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Punjab High Court Dismisses Plea Against 1997 Government Recruitment Case


पंजाब में साल 1997 में हुई स्वीपर-कम-चौकीदार, स्वीपर और चौकीदार समेत अन्य पदों की सरकारी भर्ती का करीब 30 साल पुराना विवाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

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कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता चयन प्रक्रिया में मनमानी, पक्षपात या भाई-भतीजावाद के आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके। वहीं, चयनित कर्मचारी करीब तीन दशक तक सेवा कर चुके हैं, इसलिए इतने लंबे समय बाद उनकी नियुक्तियों को रद्द करना उचित नहीं होगा।

जस्टिस संदीप मौदगिल ने बूटा सिंह व अन्य की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने 1997 में हुई संबंधित चयन प्रक्रिया और नियुक्तियों को रद्द करने के साथ उन्हें नियुक्ति देने की मांग की थी।

पंजाब में हुई नियुक्तियों पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।

पंजाब में हुई नियुक्तियों पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।

3000 उम्मीदवारों के इंटरव्यू पर उठाए थे सवाल याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चयन समिति ने पंजाब में हुई इस भर्ती प्रक्रिया में मनमाने तरीके से उम्मीदवारों का चयन किया। उनका दावा था कि करीब 3000 उम्मीदवारों का महज तीन दिन में इंटरव्यू लिया गया, जिससे सभी उम्मीदवारों का सही मूल्यांकन संभव नहीं था। कुछ चयनित उम्मीदवारों की उम्र और पात्रता पर भी सवाल उठाए गए थे। एक याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसके पास करीब 900 दिन का अनुभव होने के बावजूद उससे कम योग्य उम्मीदवारों को चयनित कर लिया गया।

सरकार ने कहा- 3000 नहीं, 1442 उम्मीदवार हुए शामिल राज्य सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया। सरकार की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि इंटरव्यू में करीब 3000 नहीं, बल्कि 1442 उम्मीदवार शामिल हुए थे। अलग-अलग पदों और श्रेणियों के लिए चयन समिति के अलग-अलग सदस्यों ने विभिन्न तारीखों पर उम्मीदवारों का मूल्यांकन किया था। उम्मीदवारों को उनके प्रदर्शन, उपयुक्तता और सामान्य योग्यता के आधार पर अंक दिए गए। इसके बाद तैयार अंतिम चयन सूची को चयन समिति के सभी सदस्यों ने मंजूरी दी थी।

सिर्फ संदेह से चयन प्रक्रिया रद्द नहीं हो सकती हाईकोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं की ओर से ठोस सबूत पेश नहीं किए गए। केवल संदेह के आधार पर चयन प्रक्रिया को मनमाना नहीं माना जा सकता। इसी तरह पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप भी पर्याप्त साक्ष्य के बिना स्वीकार नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन समिति के मूल्यांकन में अदालत अपीलीय प्राधिकारी की तरह बैठकर उम्मीदवारों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।

कई कर्मचारी रिटायर, कुछ की मौत; कई प्रमोशन पा चुके हाईकोर्ट ने कहा कि 1997 में चयनित कर्मचारियों में कई अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। कुछ की मृत्यु हो चुकी है, जबकि कुछ इस्तीफा दे चुके हैं। वहीं कई कर्मचारी पदोन्नति के बाद अभी सेवा में हैं। ऐसे में करीब तीन दशक बाद नियुक्तियों को चुनौती देने से पहले से बनी स्थिति प्रभावित होगी। कोर्ट ने कहा कि निजी प्रतिवादियों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, जिनके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

16 साल तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुआ केस हाईकोर्ट ने इस मामले के करीब 16 साल तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं होने पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने 13 जुलाई 2000 को मामले को एक साल के भीतर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था, लेकिन यह 25 अप्रैल 2016 को ही सूचीबद्ध हो सका।

व्यवस्था को मजबूत करने के भी निर्देश कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि समयबद्ध सुनवाई और मामलों की सूचीबद्धता संबंधी न्यायिक आदेशों के पालन में किसी प्रणालीगत या प्रक्रियागत कमी की जांच की जाए। जरूरत होने पर प्रभावी संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने के भी निर्देश दिए गए।

भर्तियों को करीब 30 साल बाद चुनौती दी गई यानी 1997 में पंजाब में हुई इन भर्तियों को करीब 30 साल बाद चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज करते हुए लंबे समय से सेवा कर रहे कर्मचारियों की नियुक्तियों को इस आधार पर दोबारा खोलने से इनकार किया कि भर्ती में गड़बड़ी के ठोस सबूत सामने नहीं रखे गए।



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