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3 घंटे पहले
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मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार
डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी ग्राहम बिल पर हस्ताक्षर कर उसे कानूनी रूप दे दिया है। इसके तहत रूस से तेल आयात करने वाले या प्रतिबंधों से बचने में उसकी मदद करने वाले चीन और भारत जैसे देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। यह कानून 30 दिन में प्रभावी हो जाएगा और संबंधित देशों को इसका पालन करने के लिए 180 दिन का समय दिया गया है।
कानून में राष्ट्रपति को यह तय करने के अधिकार दिए गए हैं कि किन देशों पर टैरिफ लगाया जाए, दर कितनी हो और यहां तक कि वे टैरिफ से छूट भी दे सकते हैं। लेकिन ट्रम्प पर पड़ रहे राजनीतिक दबावों को देखते हुए सबसे खराब स्थिति के लिए तैयारी करना ही बेहतर होगा। अमेरिका में भारतीय निर्यात पर फिर-से भारी टैरिफ लगाए जाने का असर हमारी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों पर भी पड़ेगा।
भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया कि भारत अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और बदलती बाजार स्थितियों के अनुसार वह अलग-अलग स्रोतों के जरिए ऐसा करता रहेगा। इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ हुई चर्चा में भारत की ओर से न सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी इसके संभावित प्रभावों को रख दिया गया है।
विविध स्रोतों से तेल खरीदने की बात के बावजूद हकीकत यह है कि पिछले एक साल में भारत अपनी तेल जरूरतों की 30% से 52% तक खरीद रूस से करता रहा है। अगस्त में भारत ने 85 लाख टन तेल खरीदा, जिसकी कीमत 4.7 अरब डॉलर थी। वहीं जुलाई में भारत ने रिकॉर्ड 110.4 लाख टन तेल खरीदा, जिसकी कीमत 7.3 अरब डॉलर थी।
इसलिए इसे कैसे भी देखा जाए, रूसी तेल से दूरी बनाने का फैसला भारत के लिए भारी पड़ेगा। अमेरिका के साथ हमारे इतिहास को देखते हुए जनता के लिए बेहतर होगा कि वह सरकार के इस बेबाक रुख को थोड़ी सावधानी से देखे। क्योंकि, बीते एक दशक में हमारी सरकार तेल के मामले में कई बार अमेरिकी दबाव के आगे नरम पड़ चुकी है।
2016-17 में भारत की कुल तेल खरीद का 6.7% तेल वेनेजुएला से आता था। लेकिन 2019 में ट्रम्प ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगा दिए और 2021-22 तक यह आयात समाप्त हो गया। ईरान के मामले में अनुभव इससे भी बड़ा था। नवंबर 2018 में अमेरिका द्वारा ‘मैक्सिमम प्रेशर’ पॉलिसी के तहत प्रतिबंध लगाए जाने से पहले ईरान भारत की तेल जरूरतों का करीब 10% हिस्सा आपूर्ति करता था। लेकिन प्रतिबंधों के बाद भारत ने ईरान से तेल खरीद में कटौती की और 2020-21 तक यह आयात शून्य हो गया। मार्च से जून 2026 के बीच अमेरिका ने सीमित अवधि के लिए ईरानी तेल का आयात मंजूर किया तो भारत के तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी बढ़कर 1.1% हो गई।
यूक्रेन युद्ध से पहले भारत रूसी तेल का बड़ा आयातक नहीं था। यूक्रेन पर रूस के हमले और रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद तेल कीमतों में उछाल आया और भारत को ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए रूस का रुख करना पड़ा। रूस ने भी तेल कीमतों में भारी छूट दी और अंतरराष्ट्रीय कीमतों को काबू में रखने के लिए पश्चिमी देशों ने भी चुपचाप भारत द्वारा की जा रही रूसी तेल की खरीद को प्रोत्साहित किया। लेकिन अगस्त 2025 में ट्रम्प ने रूसी तेल आयात करने के कारण भारत पर टैरिफ 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया तो भारत ने धीरे-धीरे रूस से तेल आयात कम करना शुरू किया।
परंतु इस साल फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प टैरिफ को खारिज कर दिया और भारत की रूसी तेल की खरीद फिर बढ़ने लगी। इस स्थिति से निपटने के मामले में चीन की तुलना में भारत के पास विकल्प सीमित हैं। बीजिंग के पास रेयर अर्थ और मैग्नेट के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसा मजबूत हथियार है, जिसका असर अमेरिका में ईवी, रोबोटिक्स और रक्षा क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसके अलावा, चीन अमेरिका को दवाएं बनाने के लिए जरूरी 70% से अधिक एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स की सप्लाई भी करता है। ऐसे ही कई अन्य उत्पादों की सप्लाई भी की जाती है।
इतिहास को देखते हुए जनता के लिए बेहतर होगा कि वह सरकार के इस बेबाक रुख को थोड़ी सावधानी से देखे। क्योंकि, बीते एक दशक में हमारी सरकार तेल के मामले में कई बार अमेरिकी दबाव के आगे नरम पड़ चुकी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

