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नौकरी के बदले जमीन यानी लैंड फॉर जॉब केस में लालू फैमिली को बड़ी राहत मिली है। केस की सुनवाई कर रहे स्पेशल जज विशाल गोगने का ट्रांसफर हो गया है। लालू फैमिली इन्हें बदलने के लिए कोर्ट का दरवाजा तक खटखटा चुकी थी, लेकिन उस वक्त राहत नहीं मिली थी। आखिर कौन हैं जज विशाल गोगने, लालू फैमिली उन्हें क्यों हटाना चाहती थी, केस में आगे क्या होगा, पूरी कहानी 3 चैप्टर में जानेंगे; बूझे की नाही में…। जज विशाल गोगने ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के तीन वर्षीय लॉ प्रोग्राम से पढ़ाई की। उसके बाद उन्होंने 2006 में न्यायिक सेवा ज्वाइन की। 2017 में द्वारका जिला अदालत में सीनियर सिविल जज-कम-रेंट कंट्रोलर रहे। इसके बाद दिल्ली न्यायिक अकादमी में अतिरिक्त निदेशक की जिम्मेदारी संभाली। वह कड़कड़डूमा कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश और रोहिणी कोर्ट में चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट भी रह चुके हैं। समय के साथ उनकी पहचान ऐसे जज के तौर पर बनी, जो कानूनी प्रक्रिया को लेकर सख्त हैं। हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से भी वह पीछे नहीं हटे। जब पिता ही बेटे के खिलाफ कोर्ट पहुंच गए ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 में जब वह मजिस्ट्रेट थे, तब उनके पिता ओपी गोगने ने ही उनके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया था। पिता ओपी गोगने भी न्यायिक अधिकारी रह चुके थे। उन्होंने अपने बेटे के हिंदू धर्म से ईसाई धर्म अपनाने और अपनी ममेरी बहन से शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन के मामले को कोर्ट में चुनौती दी थी। पिता का तर्क था कि यह शादी ‘सपिंड’ यानी ब्लड रिलेशन में आती है। ऐसे रिश्ते में पति-पत्नी के बीच पिछले तीन से पांच पीढ़ियों के भीतर कोई समान पूर्वज होता है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत ऐसा विवाह प्रतिबंधित है। एक फैसले में जेल में रह रहे बच्चे के अधिकार की बात की ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गोगने के कई फैसले ऐसे भी हैं, जिनमें उन्होंने आरोपी के अधिकारों के साथ-साथ उसके बच्चे के अधिकारों पर भी ध्यान रखा। द्वारका जिला अदालत में तैनाती के दौरान अप्रैल 2021 में उन्होंने एक महिला को जमानत दी थी। महिला पर अपनी भाभी का गर्भपात कराने और दहेज हत्या का आरोप था। महिला तिहाड़ जेल में अपने 21 महीने के बेटे के साथ बंद थी। जज ने जमानत देते समय बच्चे की स्थिति को भी ध्यान में रखा। अपने आदेश में उन्होंने लिखा, ‘प्री-स्कूल और शिक्षा को बेहतर बनाने के अन्य विकल्प तिहाड़ की सेंट्रल जेल के भीतर निश्चित रूप से सीमित होंगे। चूंकि मुकदमा अभी शुरू भी नहीं हुआ है और इसे पूरा होने में काफी समय लगने की संभावना है, इसलिए आरोपी का लगभग दो साल का बेटा अपने शुरुआती बचपन का समय जेल में बिताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसा होना एक व्यक्ति के रूप में उसके स्वस्थ विकास के अधिकार का उल्लंघन होगा।’ जज विशाल गोगने के कड़कमिजाजी के 3 किस्से… 1. कोर्ट स्टाफ से लेकर वकील तक को लगाई फटकार स्पेशल जज विशाल गोगने अगस्त 2025 में लालू फैमिली से जुड़े जमीन के बदले नौकरी के CBI केस की सुनवाई कर रहे थे। सुनवाई के दौरान एक वकील ने कोर्ट स्टाफ के साथ कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा सख्ती दिखाई। इस पर जज ने उन्हें फटकार लगाई। उन्होंने कहा, ‘मेरा कोर्ट स्टाफ मेरा ही अंग है। वे सरकारी कर्मचारी हैं। उनके साथ भी उतना ही सम्मान होना चाहिए, जितना जज के साथ होता है।’ उसी महीने एक दूसरे मामले में उन्होंने एक वकील के बहस करने से इनकार पर भी सख्त रुख अपनाया। वकील ने यह कहते हुए बहस करने से इनकार कर दिया कि हम लोग पुलिसकर्मियों को पुलिस स्टेशनों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में गवाही देने की अनुमति देने वाली उपराज्यपाल (LG) की अधिसूचना के खिलाफ हड़ताल पर हैं। जज ने अपने आदेश में कहा कि वकील को आरोप तय करने के मुद्दे पर बहस के 3 अलग-अलग मौके दिए गए थे। इनमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बहस करने का विकल्प भी शामिल था। इसके बावजूद वकील ने बहस करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि वकील ने बहस करने का अपना अधिकार खो दिया है और स्थगन मांगने का उसका आधार पूरी तरह ‘स्वार्थ से प्रेरित’ था। 2. ED से कहा-कानून से मिली शक्तियों को खुद की शक्तियां मत मानिए अप्रैल 2024 में भी जज गोगने का एक आदेश काफी चर्चा में रहा। उन्होंने लालू फैमिली से जुड़े जमीन के बदले नौकरी घोटाला मामले के आरोपी अमित कात्याल की अंतरिम जमानत बढ़ाने से इनकार किया था। लेकिन इसी दौरान उन्होंने ED की जांच के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए। मामला आरोपी के इलाज से जुड़ा था। ED ने मेदांता और अपोलो में उसका इलाज कर रहे डॉक्टरों के बयान PMLA के तहत दर्ज किए थे। जज ने PMLA जैसी कड़ी कानून व्यवस्था के इस्तेमाल पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा था कि इतिहास सिखाता है कि मजबूत नेता, कानून और एजेंसियां ‘आमतौर पर उन्हीं नागरिकों के लिए मुसीबत बन जाती हैं, जिनकी रक्षा करने का वे संकल्प लेते हैं।’ 3. नेशनल हेराल्ड केस में ED की जांच पर उठाए सवाल नेशनल हेराल्ड से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नाम वाली प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट कोर्ट में दाखिल की थी। प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट को चार्जशीट के बराबर माना जाता है। लेकिन जज गोगने ने इस पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि PMLA के तहत किसी शेड्यूल्ड अपराध की जांच के लिए FIR का होना जरूरी है। 117 पन्नों के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि पुराने CrPC की धारा 223 के तहत किसी निजी व्यक्ति की ओर से कोर्ट में दाखिल शिकायत, भले ही उसमें शेड्यूल्ड अपराध सामने आता हो, ED को जांच करने का अधिकार नहीं देती। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी जांच का आधार FIR होना चाहिए, निजी शिकायत नहीं। दरअसल, इस मामले में निजी शिकायत 2013 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने की थी। जज ने यह भी कहा कि ED ने अपनी ही सामान्य प्रक्रिया से अलग जाकर जांच की। आम तौर पर ED अपनी जांच के लिए CBI की FIR और चार्जशीट को आधार बनाता रहा है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ED ने इस पूरी प्रक्रिया को ही उलट दिया। यानी जज के आदेश का मूल आधार यह था कि जिस जांच की शुरुआत FIR से नहीं हुई, वह कानून के तहत स्वीकार्य नहीं थी। दिसंबर 2025 में बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने राउज एवेन्यू कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में एक याचिका दायर की। उन्होंने अपनी याचिका में अपने खिलाफ चल रहे चार मामलों को जज गोगने की अदालत से दूसरी अदालत में ट्रांसफर करने की मांग की। इनमें IRCTC होटल घोटाला मामला, जमीन के बदले नौकरी का मामला और इनसे जुड़े दोनों मनी लॉन्ड्रिंग के मामले शामिल थे। राबड़ी देवी ने याचिका में आरोप लगाया था कि उनके और उनके परिवार के खिलाफ मामलों की सुनवाई असामान्य रूप से ‘जल्दबाजी’ में की जा रही है। 16 दिसंबर 2025 को राबड़ी देवी के वकील ने कोर्ट में कहा कि जज के सामने कुल 29 मामले लंबित हैं, लेकिन किसी दूसरे मामले की सुनवाई में ऐसी जल्दबाजी नहीं दिखाई जा रही, जैसी राबड़ी देवी और उनके परिवार से जुड़े मामलों में हो रही है। वकील ने आगे आरोप लगाया कि जज का रवैया जांच एजेंसियों (CBI और ED) के प्रति नरम और आरोपियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। दरअसल, जज गोगने ने लालू यादव की केस से जुड़े 1,600 से अधिक दस्तावेजों को मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने इसे ‘सुनवाई में देरी करने की रणनीति’ बताया था। हालांकि, जिला एवं सत्र अदालत ने दिसंबर 2025 में लालू परिवार की इस ट्रांसफर याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था। लैंड फॉर जॉब से जुड़े ED केस की सुनवाई राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज विशाल गोगने कर रहे थे। उनका तबादला 3 अगस्त 2026 को द्वारका कोर्ट में फैमिली कोर्ट का अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश बना दिया गया। उनकी जगह राउज एवेन्यू कोर्ट में प्रशांत कुमार को भेजा गया। इस मामले की 30 सितंबर 2026 को नए जज प्रशांत कुमार की कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान स्पेशल जज प्रशांत कुमार ने कहा कि आरोप तय करने के बिंदु पर नई दलीलें रखने के लिए जांच एजेंसी कुछ और समय चाहती है। अदालत इसे स्वीकार करती है। साथ ही कोर्ट ने अगली तारीख 14 अक्टूबर तय कर दी। बताया जा रहा है कि नए जज की कोर्ट में लालू फैमिली पर आरोप तय के बिंदु पर नए सिरे से दलीलें सुनी जाएगी। दरअसल, इस मामले में पूर्व स्पेशल जज विशाल गोगने की कोर्ट ने आरोप तय करने पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था। इस बीच उनका ट्रांसफर हो गया। इस केस में पूर्व रेल मंत्री लालू यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, मीसा भारती, तेजस्वी यादव, हेमा यादव और तेज प्रताप यादव आदि आरोपी हैं।
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राबड़ी जिन्हें केस से हटवाना चाहती थीं, अब उनका ट्रांसफर:कौन हैं जज विशाल गोगने, जिनके खिलाफ पिता तक कोर्ट गए, लालू फैमिली को क्या मिलेगी राहत
