बठिंडा में फर्जी कॉल सेंटर में ठगी का पूरा नेटवर्क:नौकरी का झांसा, फर्जी सिम और किराए के खाते, युवतियां करती थीं कॉलिंग




बठिंडा में 16 दिन पहले भट्टी रोड स्थित अग्रवाल कॉलोनी में पकड़े गए फर्जी जॉब कॉल सेंटर की गई जांच में ठगी के नेटवर्क की कड़ियां सामने आई है। नौकरी का झांसा देकर युवाओं से रकम वसूलने वाले गिरोह ने सिर्फ फर्जी वेबसाइट और फोन कॉल का सहारा नहीं लिया, बल्कि ठगी की रकम मंगवाने के लिए अलग-अलग बैंक खातों और पहचान छिपाने के लिए कई सिम कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था। पुलिस जांच में सामने आया है कि गिरोह के सरगना रजत बंसल और बाल कृष्ण युवाओं को नौकरी का झांसा देने के बाद रजिस्ट्रेशन, मेडिकल टेस्ट, दस्तावेज वेरिफिकेशन, प्रोसेसिंग और ट्रेनिंग जैसी अलग-अलग फीस के नाम पर रकम वसूलते थे। शुरुआत में युवाओं से 2 से 3 हजार रुपए तक की राशि मांगी जाती थी। जांच के अनुसार, पूरी प्रक्रिया में कुछ पीड़ितों से 20 से 30 हजार रुपए तक वसूले जाने की बात भी सामने आई है। बैंक खाता फ्रीज हुआ तो बदल देते थे रास्ता
ठगी की रकम के लेन-देन के लिए आरोपी कथित तौर पर अलग-अलग लोगों के बैंक खाते कमीशन के आधार पर इस्तेमाल करते थे। जब किसी पीड़ित को ठगी का पता चलता और वह साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करता, तो संबंधित बैंक खाता फ्रीज हो जाता था। इसके बाद आरोपी दूसरे बैंक खाते में रकम मंगवाना शुरू कर देते थे।
पुलिस को कई बैंकों के एटीएम कार्ड और चेकबुक भी मिले हैं। पुलिस ने इन खातों से संबंधित बैंकों को पत्र भेजकर खाताधारकों की जानकारी और लेन-देन का ब्योरा मांगा है। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि खाते किन लोगों के थे और उन्हें गिरोह तक किसने पहुंचाया।
सड़क किनारे छतरी लगाकर सिम बेचने वाले से खरीदते थे सिम
काल सेंटर से 18 एक्टिव सिम कार्ड बरामद हुए। इन सिम कार्डों की जांच में पता चला कि कुछ नंबर ऐसे लोगों के नाम पर जारी थे, जिन्हें उनके इस्तेमाल की जानकारी ही नहीं थी। पुलिस ने सिवियां निवासी राकेश कुमार को गिरफ्तार किया। राकेश एयरटेल के लिए सड़क किनारे छतरी लगाकर सिम बेचने और मोबाइल नंबर पोर्ट करवाने का काम करता था। वह नंबर पोर्ट करने के लिए ग्राहकों से पहचान दस्तावेज और बायोमैट्रिक लेता था। बाद में इन्हीं दस्तावेजों और बायोमैट्रिक का इस्तेमाल कर संबंधित व्यक्ति के नाम पर अतिरिक्त सिम जारी करवाता था।
800 रुपए प्रति सिम के हिसाब से बेचता था
राकेश इन अतिरिक्त सिम कार्डों को फर्जी कॉल सेंटर संचालक रजत बंसल को करीब 800 रुपए प्रति सिम के हिसाब से बेचता था। पुलिस ने उसका मोबाइल फोन कब्जे में लिया है और अदालत से रिमांड लेकर पूछताछ की जा रही है। पोर्टिंग की प्रक्रिया के नाम पर राकेश ने उसके पहचान दस्तावेज और बायोमैट्रिक लिए। इसके बाद नेटवर्क स्लो होने की बात कहकर उसे बाद में आने के लिए कहा गया। संबंधित व्यक्ति का नंबर तो पोर्ट हो गया, लेकिन आरोप है कि उसके दस्तावेज और बायोमैट्रिक बाद में दोबारा इस्तेमाल किए गए और उसके नाम पर अतिरिक्त सिम जारी कर दिए गए। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि इस तरीके से कितने लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और ऐसे कितने सिम कार्ड गिरोह तक पहुंचे। सिर्फ कॉलिंग करती थीं युवतियां
कॉल सेंटर पर कार्रवाई के दौरान पुलिस ने 6 युवतियों समेत 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। जांच के अनुसार, युवतियों की भूमिका मुख्य रूप से नौकरी तलाश रहे युवाओं से संपर्क करने और उन्हें शुरुआती बातचीत में विश्वास दिलाने तक सीमित थी। ये युवतियां जॉब वेबसाइट्स पर उपलब्ध नौकरी तलाशने वाले युवाओं के डेटा के आधार पर फोन और ईमेल करती थीं। बातचीत में खुद को निजी कंपनियों का प्रतिनिधि बताकर नौकरी, वेतन और वर्क-फ्रॉम-होम जैसी सुविधाओं की जानकारी दी जाती थी। इसके बाद युवाओं को एक फर्जी वेबसाइट का लिंक भेजकर भर्ती प्रक्रिया को वास्तविक दिखाने की कोशिश की जाती थी। जब आवेदक बातचीत में विश्वास कर लेता था, तब रकम वसूलने का काम रजत बंसल और बाल कृष्ण संभालते थे।
वेबसाइट से डेटा, फोन से भरोसा
पुलिस के अनुसार, गिरोह नौकरी की वेबसाइट्स पर अपना बायोडाटा अपलोड करने वाले युवाओं का डेटा हासिल करता था। इसके बाद उन्हें फोन कर बताया जाता कि उनका आवेदन चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ गया है। पहले नौकरी, पद और वेतन को लेकर भरोसा दिलाया जाता। फिर मेडिकल टेस्ट, दस्तावेज वेरिफिकेशन, प्रोसेसिंग या ट्रेनिंग के नाम पर फीस मांगी जाती। वर्क-फ्रॉम-होम और निजी कंपनी में नौकरी के लिए अलग-अलग शुल्क बताए जाते थे। आरोपी अलग-अलग मोबाइल नंबरों से कॉल करते थे। पुलिस को मौके से 20 मोबाइल फोन और 18 सिम कार्ड मिलने से इस बात की भी जांच की जा रही है कि नंबर बदलकर कॉल करने के पीछे क्या रणनीति थी। भरोसा बढ़ाने के लिए एक कर्मचारी को दूसरे का वरिष्ठ अधिकारी बताकर भी बात करवाने की बात सामने आई है। दूसरे राज्यों के युवाओं को बनाते थे निशाना
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी दूसरे राज्यों में रहने वाले नौकरी तलाशने वाले युवाओं को निशाना बनाते थे। इससे ठगी के बाद पीड़ित के लिए बठिंडा पहुंचकर आरोपियों का पता लगाना या सीधे संपर्क करना मुश्किल रहता था। पुलिस अब कॉल सेंटर के संचालन की अवधि, अब तक संपर्क किए गए युवाओं की संख्या, बैंक खातों में हुए लेन-देन और सिम कार्ड के नेटवर्क की जांच कर रही है। बरामद मोबाइल, कंप्यूटर और सिम कार्ड की तकनीकी जांच से गिरोह के अन्य संपर्कों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है।
पुलिस की अपील: सिम लेते समय रहें सावधान
साइबर क्राइम थाना प्रभारी इंस्पेक्टर बलविंदर सिंह ने लोगों से अपील की है कि सिम खरीदने या नंबर पोर्ट करवाने के लिए अधिकृत टेलीकॉम स्टोर या केंद्र पर ही जाएं। सड़क किनारे बैठे अनजान विक्रेता को पहचान दस्तावेज और बायोमैट्रिक देने से बचें। बैंक पासवर्ड या कार्ड संबंधी जानकारी नहीं देनी चाहिए
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट मुकेश चौधरी के अनुसार, नौकरी के नाम पर रजिस्ट्रेशन, मेडिकल, प्रोसेसिंग या दस्तावेज वेरिफिकेशन के लिए पैसे मांगे जाएं तो पहले कंपनी और भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए। किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी, यूपीआई पिन, बैंक पासवर्ड या कार्ड संबंधी जानकारी नहीं देनी चाहिए। अपने नाम पर जारी मोबाइल नंबरों की जानकारी दूरसंचार विभाग के TAFCOP पोर्टल से जांची जा सकती है। अनजान नंबर दिखाई देने पर संबंधित सेवा प्रदाता को शिकायत कर उसे बंद करवाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 पर सूचना देने और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई है।



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