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कहते हैं कि इंसान के सुख या दुख उसकी परिस्थितियों से कम और उसके नजरिए से ज्यादा तय होते हैं। यह बात एक लोक कथा से समझ सकते हैं। पुराने समय में एक आश्रम में दो संत एक साथ एक आश्रम में रहते थे। दोनों का जीवन एक समान ही था। दोनों सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठते, पूजा-पाठ करते, साधना करते और जरूरतमंद लोगों की सहायता करते थे। आश्रम में दूर-दूर से लोग अपनी परेशानियां लेकर आते और दोनों संत उन्हें अपनी बुद्धि से उचित मार्गदर्शन देते। दोनों की सलाह इतनी प्रभावी होती थी कि लोगों की समस्याएं काफी हद तक दूर हो जाती थीं। दोनों संतों के स्वभाव में एक बड़ा अंतर था। पहले संत का नाम था सुखी। वह हर परिस्थिति में प्रसन्न रहता था। चाहे कठिन समय हो या सफलता का अवसर, उसके चेहरे पर हमेशा संतोष और आत्मविश्वास झलकता था। वहीं दूसरे संत का नाम था दुखी। वह हर छोटी-बड़ी बात को लेकर चिंतित रहता, परिणामों को लेकर परेशान रहता और हमेशा किसी न किसी कमी का अनुभव करता था। गांव के लोगों ने दोनों संतों के अलग-अलग स्वभाव की वजह से उनके नाम सुखी-दुखी रख दिए थे। एक दिन दुखी संत ने सोचा कि जब दोनों का जीवन, दिनचर्या और कर्म समान हैं, तो फिर उसके जीवन में अशांति क्यों है? वह अपने गुरु के पास पहुंचा और अपनी शंका व्यक्त की। गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम दोनों के कर्म एक जैसे हैं, लेकिन सोच अलग है। सुखी संत हर परिस्थिति को अवसर मानता है। उसे अपने प्रयासों और ईश्वर पर पूरा विश्वास है। वह परिणाम की चिंता करने के बजाय वर्तमान में अपना श्रेष्ठ कार्य करता है। इसलिए उसका मन शांत रहता है।” फिर गुरु ने दुखी संत से कहा, “तुम हर काम करते समय पहले ही असफलता की कल्पना कर लेते हो। तुम्हें स्वयं पर भरोसा नहीं है और तुम हमेशा दूसरों से तुलना करते रहते हो। यही तुम्हारे दुख का सबसे बड़ा कारण है।” गुरु की बात सुनकर दुखी संत को अपनी भूल समझ आ गई। उसने उसी दिन से अपने विचार बदलने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ा, मन शांत हुआ और जीवन में खुशियां लौटने लगीं। तब उसे एहसास हुआ कि परिस्थितियां नहीं, बल्कि हमारी सोच ही हमारे जीवन की दिशा तय करती है। प्रसंग की सीख
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दुखी संत को गुरु की सीख:खुद पर भरोसा करना सीखें, अपनी क्षमता पर विश्वास होगा, तो कठिन से कठिन लक्ष्य भी संभव लगने लगेगा
