब 15 साल में मैच्योर होता है। हार्डवुड करीब 15 किलो तक हो सकता है। लकड़ी की कीमत 10 से 12 हजार रुपए किलो तक होती है।

यानी एक पेड़ की कीमत करीब एक से डेढ़ लाख रुपए तक होती है। ये किसानों के लिए एफडी की तरह हैं। फिलहाल 60 बीघा जमीन में से 1 हेक्टेयर में रिसर्च प्लांट बना रखा है, जहां 50 चंदन के पौधे हैं।

एग्रो फॉरेस्ट्री पर रिसर्च के साथ किसानों को कर रहे जागरूक

नवहिंद बताते हैं- एग्रो फॉरेस्ट्री पर रिसर्च करने के साथ ही किसानों को भी जागरूक कर रहे हैं। पिछले दो साल से कालीमिर्च की खेती का प्रयोग कर रहे हैं और 10 पौधे सफल हो चुके हैं।

एक बेल से करीब एक किलो कालीमिर्च मिले तो यह करीब 1,000 रुपए तक बिक सकती है। खेत की मेड़ पर उन्होंने 20 सतावरी के पौधे भी लगाए हैं। एक पौधा करीब दो साल में तैयार होता है और इससे एक किलो तक जड़ मिल सकती है, जिससे पाउडर बनाया जाता है। इसके अलावा हाडसांकल, नाकतोड़ा, नरगुड़ी और अर्जुन जैसे पौधे भी लगाए हैं।

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