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संजय कुमार का कॉलम:उत्तर प्रदेश के चुनाव में किस तरफ जाएंगे दलित वोट?




उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का वक्त है, लेकिन राज्य की राजनीति में अभी से चुनावी रंगत दिखने लगी है। राजनीतिक दल मतदाताओं को लामबंद करने के मुद्दे तलाशने लगे हैं। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की रैली ऐसा ही मुद्दा बन कर उभरी है। इस रैली को मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा संबोधित करने के बाद कुछ लोगों ने वहां पूजा की, जिसे शुद्धिकरण पूजा बताया गया। कांग्रेस अब इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश में है। हालांकि, पार्टी जानती है कि राज्य में उसका दलित समर्थन बेहद कम है, फिर भी वह इन समुदायों में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पार्टी दलित मतदाताओं को लामबंद करने और उन्हें फिर अपने पाले में लाने के लिए इस घटना का इस्तेमाल करने की भरसक कोशिश कर रही है। फिलहाल कांग्रेस को दलितों के करीब 4-5% वोट ही मिलते हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा था, जब उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों की पहली और सबसे लोकप्रिय पसंद कांग्रेस होती थी। पार्टी पूरी ताकत झोंक रही है, लेकिन यह समय बताएगा कि वह दलित मतदाताओं को बसपा से तोड़ कर अपने पाले में लाने में कितनी सफल हो पाती है। हालांकि उत्तर प्रदेश में बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राजनीतिक दल दलित वोटरों को लामबंद करने की कोशिश करेंगे या नहीं- वे निश्चित ही करेंगे। बड़ा सवाल यह है कि कितने दलित वोट अब भी एक से दूसरी पार्टी में इधर-उधर हो सकते हैं और कौन-सा दल या गठबंधन इतनी बड़ी संख्या में इन वोटरों को आकर्षित कर सकता है कि 2027 के चुनाव को प्रभावित कर सके। बसपा दलित वोटरों की सबसे लोकप्रिय पसंद रही है। हालांकि उसका प्रभाव जाटवों में ज्यादा और गैर-जाटव दलितों में कुछ कम रहा है। वर्षों तक बड़ी संख्या में जाटवों ने बसपा को वोट दिया, लेकिन हालिया चुनावों में इसमें कुछ गिरावट दिखी है। 2007 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा राज्य में सत्ता में आई थी तब 86% जाटवों ने, जबकि 54% गैर-जाटव दलितों ने बसपा को वोट दिया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा के लिए जाटवों का समर्थन घटकर 65% और गैर-जाटव दलितों का 27% रह गया था। इसमें शायद ही कोई संदेह है कि समय के साथ दलित वोट पर बसपा की पकड़ कमजोर हुई है और भाजपा इस वर्ग में अपनी पैठ बनाने में सफल रही है। हालांकि अब भी ये बढ़त इतनी नहीं कि दलितों को भाजपा का लामबंद वोट बैंक माना जाए। जाटव और गैर-जाटव दलितों के मतदान पैटर्न को अलग-अलग देखें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। जाटवों के बीच भाजपा/एनडीए का समर्थन 2002 में महज 3% था, जो 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर करीब 20% हो गया। वहीं, बसपा का समर्थन 2002 के 76% से घटकर 2022 में 65% रह गया। गैर-जाटव दलित वर्ग में भाजपा/एनडीए का समर्थन 2002 के 12% से बढ़कर 2022 में 40% हो गया, जबकि इसी अवधि में बसपा का समर्थन 45% से घटकर 27% रह गया। आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि दलितों के बीच बसपा के घटते समर्थन का मतलब दलित वोटों का बिखराव नहीं है। बल्कि, दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा बसपा से टूट कर भाजपा की झोली में चला गया है। खासकर गैर-जाटव दलितों में यह बदलाव ज्यादा स्पष्ट है। 2002 से 2022 के बीच गैर-जाटव दलितों में भाजपा/एनडीए का समर्थन 28 प्रतिशत अंक बढ़ा, जबकि जाटवों में यह बढ़ोतरी 17 प्रतिशत अंक रही। बसपा की पकड़ कमजोर होने का असर उत्तर प्रदेश में पार्टी के समग्र प्रदर्शन पर भी दिखता है। पार्टी का वोट शेयर 2007 में 30.4% था, जो 2022 में घटकर 12.8% रह गया। इसी अवधि में भाजपा/एनडीए का वोट शेयर 18.5% से बढ़कर 43.8% हो गया। वहीं सपा/सपा-गठबंधन का वोट शेयर भी 25.4% से बढ़कर 36.3% हो गया।
फिलहाल दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस का समर्थन बेहद कम है। फिर भी, पार्टी दलितों के बीच अपना पुराना समर्थन वापस पाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। पार्टी इसे दलितों में यह संदेश देने का अवसर मान रही है कि दलितों के मुद्दों की सबसे ज्यादा चिंता कांग्रेस ही करती है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कांग्रेस जाटव और गैर-जाटव, दोनों ही दलित समूहों में उल्लेखनीय समर्थन हासिल करने में नाकाम रही है। दोनों समूहों में उसका वोट शेयर एकल अंक में ही बना रहा है। अपवाद सिर्फ 2012 का विधानसभा चुनाव था, जब गैर-जाटव दलितों के 16% वोट कांग्रेस को मिले थे। उत्तर प्रदेश में बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राजनीतिक दल दलित वोटरों को लामबंद करने की कोशिश करेंगे या नहीं- वे निश्चित ही करेंगे। बड़ा सवाल यह है कि कितने दलित वोट अब भी एक से दूसरी पार्टी में इधर-उधर हो सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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