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दतिया विधानसभा उपचुनाव में जीत के दो महीने बाद कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। आरोप है कि उन्होंने नामांकन के समय दिए हलफनामे में 1991 के एक आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी। इसी मामले में दतिया के पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती भी आरोपी हैं और उन्होंने 2023 के चुनावी हलफनामे में इसका उल्लेख किया था। इसी आधार पर भाजपा नेता और अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने 17 सितंबर को याचिका दायर कर घनश्याम सिंह का निर्वाचन शून्य घोषित करने की मांग की है। अब अदालत में यह सवाल उठेगा कि संबंधित मामले की जानकारी हलफनामे में देना जरूरी था या नहीं। पढ़िए मंडे स्टोरी…. अब वो मामला जिसका हलफनामे में जिक्र नहीं राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रदर्शन और चक्काजाम, FIR दर्ज हुई थी मामला मई 1991 का है। राजीव गांधी की हत्या के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे। दतिया में भी प्रदर्शन और चक्काजाम हुआ। दतिया कोतवाली पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 24 मई 1991 को किला चौक के प्रदर्शन को लेकर अपराध क्रमांक 142/91 दर्ज किया गया था। तत्कालीन थाना प्रभारी एमएल त्यागी की शिकायत पर दर्ज FIR में IPC की धारा 188, 353, 332, 436, 147 और 148 के तहत करीब 22 लोगों को नामजद किया गया था। इनमें कांग्रेस नेता राजेंद्र भारती, महेंद्र बौद्ध और घनश्याम सिंह भी शामिल थे। पुलिस ने 29 सितंबर 1991 को जांच पूरी कर कोर्ट में चालान पेश किया। 16 अगस्त 1991 को माधवराव सिंधिया के समर्थन में हुए एक अन्य प्रदर्शन में भी अपराध क्रमांक 246/91 के तहत घनश्याम सिंह, राजेंद्र भारती समेत कई लोगों पर IPC की धारा 341 के तहत रास्ता रोकने का मामला दर्ज हुआ था। राजेंद्र भारती ने हलफनामे में केस बताया, घनश्याम सिंह पर जानकारी छिपाने का आरोप याचिकाकर्ता का तर्क है कि 1991 के दोनों मामलों का उल्लेख राजेंद्र भारती ने 2023 के चुनावी हलफनामे में किया था। उनके हलफनामे के अनुसार, कोतवाली दतिया की FIR नंबर 142/90-91 और 246/90-91 में अभी आरोप तय नहीं हुए थे। 13 जुलाई 2026 को नामांकन दाखिल करते समय घनश्याम सिंह ने कोतवाली दतिया के दो लंबित मामलों-केस नंबर 453/2020 और 378/2020-की जानकारी दी। याचिका के अनुसार, उनके हलफनामे में 1991 के दोनों मामलों का उल्लेख नहीं था। विधायक बोले- “मुझे केस की जानकारी नहीं थी” विधायक घनश्याम सिंह ने कहा, “1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद देश भर में आंदोलन हुए थे। यदि उस दौरान पुलिस ने कोई मामला दर्ज किया भी था, तो मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी।’ ‘यह मामला कभी मेरे सामने अदालती सुनवाई या समन के रूप में नहीं आया। मैं कानूनी दस्तावेज देखने के बाद ही इस पर विस्तृत जवाब दूंगा।” क्या हलफनामे में केस नहीं बताने पर निर्वाचन रद्द हो सकता है? चुनावी हलफनामे (Form-26) में पुरानी FIR की जानकारी देना जरूरी है या नहीं, इस मुद्दे पर अदालतों के अलग-अलग फैसले रहे हैं। मध्यप्रदेश के दो मामलों से समझिए कानूनी असर एक्सपर्ट बोले- केस छिपाना और जानकारी न होना अलग-अलग बातें सीनियर एडवोकेट अजय गुप्ता के मुताबिक, चुनावी हलफनामे में उम्मीदवार को सभी जानकारी सही-सही देनी होती है। लेकिन यदि उम्मीदवार को अपने खिलाफ दर्ज किसी मामले की जानकारी ही नहीं है, तो उसके हलफनामे में वह जानकारी कैसे आएगी? गुप्ता ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के 2020 के राज्यसभा चुनाव का उदाहरण दिया। तब कांग्रेस ने उनके हलफनामे पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया था कि उन्होंने भोपाल के श्यामला हिल्स में दर्ज मामले की जानकारी छिपाई। मामला हाईकोर्ट पहुंचा। गुप्ता के मुताबिक, कोर्ट ने कहा था कि जब सिंधिया को केस की जानकारी ही नहीं थी, तो इसे जानकारी छिपाने का मामला नहीं माना जा सकता। यदि घनश्याम सिंह को मामले की जानकारी थी और इसके बावजूद उन्होंने हलफनामे में इसे दर्ज नहीं किया, तो यह आपराधिक मामला बन सकता है। घनश्याम सिंह 6 हजार वोटों से उपचुनाव जीते यह उपचुनाव कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को एक मामले में 2 साल की सजा होने के बाद उनकी सदस्यता जाने से हुआ था। 30 जुलाई 2026 को हुए चुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया। अब हाईकोर्ट में यह तय होगा कि 1991 के मामले की जानकारी हलफनामे में नहीं देने का उनके निर्वाचन पर क्या कानूनी असर पड़ता है।
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दतिया विधायक घनश्याम सिंह को जानकारी छिपाना पड़ेगा महंगा?:जिस केस को लेकर याचिका उसमें पूर्व एमएलए राजेंद्र भारती भी आरोपी, जानिए कानूनी असर
