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पन्ना में रविवार से पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है। सोमवार को धरम सागर तालाब पर करीब 500 श्रद्धालु अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान करने पहुंचे। यहां पितृपक्ष के दौरान करीब 300 साल पुरानी परंपरा निभाई जाती है। कुशा, तिल, जौ और जल से मंत्रोच्चार के बीच तर्पण किया गया, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय रहा। 16 दिनों तक भगवान जुगल किशोर भी करते हैं तर्पण मान्यता है कि पितृपक्ष के 16 दिनों में भगवान जुगल किशोर सरकार भी आम लोगों की तरह अपने पूर्वजों को जल तर्पण देने धरम सागर तालाब जाते हैं। पुजारी मुकेश कुमार शर्मा ने बताया कि इन 16 दिनों में भगवान जुगल किशोर पीले वस्त्र छोड़कर सफेद कपड़े धारण करते हैं। वे भी कुशा, तिल और जल से अपने पितरों का तर्पण करते हैं। महाराजा हिंदूपत जू देव के समय बना था तालाब धरम सागर तालाब का ऐतिहासिक महत्व भी है। इसका निर्माण महाराजा हिंदूपत जू देव के समय कराया गया था। मान्यता के अनुसार तालाब के निर्माण के दौरान देश की सात पवित्र नदियों का जल इसमें मिलाया गया था। इसी वजह से पितृपक्ष में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं। दानवीर राजा कर्ण से जुड़ी है पितृपक्ष की मान्यता पितृपक्ष में तर्पण और दान की परंपरा का संबंध महाभारत के दानवीर राजा कर्ण से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, कर्ण ने जीवनभर स्वर्ण का दान किया था। यमलोक पहुंचने पर उन्हें भोजन के रूप में भी स्वर्ण ही मिला। कारण पूछने पर उन्हें पता चला कि उन्होंने जीवन में कभी पितरों को जल या अन्न का दान नहीं किया था। तस्वीरे देखिए… 16 दिन पृथ्वी पर लौटकर किया श्राद्ध मान्यता के अनुसार, इसके बाद राजा कर्ण को आश्विन माह के 16 दिनों के लिए पृथ्वीलोक लौटने की अनुमति मिली। इस दौरान उन्होंने अन्न, जल और तिल का दान कर अपने पितरों का श्राद्ध किया। तभी से पितृपक्ष में तर्पण और दान की परंपरा परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए निभाई जाती है।
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पितरों के तर्पण को धरम सागर पहुंचे 500 श्रद्धालु:300 साल पुरानी परंपरा निभाई; मान्यता भगवान जुगल किशोर भी करते हैं तर्पण
