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Punjab Corruption Case | High Court Orders CBI Probe


CM भगवंत मान और उनके OSD राजबीर सिंह घुम्मन की फाइल फोटो।

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ED के बाद CBI की भी एंट्री हो गई है। पंजाब के मुख्यमंत्री के ऑफिस से जुड़े सरकारी टेंडर, ट्रांसफर-पोस्टिंग समेत कई मामलों में कथित करप्शन के मामले की जांच अब CBI करेगी। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सोमवार को क

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चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की पीठ ने कहा-

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पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस निष्पक्ष जांच करने में CBI को हरसंभव मदद करेंगे।

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यह फैसला एडवोकेट निखिल सर्राफ की तरफ से दायर याचिका पर आया है। याचिका में कहा गया कि ED की तरफ से सीएम भगवंत मान के OSD राजबीर सिंह घुम्मन के खिलाफ लगे आरोपों को लेकर DGP को चिटि्ठयां भेजी गई थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

ED का दावा है कि नितिन गोहल नामक व्यक्ति सरकार से लाभ प्राप्त करने के इच्छुक लोगों के बीच बिचौलिए की भूमिका निभा रहा था। ये आरोप ट्रांसफर-पोस्टिंग, कॉन्फिडेंशियल सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच, हथियार लाइसेंस दिलाने और अन्य लाभों से संबंधित हैं।

अब विस्तार से पढ़िए पूर मामला…

  • डीजीपी को पत्र भेजकर FIR की मांग की: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पंजाब के डीजीपी गौरव यादव को चिट्ठियां भेजकर कथित भ्रष्टाचार और सरकारी कामकाज में दखल के मामले में FIR दर्ज करने की मांग की है। ED की जांच में ट्रांसफर-पोस्टिंग, सरकारी टेंडर, नीतिगत फैसलों, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और दूसरे सरकारी कामों को प्रभावित करने के आरोप सामने आने की बात कही गई है। जुलाई और अगस्त 2026 में भेजे गए पत्रों को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में भी मामला पहुंचा।
  • जांच CM के OSD का नाम सामे आया: ED की कार्रवाई में नितिन गोहल, रियल एस्टेट कारोबारी अजय सहगल, सुरेश कुमार बजाज और अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं। जांच में मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन से जुड़े संपर्कों का भी उल्लेख किया गया है। ED का आरोप है कि कुछ लोग सरकारी अधिकारियों की पोस्टिंग-ट्रांसफर और दूसरे प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित करने के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा रहे थे।
  • ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर टेंडर तक: ED के मुताबिक, जांच में मिले चैट और अन्य सामग्री में अधिकारियों की पोस्टिंग, तबादलों और सरकारी पदों पर नियुक्ति से जुड़ी बातचीत का उल्लेख है। मार्कफेड के टेंडर, अधिकारियों की पोस्टिंग, लाइसेंस और अन्य सरकारी मंजूरियों को प्रभावित करने के आरोप भी लगाए गए हैं। ED ने भ्रष्टाचार निवारण कानून के साथ-साथ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी धाराओं के तहत अपराध बनने की बात कही है।
  • ED को तलाशी में क्या मिला: ED ने मई 2026 में नितिन गोहल, अजय सहगल और अन्य से जुड़े ठिकानों पर तलाशी ली थी। एजेंसी के मुताबिक इस दौरान दस्तावेज और डिजिटल सामग्री मिली। करीब एक करोड़ रुपए नकद बरामद होने का भी दावा किया गया है। ED ने मोबाइल फोन से मिले वॉट्सऐप चैट और कॉल रिकॉर्ड को भी जांच का हिस्सा बनाया है।
  • जमीन और रियल एस्टेट का एंगल: मामला एक बड़े चेंज ऑफ लैंड यूज (सीएलयू) और मनी लॉन्ड्रिंग जांच से भी जुड़ा है। ED की कार्रवाई मूल रूप से करीब 348 करोड़ रुपए के सनटेक सिटी प्रोजेक्ट से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान आगे बढ़ी। एजेंसी ने आरोप लगाया कि सरकारी अधिकारियों के जरिए कुछ रियल एस्टेट संस्थाओं को जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और दूसरी मंजूरियां दिलाने की कोशिश की गई।

FIR दर्ज न होने पर हाईकोर्ट पहुंची ED

ED के पत्र के बाद पंजाब पुलिस ने मामले को सीधे एफआईआर में बदलने के बजाय ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन से कानूनी राय मांगी। इसी बीच ED ने दोबारा पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की। सितंबर में ED ने हाईकोर्ट को बताया कि पंजाब पुलिस को उसकी ओर से कई पत्र भेजे जा चुके हैं, लेकिन FIR दर्ज नहीं हुई।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अगस्त 2026 में इस मामले पर पंजाब सरकार से जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा कि लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और राज्य से सावधानीपूर्वक जवाब अपेक्षित है। ED को डीजीपी को भेजे गए अपने पत्र कोर्ट के सामने रखने को भी कहा गया। सितंबर में मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया। इसके बाद अब कोर्ट ने CBI जांच के आदेश किए हैं।

सरकार ने आरोपों से इनकार किया मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ED के आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें बेबुनियाद बताया था। नितिन गोहल ने भी ED के आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि चैट तथा बातचीत को गलत संदर्भ में पेश किया गया।

पंजाब में CBI जांच से जुड़ी 2 अहम बातें…

  • सीधे किसी केस की जांच नहीं कर सकती CBI: पंजाब सरकार ने 6 नवंबर 2020 को सीबीआई की जनरल कंसेंट वापस ले ली थी। उस वक्त पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार थी। इसके बाद CBI जांच के लिए आमतौर पर राज्य सरकार की केस-टू-केस मंजूरी की जरूरत होती है। जनरल कंसेंट वापस लेने का आधार दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट एक्ट की धारा 6 है, जिसके तहत राज्य की सहमति जरूरी होती है।
  • क्या इस मामले में सरकार से मंजूरी लेनी होगी: नहीं, जिन मामलों में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट यानी अदालत के आदेश हों या सीबीआई को पहले से वैध अधिकार मिला हो, वहां जांच संभव है। इसलिए इस मामले में CBI जांच कर सकती है। हाईकोर्ट ने भी पुलिस और सरकार को साफ कहा है कि वह CBI को सहयोग करें।

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